बिहार के किशनगंज ज़िले के धनतोला में 10 मार्च 2022 की आधी रात सात हाथियों का एक झुंड घुस गया। हाथियों ने जम कर तबाही मचाई, घर के साथ साथ घर में रखा सारा सामान तोड़ दिया और फूस के घर में सो रही वृद्ध महिला रातीश्री देवी राजवंशी को कुचल दिया।
रातीश्री की बहु वर्ती देवी उस दिन को याद करते हुए कहती हैं, “देर रात सात हाथी घर में घुस गये, मेरी सास को कुचल कर मार दिया और बेटी के दहेज़ के लिए घर में रखा सारा सामान तोड़ दिया।”
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अगले वर्ष 2 फ़रवरी, 2023 को धनतोला पंचायत के ही पिपला गाँव में रात करीब 1 बजे ऐसे ही हाथियों का एक झुंड घुस गया, जिससे गाँव में अफरातफरी मच गई। 53 वर्षीय मुर्शिदा खातून अपने घर के दरवाजे पर खड़ी थी। हाथियों ने सूंड से उठाकर उन्हें फेंका और कुचल दिया। मुर्शिदा के पैर और रीढ़ की हड्डी टूट गई। पूर्णिया में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।
“हमलोग सब सोये थे। रात करीब एक बजे हाथी घुसा, घर में अफरातफरी मच गई, हमलोग घर से निकल गए, लेकिन मम्मी को हाथी दरवाज़े से उठा लिया, सूड़ से उठा कर घुमाया, पैर से कुचल दिया और दूर ले जाकर छोड़ दिया,” मुर्शिदा के बेटे मतीउर रहमान बताते हैं।
इसी तरह वर्ष 2016 में ठाकुरगंज में हाथियों ने एक वनकर्मी और एक महिला की जान ले ली थी। 2017 में तेआमडांगी गांव के एक युवक की जान हाथियों ने ले ली थी। 22 मार्च 2020 को बिहार टोला कामत वस्ती में मक्का खेत देखने गए 63 वर्षीय नारायण शर्मा को हाथियों ने मार डाला था। वहीं, 17 अप्रैल 2023 में बिहारटोला गांव के समीप एक हाथी की मौत हो गयी थी।
पिछले एक दशक से सीमावर्ती ज़िले किशनगंज में मक्का फसल के मौसम के साथ ही मानव-हाथी संघर्ष आम हो जाता है। इस दौरान न केवल इंसानों और हाथियों की जान को खतरा होता है, बल्कि ग्रामीणों के घरों और फसलों को भी भारी नुकसान झेलना पड़ता है।
स्थानीय किसान रामानंद रॉय ने बताया, “हाथियों का झुंड मक्का के खेतों को मानो घर समझ लिया है। कुछ दिनों पहले अपने खेतों में मक्के की फसल देखने गए थे। खेत के बीच नौ हाथियों का झुंड देखकर मेरे होश उड़ गए।”
“एक ही जगह पर हाथियों के झुंड का डेरा डाले बैठे रहने से मक्के की फसलों को भारी नुकसान पहुँचता है,” वह आगे कहते हैं।

मक्का की खेती और बढ़ता संघर्ष
मक्के का सीजन शुरु होते ही नेपाल के जंगलों से हाथियों का आना शुरू हो जाता है। इस वर्ष भी मक्के का सीजन शुरू होते ही जंगली हाथियों का आतंक जारी है। भोजन की तलाश में हाथी जंगल से निकल कर मक्का खेतों में आते हैं जिससे हर वर्ष सैकड़ों एकड़ में लगी फसल बर्बाद होती है। इसका सीधा नुकसान सीमावर्ती क्षेत्र के किसानों को उठाना पड़ता है।
“इकोलॉजी एंड सोसाइटी ” में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, मानव-हाथी संघर्ष मुख्य रूप से हाथियों के प्राकृतिक आवास में उपलब्ध भोजन की गुणवत्ता में असमानता के कारण उत्पन्न होता है। अध्ययन बताता है कि बेहतर पोषण वाली कृषि फसलें हाथियों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं, जिसके चलते वे खेतों में घुसकर फसलों को नुकसान पहुँचाते हैं।
शोध में यह भी पाया गया कि हाथी फसलों पर धावा बोलने के लिए केवल संरक्षित क्षेत्रों की सीमाओं के पास ही निर्भर नहीं रहते, बल्कि वे दूर स्थित कृषि क्षेत्रों तक भी पहुँच सकते हैं, बशर्ते वहाँ की फसलें उनके प्राकृतिक भोजन की तुलना में अधिक पौष्टिक हों।
इन निष्कर्षों से यह स्पष्ट होता है कि जब तक मनुष्य ऐसी फसलें उगाते रहेंगे जिनकी पोषण गुणवत्ता जंगली वनस्पतियों से अधिक है, तब तक मानव-हाथी संघर्ष जारी रहने की संभावना बनी रहेगी।
वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के मुख्य पारिस्थितिकीविद् समीर कुमार सिन्हा कहते हैं, “मकई काफी पौष्टिक होती है। हमारे लिए यह एक फसल है, लेकिन हाथियों के लिए यह भोजन है। वह यह नहीं देखते कि यह जंगल में उगा है या इंसानों द्वारा — उनके लिए यह सिर्फ खाने का स्रोत है।”
“एक बार जब हाथी किसी इलाके में आ जाते हैं और उन्हें लगता है कि इस मौसम में यहाँ भोजन उपलब्ध है, तो वे बार-बार वहाँ लौटते हैं, क्योंकि वे लंबी दूरी तय करने वाले (लॉन्ग-रेंजिंग) जानवर होते हैं। कई बार जब हम फसलों का पैटर्न बदलते हैं, तो उसका भी प्रभाव पड़ता है। कोई भी जानवर कम प्रयास में अधिक ऊर्जा प्राप्त करना चाहता है। ऐसे में, यदि आप हाथियों को आकर्षित करने वाली फसल उगाते हैं, तो उनके बार-बार आने की संभावना बढ़ जाती है। जैसे-जैसे मक्का की खेती बढ़ेगी, वैसे-वैसे उसका प्रभाव और मानव-हाथी संघर्ष भी बढ़ेगा,” वो आगे कहते हैं।
वर्ष 2023–24 से 2024–25 के बीच बिहार में मक्का उत्पादन में 12.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। पिछले एक दशक में किशनगंज में गर्मा मक्का का उत्पादन 7,006 मीट्रिक टन से बढ़कर 26,292 मीट्रिक टन हो गया, जबकि खरीफ मक्का का उत्पादन 1,805 मीट्रिक टन से बढ़कर 3,81,799 मीट्रिक टन तक पहुँच गया।

सीमाएं नहीं मानते हाथी
हाथियों की आवाजाही को राजनीतिक सीमाओं में बाँधा नहीं जा सकता, विशेषकर तब जब भौगोलिक अवरोध मौजूद न हों। कंचनजंगा लैंडस्केप (केएल), जो तीन देशों — भूटान, भारत और नेपाल — में फैला हुआ है, कभी जंगली हाथियों के बड़े झुंडों का निवास स्थल था। ये हाथी नेपाल के झापा के पूर्वी क्षेत्र से पश्चिम बंगाल (भारत) और भूटान होते हुए आगे असम (भारत) के पूर्वी हिस्सों तक प्रवास करते थे। बिहार का किशनगंज जिला नेपाल और पश्चिम बंगाल से सटा हुआ है।
2019 में प्रकाशित शोध पत्र “रिजॉल्विंग द ट्रांस-बाउंड्री डिस्प्युट ऑफ एलिफेंट पोचिंग बिटवीन इंडिया एंड नेपाल” के अनुसार, केएल क्षेत्र में हाथियों के आवास का बड़ा हिस्सा बस्तियों, कृषि भूमि, चाय बागानों और सागौन (टीक) के वृक्षारोपण में बदल दिया गया है, जिससे उनके भोजन की तलाश (फॉरजिंग) के व्यवहार और प्रवास मार्गों पर गहरा प्रभाव पड़ा है। इसके परिणामस्वरूप, हाथी अक्सर बस्तियों और खेती वाले क्षेत्रों में प्रवेश कर जाते हैं, जिससे बुनियादी ढाँचे और फसलों को नुकसान होता है तथा कभी-कभी मानव जनहानि भी होती है। इसके जवाब में अपनाए जाने वाले उपाय, जैसे हाथियों को मारना या बिजली को बाड़ लगाना, उनके घायल होने या मृत्यु का कारण बनते हैं।
कंचनजंगा लैंडस्केप (केएल) 25,085 वर्ग किलोमीटर में फैला एक अंतरराष्ट्रीय जैव-विविधता हॉटस्पॉट है तथा विश्व की तीसरी सबसे ऊँची चोटी के आसपास स्थित है। यह क्षेत्र 40 मीटर से लेकर 8,586 मीटर तक की ऊँचाई में फैला हुआ है और यहाँ 4,500 से अधिक पौधों की प्रजातियाँ तथा कई संकटग्रस्त वन्यजीव संरक्षित हैं।
“एलिफेंट कॉरिडोर्स ऑफ इंडिया 2023” रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2017 में बिहार में हाथियों की मौजूदगी केवल ‘छिटपुट’ मानी जाती थी। हालांकि, वर्ष 2023 में जमुई–झाझा–चकाई के वन क्षेत्र को राज्य का पहला आधिकारिक हाथी गलियारा (एलीफेंट कॉरिडोर) के रूप में चिन्हित किया गया है।
समीर कहते हैं, “कॉरिडोर दो आवासों (हैबिटैट) को जोड़ता है, लेकिन किशनगंज की तरफ कोई स्थापित आवास नहीं है, इसलिए यहाँ कोई औपचारिक कॉरिडोर भी नहीं है। यहाँ जो भी हाथी आते हैं, वे ऐसे ही भटक कर पहुँच जाते हैं। ऐसा नहीं है कि वे किसी दूसरे स्थान पर जाने के क्रम में फसलों को नुकसान पहुँचा रहे हैं।”
“स्टेटस ऑफ एलिफेंट्स इंडिया 2021-2025” रिपोर्ट के अनुसार, बिहार में हाथियों की अनुमानित संख्या 13 बताई गई है, जो वाल्मीकि टाइगर रिज़र्व में दर्ज की गई है। हालांकि, रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि ये हाथी स्थायी (रेज़िडेंट) नहीं हैं, बल्कि नेपाल के परसा और चितवन राष्ट्रीय उद्यानों से आने-जाने वाले प्रवासी हाथी हैं, क्योंकि इन क्षेत्रों के बीच वर्तमान में और ऐतिहासिक रूप से एक अच्छा कॉरिडोर संपर्क मौजूद रहा है।
तकनीक और जुगाड़—दोनों नाकाम?
हाथियों की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए ग्रामीण कई तरह के पारंपरिक उपाय अपनाते हैं। वे घरों की छतों और पेड़ों पर चढ़कर टॉर्च की रोशनी में हाथियों की निगरानी करते हैं। जैसे ही गाँव की ओर हाथियों के आने की आहट मिलती है, लोग टायर, मधुवा या सरपत में आग लगाकर उन्हें भगाने की कोशिश करते हैं। इसके अलावा, हाथियों को दूर रखने के लिए घरों के बाहर सफेद पॉलीथिन भी लगाया जाता है।
गाँव में हाथियों के बढ़ते उत्पात को देखते हुए प्रशासन ने क्षेत्र में एनिडर्स लगाए हैं। एनिडर्स (एनिमल इंट्रूजर डिटेक्शन एंड रिपेलेंट सिस्टम), एक सोलर पैनल आधारित यंत्र है, जो सेंसर के माध्यम से जंगली जानवरों की उपस्थिति का पता लगाता है और तेज़ सायरन जैसी आवाज़ तथा प्रकाश उत्पन्न कर उन्हें दूर भगाने का प्रयास करता है। एक एनिडर्स लगभग 100 मीटर की दूरी तक प्रभावी होता है, जबकि पाँच एनिडर्स मिलकर करीब आधा किलोमीटर क्षेत्र को कवर कर सकते हैं।

वर्ष 2023 में हाथी प्रभावित इलाकों में इन मशीनों को लगाया गया था। शुरुआती दौर में जिन स्थानों पर एनिडर्स लगाए गए, वहाँ हाथियों के झुंड ने भारतीय क्षेत्र में प्रवेश के लिए अपने रास्ते बदलने शुरू कर दिए। एक वर्ष के भीतर ही रख-रखाव के अभाव में अधिकांश मशीनें खराब हो गईं। इसके बाद वन विभाग ने प्रभावित क्षेत्रों में अस्थायी कैंप लगाने शुरू किए, जहाँ वनकर्मी पटाखे और ‘लुक्का’ जलाकर हाथियों को भगाने का प्रयास करते हैं, लेकिन इसका हाथियों पर सीमित प्रभाव ही पड़ता है।
समीर कहते हैं, “हाथी बहुत बुद्धिमान जानवर होता है। शुरुआत में वह एनिडर्स जैसी चीज़ों से डरता है, लेकिन कुछ समय बाद उसे इसकी आदत हो जाती है और फिर इसका असर कम हो जाता है।”
“लोगों को अपने दृष्टिकोण में बदलाव लाने की ज़रूरत है। उन्हें समझना होगा कि वे ऐसी फसलें उगा रहे हैं जो हाथियों को आकर्षित करती हैं। साथ ही यह भी ज़रूरी है कि मानव जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। जब लोगों की जान जाती है, तो वे अक्सर गलत कदम उठाते हैं—जैसे हाथियों पर आग फेंकना। यदि हाथी घायल होता है, तो वह और अधिक आक्रामक होकर समस्या बढ़ा सकता है,” समीर आगे कहते हैं।
वन क्षेत्र के पदाधिकारी राधेश्याम राय ने कहा, “दिघलबैंक प्रखंड की धनतोला पंचायत में हाथियों के आतंक को कम करने और लोगों की सुरक्षा के लिए एक टीम का गठन किया गया है, जो लगातार निगरानी रख रही है और ग्रामीणों को बचाव के उपायों के प्रति जागरूक कर रही है।”
(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)
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