भोजपुर जिलांतर्गत चरपोखरी प्रखंड क्षेत्र के देकुड़ा स्थित तालाब केंद्र सरकार की मिशन अमृत सरोवर योजना का हिस्सा है, और इसके जीर्णोद्धार के लिए 24 लाख रुपये आवंटित हुए थे, लेकिन देखकर ऐसा नहीं लगता है कि इस तालाब पर कोई सरकारी पैसा खर्च हुआ है।
देकुड़ा का यह तालाब प्रसिद्ध धार्मिक स्थल कुल्जी महारानी के निकट 12 बीघे में फैला हुआ है।
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“तालाब की स्थिति जस की तस बनी हुई है और धीरे धीरे यह सिकुड़ता भी जा रहा है,” देकुड़ा गांव के रहने वाले ललन तिवारी कहते हैं। उन्होंने आगे कहा, “आज से 50 वर्ष पूर्व यह तालाब 12 बीघा में फैला हुआ था। फ़िलहाल, इसका क्षेत्रफल 8-10 बीघा में सिमटा हुआ है। देखरेख के अभाव में यह सिमटती चली गई और इसमें जलीय पेड़-पौधे लग गए। अब इस तालाब में मवेशी तक नहीं नहाते।”
इसी गांव के रहने वाले राजकिशोर तिवारी बताते हैं, “इस तालाब में बारिश का पानी एकत्रित करने की संभावना भी खत्म हो चुकी है। अगर अमृत सरोवर के तहत इसका सौंदर्यीकरण हो जाता तो न केवल बारिश के पानी को संरक्षित किया जा सकता, बल्कि लुप्त होती अपनी विरासत को संजोए रखने में भी मदद मिलती। जल संरक्षण होने से क्षेत्र में घटते जलस्तर की समस्या को रोकने में भी काफी हद तक मदद मिलती।”
देकुड़ा का यह तालाब एकमात्र तालाब नहीं है, जो केंद्रीय योजना के लिए चयनित तो हो चुका है, मगर कोई काम अब तक नहीं हुआ है।
सुपौल ज़िले की तेकुना पंचायत के छिटहा गांव में स्थित महात्मन पोखर भी मिशन अमृत सरोवर योजना का हिस्सा है और इसके जीर्णोद्धार पर 10 लाख रुपये खर्च हुए हैं। लेकिन, अब भी पोखर की हालत काफ़ी ख़राब है।
छिटहा गांव के ग्रामीण बैद्यनाथ मंडल बताते हैं, “पोखर की चारों ओर पाथ-वे का निर्माण, सुरक्षा के लिए वायर फेंसिंग, प्रवेश द्वार के रूप में अमृत गेट तथा एक ओर सीढ़ियों का निर्माण प्रस्तावित था। अभी पूरे तालाब को झाड़ियों ने ढक रखा है और सरोवर के किनारे धँस चुके हैं। तालाब की खुदाई हुई थी, पौधे भी लगे थे। लेकिन, आज तालाब पूरी तरह बर्बाद है।”
यहां से लगभग आधे घंटे की दूरी पर रामपुर पंचायत के पंचायती सरकार भवन के सामने स्थित पोखर का निर्माण अमृत सरोवर योजना के तहत कराया गया है। अभी पोखर की चारों तरफ पक्का प्लास्टर और एक तरफ सीढ़ी का निर्माण किया गया है। लेकिन, पोखर में पानी के नाम पर सिर्फ जलीय पौधे हैं। योजना के बारे में जानकारी देने के लिए आवश्यक सूचना बोर्ड भी नहीं लगाया गया है। ठूठी पंचायत के रहने वाले वार्ड नंबर 1 के सदस्य अशोक मुखिया बताते हैं, “वर्ष 2023 में डीडीसी मुकेश कुमार ने इस पोखर का जीर्णोद्धार कर उद्घाटन किया था। बाद में पोखर खुदाई के बाद जमीन विवाद का मामला सामने आ गया, जिसके चलते इस पर रोक लगा दी गई।”

बिहार के जलस्रोतों की स्थिति
भारत के सबसे जलवायु-संवेदनशील राज्यों में शामिल बिहार के जलस्रोत ख़ास तौर पर तालाबों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। जलवायु परिवर्तन के चलते बारिश का पैटर्न बदल रहा है और साथ ही सूखे व बाढ़ जैसी चरम घटनाएं हो रही हैं, जिसका असर भूजल संसाधनों पर दिख रहा है।
नई दिल्ली स्थित एक थिंकटैंक काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) ने 2021 में भारत की जलवायु संवेदनशीलता का आकलन करने वाली अपनी रिपोर्ट में बिहार को 5वें सबसे संवेदनशील राज्य के रूप में चिन्हित किया था। कृषि अर्थशास्त्र और सामाजिक विज्ञान अनुसंधान संघ की रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु संवेदनशीलता के प्रभाव से बिहार के भूजल स्तर में गिरावट देखी गई है। राज्य सरकार ख़ुद भी मानती है कि 2050 तक बिहार जल संकट के मुहाने पर होगा। पिछले 50 वर्षों में अधिकतर इलाकों में भूजल स्तर औसतन तीन गुना गिर चुका है।
जल संसाधन मंत्री विजय कुमार चौधरी ने विभागीय बजट पर चर्चा के दौरान बताया कि जियोग्राफिक इनफार्मेशन सिस्टम (जीआईएस) सर्वे में 600 से अधिक नदियां मिलीं, लेकिन इनमें से केवल 340 नदियां ही ज्ञात हैं। शेष 260 को पुनर्जीवित करने की योजना पर काम चल रहा है।
क्या है अमृत सरोवर योजना
जल स्रोतों को संरक्षित करने के लिए केंद्र व राज्य सरकार की ओर से कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। इन्हीं में से एक मिशन अमृत सरोवर योजना है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 अप्रैल 2022 को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस के अवसर पर देश के प्रत्येक जिले में 75 तालाबों के निर्माण और पुराने तालाबों को पुनर्जीवित करने के लिए मिशन अमृत सरोवर योजना शुरू करने की घोषणा की। इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में जल निकायों का पुनरुद्धार और नए सरोवरों का निर्माण कर आने वाली पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षा सुनिश्चित करना है। लेकिन, बिहार में इस योजना का क्रियान्वयन सवालों के घेरे में है।
सुपौल के आरटीआई कार्यकर्ता विद्या ठाकुर के मुताबिक, सुपौल में केन्द्र सरकार की मिशन अमृत सरोवर योजना के तहत चयनित ज्यादातर पोखरों की स्थिति पहले जैसे ही है। “कई तालाबों में एक बूंद पानी नहीं है, तो कई में झाड़ियां उग आई हैं,” उन्होंने कहा।
मुजफ्फरपुर ज़िले के सकरा प्रखंड की विशनपुर बहनगरी पंचायत में जिस पोखर का अमृत सरोवर के तहत निर्माण होना था, वह तालाब कागज पर तो जिंदा है, लेकिन ज़मीन पर नहीं। बताया जा रहा है कि तालाब पर भू माफियाओं का क़ब्ज़ा है।
मुजफ्फरपुर के स्थानीय निवासी और व्यापारी पप्पू कुमार बताते हैं, “विशनपुर बहनगरी एक मॉडल पंचायत है। यहां की मुखिया बबीता कुमारी को राष्ट्रपति तक सम्मानित कर चुके हैं। उस गांव में इस तरह की कहानी भू-माफियाओं की गुंडागर्दी की कहानी बयां करती है।”

मुखिया बबीता कुमारी ने भी आरोप लगाया है कि पंचायत स्थित सैकड़ों एकड़ सरकारी भूमि कागजों में दर्ज है, लेकिन जमीन पर भू-माफियाओं का राज चलता है। उन्होंने बताया कि सकरा अंचल अधिकारी को लिखित तौर पर इस अवैध कब्जे और बिक्री की जानकारी दी गई है।
बिहार के दरभंगा ज़िले के दरभंगा शहर में तालाब बचाओ अभियान शुरू करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता व तालाब विशेषज्ञ नारायण चौधरी बताते हैं, “अमृत सरोवर योजना भूजल संचयन के लिए एक बेहतरीन योजना हो सकती है बशर्ते सरकार इसपर गंभीरता से काम करे।”
वहीं, अमृत सरोवर योजना के तहत तालाब को पुनर्जीवित करने के लिए जिस तरह के कार्य किये जाने का प्रावधान, उनमें से कुछ कार्यों को लेकर नारायण चौधरी सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि इससे तालाबों की सेहत पर असर पड़ेगा। वह कहते हैं, “योजना के तहत तालाब की चारों तरफ सीढ़ी बनाने का प्रावधान है। यह पूरी तरह से गलत है। इससे तालाब का पारिस्थितिकी तंत्र बर्बाद हो जाता है। कुछ सुधार और सरकार के बेहतर रवैये से जलवायु परिवर्तन और चरम मौसमी गतिविधियों के हिसाब से यह योजना बेहतर हो सकती है।”
बिहार में मिशन अमृत सरोवर योजना का क्रियान्वयन कितना कमजोर है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले साल अप्रैल में पीआईबी की तरफ से जारी प्रेस विज्ञप्ति में इस योजना को लागू करने में बेहतर प्रदर्शन करने वाले पांच राज्यों की जो सूची जारी की गई, उसमें बिहार कहीं नहीं है।
मिशन अमृत सरोवर योजना को लेकर बनी सरकारी वेबसाइट के डैशबोर्ड के मुताबिक़, बिहार में अब तक 2613 सरोवरों को ही विकसित किया जा सका है। इस आँकड़े की तुलना अगर अन्य राज्यों से की जाए, तो कम से कम 8 राज्य बिहार से आगे हैं।
लेकिन, सवाल ये भी है कि क्या इस योजना से भूगर्भ का जलस्तर बेहतर हो सकता है? इस सवाल पर मेघ पाईन अभियान के प्रबंध न्यासी और जल विशेषज्ञ एकलव्य प्रसाद बताते हैं, “सिर्फ तालाबों के जीर्णोद्धार या निर्माण से भूजल स्तर बेहतर नहीं होगा। तालाब के जीर्णोद्धार के बाद कई मापदंड पर काम करने के बाद भूजल स्तर सुधारा जा सकता है। जैसे जैसे बिहार में पानी की किल्लत होगी लोगों को इस योजना के महत्वपूर्ण होने की जानकारी मिलेगी। ऐसे में सरकार को पहले ही इस योजना को लेकर आम जनता को बेहतर मैसेज देना होगा कि यह जरूरी क्यों है?”
(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)
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