निर्वाचन आयोग ने पिछले दिनों कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान उसे बिहार की मतदाता सूची में बड़ी संख्या में नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार के नागरिक मिले हैं।
हिन्दुस्तान में छपी एक खबर में निर्वाचन आयोग के हवाले से कहा गया है कि निर्वाचन आयोग को डोर टू डोर सत्यापन में यह भी पता चला है कि इन विदेशियों के पास वोटर कार्ड, आधार कार्ड और राशन कार्ड भी मौजूद हैं। खबर बताती है कि निर्वाचन आयोग ने कहा है कि इनके नाम फाइनल वोटर लिस्ट में नहीं रहेंगे।
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हालांकि, ये खबर सूत्रों के हवाले से चलाई गई, किसी अधिकारी ने आधिकारिक तौर पर ये नहीं कहा। ‘मैं मीडिया’ ने भी जब निर्वाचन आयोग के एक अधिकारी से बात की, तो उन्होंने इस बात की पुष्टि की। उक्त अधिकारी ने कहा कि उन्हें कोट न किया जाए लेकिन बताया कि निर्वाचन आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों ने ये कहा है, तो निश्चित तौर पर कुछ मिला होगा। अभी प्रक्रिया चल रही है। जमा हो रहे फॉर्म और आंकड़ों का विश्लेषण चल रहा है। थोड़ा इंतजार करिए।”
लेकिन, सवाल ये है कि जो फॉर्म, बूथ स्तरीय अधिकारी (बीएलओ) लोगों को दे रहे हैं और भरा हुआ फॉर्म लेकर ऑनलाइन अपलोड कर रहे हैं, क्या उनमें ऐसी जानकारियां ली जा रही हैं जिससे ये पता चले कि फॉर्म भरने वाला मतदाता भारतीय नागरिक है कि विदेशी?
अब तक कितने फॉर्म जमा हुए?
बिहार में वोटरों की कुल संख्या 7.89 करोड़ है। उल्लेखनीय हो कि निर्वाचन आयोग ने 24 जून को एक प्रेस नोट जारी कर बताया कि बिहार की मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण शुरू किया जा रहा है जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सभी पात्र नागरिकों के नाम मतदाता सूची में सम्मिलित हों ताकि वे अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकें और कोई भी अपात्र व्यक्ति मतदाता सूची में शामिल न हो तथा मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी रहे।
इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए मतदान केंद्र पदाधिकारी (बीएलओ) घर-घर जाकर एन्युमरेशन फॉर्म वितरित कर रहे हैं और फिर भरा हुआ फॉर्म जमा ले रहे हैं, जिन्हें ऑनलाइन अपलोड किया जा रहा है।
आयोग ने 30 सितम्बर तक मतदाताओं की अंतिम सूची प्रकाशित करने का लक्ष्य रखा है।
आयोग ने कहा है कि अगर कोई मतदाता निर्धारित अवधि के भीतर फॉर्म जमा नहीं कर पाता है तो वह दावा-आपत्ति अवधि के दौरान फॉर्म-6 और घोषणा पत्र देकर अपना नाम जोड़ने के लिए आवेदन कर सकता है। दावा-आपत्ति अवधि 1 अगस्त से 1 सितंबर तक रखी गई है।
इस अभियान के तहत जिन भी लोगों का नाम बिहार की मतदाता सूची में शामिल है, उन सबके एन्युमरेशन फॉर्म भरकर बीएलओ को जमा करना है। निर्वाचन आयोग ने अपने निर्देश में कहा है कि जिन मतदाताओं के नाम साल 2003 की मतदाता सूची में शामिल हैं, उन्हें सिर्फ एम्युमरेशन फॉर्म में वांछित जानकारियां भर कर फॉर्म जमा करना है। वहीं, जिनका नाम वोटर लिस्ट में साल 2003 के बाद शामिल हुआ है उन्हें साल 2003 की मतदाता सूची में उपलब्ध माता-पिता के डिटेल के साथ अपना पहचान पत्र देना होगा, जो उनकी जन्म तिथि और जन्म स्थान की पुष्टि करता हो।
निर्वाचन आयोग ने इन प्रमाण पत्रों में पहचान पत्र/प्रमाण पत्र/सरकार/स्थानीय प्रशासन/बैंक/पोस्ट ऑफिस/एलआईसी/पीएसयू की तरफ से जारी दस्तावेज, जन्म प्रमाण पत्र, पासपोर्ट, माध्यमिक/शैक्षणिक प्रमाण पत्र, स्थायी निवास का प्रमाण पत्र, वनाधिकार प्रमाण पत्र, ओबीसी/एससी/एसटी सर्टिफिकेट, एनआरसी, फैमिली रजिस्टर व सरकार की तरफ से जारी कोई लैंड/हाउस आवंटन सर्टिफिकेट को शामिल किया है। यहां यह भी बता दें कि बिहार के कुल वोटरों में से 2.93 करोड़ वोटरों के नाम मतदाता सूची में वर्ष 2003 के बाद जुड़े हैं, यानी कि 2.93 करोड़ वोटरों को अतिरिक्त दस्तावेज देना होगा।
ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 6,99,92,926 एन्युमरेशन फॉर्म निर्वाचन आयोग को मिल चुके हैं, जिनमें से 6,47,24,300 फॉर्म ऑनलाइन अपलोड किये जा चुके हैं। वहीं, 35,69,435 वोटर अपने पते पर नहीं पाये गये। लगभग 12.5 लाख वोटर संभवतः मृत पाये गये और 17.3 लाख वोटर स्थाई तौर पर अन्यत्र शिफ्ट हो गये हैं। वहीं, 5.76 लाख वोटर हैं, जिनका नाम कई जगहों पर है। लेकिन, आश्चर्यजनक रूप से निर्वाचन आयोग ने ऐसा कोई आँकड़ा नहीं दिया जो बताए कि कितने वोटर ऐसे मिले, जो भारत के नागरिक नहीं हैं।
क्या फॉर्म की हो रही मार्किंग?
निर्वाचन आयोग जो एन्युमरेशन फॉर्म मतदाताओं के बीच वितरित कर रहा है, उसके एक हिस्से में ये विकल्प भी रखे गये हैं कि अगर कोई मतदाता भारत का नागरिक नहीं है लेकिन वोटर लिस्ट में शामिल है, तो वो इस संबंध में जानकारी मुहैया करा दे।
मसलन, फॉर्म के एक बिंदु में पूछा गया है कि अगर मतदाता का जन्म भारत के बाहर हुआ है, तो उसे विदेश में भारतीय मिशन द्वारा जारी जन्म प्रमाण पत्र संलग्न करना होगा। दूसरे बिंदु में लिखा गया है कि वोटर ने अगर भारत की नागरिकता प्राप्त कर ली है, तो उसे नागरिकता पंजीकरण प्रमाणपत्र संलग्न करना होगा।
वहीं, विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े अधिकारियों ने ‘मैं मीडिया’ को बताया कि गैर भारतीय वोटरों के फॉर्म को चिन्हित करने और उनकी जानकारी निर्वाचन आयोग को उपलब्ध कराने का निर्देश बीएलओ को दिया गया है।
दरअसल, बीएलओ रोजाना जितने भरे हुए फॉर्म संकलित करते हैं, उनके बारे में एक फॉर्म में उन्हें जानकारी देनी होती है। ये जानकारियां तीन-चार तरह की होती हैं। अधिकारियों के अनुसार, एक जानकारी तो ये देनी होती है कि जितने मतदाताओं तक बीएलओ पहुंचे, उनमें से कितने मतदाता स्थायी तौर पर अन्यत्र शिफ्ट हो गये हैं। दूसरी जानकारी ये देनी होती है, कितने मतदाता मृत पाये गये। तीसरी जानकारी ये देनी होती है कि कितने मतदाता गैर-मौजूद पाये गये। एक अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा, “चौथी जानकारी ये देनी होती है कि कितने वोटर ऐसे मिले, जो भारत के नागरिक नहीं हैं। लेकिन ऐसे वोटरों के लिए अलग कॉलम नहीं है फॉर्म में। बीएलओ को ये जानकारी फॉर्म में मौजूद ‘अन्य’ कॉलम में देनी होती है।”
लेकिन, ‘मैं मीडिया’ ने किशनगंज, कटिहार और सुपौल जिले, जो पश्चिम बंगाल और नेपाल की सीमा से सटे हुए हैं, में कार्यरत बीएलओ से बात की, तो उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि एन्युमरेशन फॉर्म में वे किसी तरह की मार्किंग नहीं कर रहे हैं, जिससे ये स्पष्ट हो कि कोई वोटर नेपाल, बांग्लादेश या म्यांमार का नागरिक है और न ही वे उस फॉर्म में ही इसकी कोई जानकारी दे रहे हैं, जिसे रोज भरकर निर्वाचन आयोग को देना होता है।
किशनगंज के सीमावर्ती इलाके में काम कर रहे एक बीएलओ ने ‘मैं मीडिया’ से कहा कि वह फॉर्म में किसी तरह की मार्किंग नहीं कर रहे हैं कि कोई वोटर भारतीय नागरिक नहीं है और वह ऐसा करने के पीछे की वजह भी बताते हैं। “हमलोगों को उच्चाधिकारी से निर्देश मिला था कि मतदाताओं से बिना किसी दस्तावेज के सिर्फ एन्युमरेशन फॉर्म लेना है, तो हमलोग ऐसा ही कर रहे हैं। हमलोग सिर्फ फॉर्म ले रहे हैं। फॉर्म देते वक्त वोटर ये नहीं बताता है कि वह भारत का नागरिक नहीं है, तो फॉर्म में हम ये कैसे मार्क करेंगे?,” उन्होंने कहा।
उन्होंने आगे कहा, “हमलोग रोजाना एक फॉर्म में मृत पाये गये और स्थायी तौर पर शिफ्ट हो चुके वोटरों की जो जानकारी दे रहे हैं, उसमें ये जानकारी नहीं देते हैं कि कितने मतदाता विदेशी नागरिक मिले क्योंकि ऐसी जानकारी हमलोग जुटा ही नहीं रहे हैं।”
कटिहार के सीमावर्ती इलाके के भी एक बीएलओ ने ‘मैं मीडिया’ से यही कहा। उन्होंने भी बताया कि वे फॉर्म में ऐसी कोई मार्किंग नहीं कर रहे हैं कि फलां वोटर भारत का नागरिक नहीं है।
नेपाल सीमा से लगे किशनगंज के एक गांव के जन प्रतिनिधि ने भी बताया कि उनके गांव के कई घरों में नेपाल की बहुएं हैं, जिनका वोटर लिस्ट में नाम है, उनका फॉर्म भी बिना किसी अन्य दस्तावेज के जमा लिया गया है। “हमारे यहां के बीएलओ ने कहा कि अभी फॉर्म के साथ सिर्फ आधार कार्ड का डिटेल दे दीजिए और अगर बाद में कोई नया नियम निकलता है, तो उसके हिसाब से दस्तावेज मांगा जाएगा,” उक्त जनप्रतिनिधि ने ‘मैं मीडिया’ को कहा।
किशनगंज के डीएम विशाल राज ने भी ‘मैं मीडिया’ के साथ बातचीत में पुष्टि की कि अभी एन्युमरेशन फॉर्म का विभाजन नहीं किया जा रहा है कि उनमें से कौन भारतीय नागरिक है और कौन नहीं। “अभी केवल एन्युमरेशन फॉर्म संग्रह किया जा रहा है, बाद में हमलोग उन्हें विभाजित करेंगे और उस वक्त जो निर्वाचन आयोग का जो निर्णय आएगा उसी हिसाब से दस्तावेज मांगे जाएंगे।”
ऐसे में सवाल ये उठता है कि फिर निर्वाचन आयोग किस बुनियाद पर ये कह रहा है कि उसे पुनरीक्षण में वोटर लिस्ट में नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार के नागरिक मिले हैं?
पुनरीक्षण प्रक्रिया से जुड़े एक अन्य अधिकारी इस पूरी प्रक्रिया में खामियां देख रहे हैं और उनका मानना है कि ये नोटबंदी साबित हो सकता है। उन्होंने कहा, “नोटबंदी का उद्देश्य कालाधन पर नियंत्रण करना था, लेकिन सारा कालाधन सफेद हो गया और सरकार को कोई कालाधन नहीं मिला था। यही हाल पुनरीक्षण का होने जा रहा है। निर्वाचन आयोग चाहता है कि गैर-भारतीय वोटरों का नाम वोटर लिस्ट से हटे, लेकिन ऐसा हो पाएगा, इसमें संदेह है क्योंकि प्रक्रिया में लीकेज है।” “इस प्रक्रिया से सिर्फ मृत वोटर और स्थाई तौर पर शिफ्ट हो चुके वोटरों के नाम हटेंगे और कुछ नहीं होगा,” उन्होंने कहा।
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