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हर साल ग्रीन बजट लाने वाला बिहार आंकड़ों में कितना ‘ग्रीन’ है?

बिहार में खुले वन (लगभग 4.1 प्रतिशत) सबसे अधिक हैं, इसके बाद मध्यम घने वन (करीब 3.5 प्रतिशत) आते हैं, जबकि अत्यंत सघन वन केवल लगभग 0.4 प्रतिशत ही हैं। यानी राज्य में ज्यादातर वन ऐसे हैं जहां पेड़ों की सघनता कम है, जबकि घने और बेहतर गुणवत्ता वाले जंगल बहुत सीमित हैं।

chandra pratap tiwari Reported By Chandra Pratap Tiwari |
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adhaura forest of kaimur
कैमूर के अधौरा का जंगल

इस साल बिहार सरकार ने फिर से अपना ग्रीन बजट पेश किया है। गौरतलब है कि बिहार ने 2020–21 से ग्रीन बजट की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य जलवायु, पानी, प्रदूषण और जंगलों से जुड़े खर्च को अलग से पहचानना था।


लेकिन राज्य की पर्यावरणीय स्थिति इससे ज्यादा जटिल है। भारत वन स्थिति रिपोर्ट (ISFR) 2023 के अनुसार बिहार उन राज्यों में है जहां वन क्षेत्र राष्ट्रीय औसत से कम है। भारत में कुल वन क्षेत्र लगभग 21.76 प्रतिशत है, जबकि बिहार इससे काफी नीचे है।

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यही अंतर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। अगर बिहार ने ग्रीन बजट और बड़े स्तर पर पौधारोपण कार्यक्रम शुरू किए हैं, तो असल में राज्य कितना ग्रीन है?


भारत में जंगलों का सबसे भरोसेमंद आकलन भारत वन स्थिति रिपोर्ट से होता है। यह रिपोर्ट सैटेलाइट के आधार पर जंगलों को मापती है। इसमें जंगलों को तीन हिस्सों में बांटा जाता है – अत्यंत सघन वन, सामान्य सघन वन और खुले वन।

बिहार में खुले वन (लगभग 4.1 प्रतिशत) सबसे अधिक हैं, इसके बाद मध्यम घने वन (करीब 3.5 प्रतिशत) आते हैं, जबकि अत्यंत सघन वन केवल लगभग 0.4 प्रतिशत ही हैं। यानी राज्य में ज्यादातर वन ऐसे हैं जहां पेड़ों की सघनता कम है, जबकि घने और बेहतर गुणवत्ता वाले जंगल बहुत सीमित हैं।

दरअसल, बिहार में जंगल बराबर नहीं फैले हैं। ज्यादातर जंगल कुछ जिलों में ही हैं। दक्षिण के जिले जैसे कैमूर, रोहतास, जमुई, बांका और मुंगेर में ज्यादा वन हैं। इसका कारण वहां का पहाड़ी इलाका है। इसके उलट उत्तर बिहार में खेती और ज्यादा आबादी के कारण वन बहुत कम हैं।

पश्चिम चंपारण का वाल्मीकि टाइगर रिजर्व राज्य का सबसे बड़ा वन क्षेत्र है। यह नेपाल सीमा से जुड़ा हुआ है। इसके अलावा राज्य के बड़े हिस्से में खेती और मैदानी इलाका है।

इसी बीच जंगलों पर दबाव भी अलग-अलग तरह से दिखता है।

“बिहार में अलग तरह के जंगल हैं। उत्तर में तराई क्षेत्र और दक्षिण में कैमूर की पहाड़ियां हैं। वाल्मीकि टाइगर रिजर्व को कुछ पहचान मिली है, लेकिन कैमूर क्षेत्र अब भी नजरअंदाज है और वहां खनन, जंगल कटाई और शिकार का दबाव है,” मैनेजिंग ट्रस्टी, विंध्यन इकोलॉजी एंड नेचुरल हिस्ट्री फाउंडेशन के देबादित्य सिन्हा कहते हैं।

पिछले कुछ सालों में बिहार के जंगलों में थोड़ी बढ़त और कमी दोनों देखी गई है। यह बदलाव सिर्फ जंगल कटने या बढ़ने से नहीं होता, बल्कि पेड़ों की सघनता और वन क्षेत्र के बाहर लगे पेड़ों से भी होता है। ISFR जंगल और ट्री कवर को अलग-अलग गिनता है। 

रिपोर्ट के अनुसार बिहार में लगभग 7,500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र वन आवरण के तहत आता है, जो राज्य के कुल क्षेत्र का करीब 7.7 प्रतिशत है। अगर आसान भाषा में कहा जाए, तो बिहार का कुल वन क्षेत्र पटना और गया जैसे बड़े जिलों के संयुक्त क्षेत्रफल के आसपास है।

वहीं ट्री कवर करीब 2.5 प्रतिशत के आसपास है, जिसमें खेतों, सड़कों और अन्य गैर-वन क्षेत्रों में लगे पेड़ शामिल होते हैं। जंगल और ट्री कवर को मिलाकर राज्य की कुल हरियाली का आकलन किया जाता है, जिसे आम तौर पर ग्रीन कवर कहा जाता है। बिहार का तकरीबन 10 फीसदी हिस्सा ही ग्रीन कवर के घेरे में है। 

बिहार में रिकॉर्डेड फॉरेस्ट एरिया के भीतर वन क्षेत्र में बदलाव भी देखने को मिला है। अत्यंत सघन वनों में करीब 56 वर्ग किलोमीटर की बढ़त दर्ज हुई है। वहीं मध्यम घने वन (MDF) में 32 वर्ग किलोमीटर की कमी दर्ज हुई है, जो जंगलों की गुणवत्ता में गिरावट का संकेत देता है। खुले वन (OF) लगभग स्थिर रहे, जबकि गैर-वन क्षेत्र में 25 वर्ग किलोमीटर की कमी दर्ज हुई। कुल मिलाकर यह बदलाव दिखाता है कि बिहार में जंगलों का विस्तार नहीं, बल्कि उनकी संरचना में बदलाव हो रहा है।

valmiki tiger reserve is the largest forest area in the state
वाल्मीकि टाइगर रिजर्व राज्य का सबसे बड़ा वन क्षेत्र है

बिहार के वनों के प्रमुख वृक्ष 

अगर बिहार के जंगलों के प्रमुख पेड़ों को देखा जाए तो आंकड़े दिखाते हैं कि बिहार के जंगलों में साल के पेड़ों का स्पष्ट प्रभुत्व है। वहीं अन्य प्रजातियों में संख्या और आयतन के बीच अंतर यह संकेत देता है कि जंगलों की संरचना समान नहीं है और कई हिस्सों में छोटे या कम घनत्व वाले पेड़ अधिक हैं।

बिहार के रिकॉर्डेड फॉरेस्ट एरिया में साल का स्पष्ट दबदबा है। इसकी संख्या करीब 2.38 करोड़ (23,780 हजार) है और अकेले इसका आयतन 8.88 मिलियन घन मीटर है, जो बाकी सभी प्रमुख प्रजातियों से कई गुना ज्यादा है। मोई के पेड़ों की संख्या 1.00 करोड़ (10,083 हजार) है, लेकिन इसका आयतन केवल 1.89 मिलियन घन मीटर है। इसके मुकाबले साजा/असन के पेड़ लगभग आधे यानी 57 लाख (5,701 हजार) हैं, फिर भी उनका आयतन 16.4 लाख घन मीटर तक पहुंचता है।

दूसरी तरफ बिहार के जंगलों में आक्रामक प्रजातियों की मौजूदगी भी दर्ज की गई है। यूं तो इनका फैलाव असमान है। मसलन लैंटाना (गुलमेंहदी) अकेले करीब 550 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है, जो दूसरी प्रमुख प्रजाति क्रोमोलेना के मुकाबले दोगुने से भी अधिक है। दोनों को मिलाकर लगभग 800 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र प्रभावित होता है, जबकि बाकी तीन प्रजातियों का फैलाव सीमित है। 

जहां बिहार की हरियाली फीकी पड़ रही है

वन का कुल क्षेत्र देखने से पूरी तस्वीर साफ नहीं होती। यह भी देखना जरूरी है कि विकास के लिए कितनी वन भूमि इस्तेमाल हो रही है।

भारत में अगर किसी परियोजना को जंगल की जमीन चाहिए तो उसे वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहत मंजूरी लेनी होती है। ये मंजूरी संसद में दर्ज होती है।

लोकसभा के आंकड़ों के अनुसार 2008–09 से 2022–23 के बीच बिहार में 6,166.85 हेक्टेयर वन भूमि गैर-वन उपयोग के लिए दी गई है।

हाल के सालों में भी यह दबाव बना हुआ है। राज्यसभा के आंकड़ों के अनुसार 2025 में बिहार में 93 परियोजनाओं को वन भूमि उपयोग की मंजूरी दी गई, जबकि 8 परियोजनाओं को पर्यावरण स्वीकृति मिली है।

हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि बिहार के सीमित वन क्षेत्र के पीछे अन्य कारण हैं।

“बिहार में जंगल कम होने के पीछे कई वजहें हैं। ज्यादा आबादी, खेती पर निर्भरता, सड़क और सिंचाई जैसे कामों के लिए जमीन का इस्तेमाल, बाढ़ और सूखा जैसे हालात, जंगलों का धीमा बढ़ना, आग और जंगलों का कटना,” टिन्सा इकोलॉजिकल फॉउंडेशन के फाउंडर डॉ. अमित कुमार कहते हैं।

क्या प्रतिपूरक वनीकरण काफी है

जब जंगल की जमीन किसी प्रोजेक्ट के लिए दी जाती है, तो नियम है कि उसके बदले पेड़ लगाए जाएं। इसे प्रतिपूरक वनीकरण कहते हैं।

संसदीय आंकड़ों के अनुसार बिहार में 2008–09 से 2022–23 के बीच करीब 5,800 हेक्टेयर में प्रतिपूरक वनीकरण किया गया है।

अगर हाल के वर्षों का आंकड़ा देखें, तो 2018–19 से 2022–23 के बीच लगभग 2,198 हेक्टेयर जंगल की जमीन इस्तेमाल हुई है। वहीं एक अध्ययन के मुताबिक इसी दौरान कुछ सालों में सैकड़ों से लेकर हजार हेक्टेयर तक वनीकरण किया गया। इसके अलावा राज्य ने बड़े स्तर पर पौधारोपण अभियान भी चलाए। जैसे जल-जीवन-हरियाली अभियान के तहत 2019 से 2023 के बीच 1205 लाख पौधे लगाए जाने का दावा किया गया।

लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि ये आंकड़े पूरी कहानी नहीं बताते।

“पेड़ों की संख्या बढ़ने का मतलब यह नहीं कि जंगल की गुणवत्ता भी बढ़ रही है। अक्सर नए पौधे पुराने घने जंगल की जगह नहीं ले पाते। इससे बेहतर और जैव विविधता वाले जंगल खत्म होकर कमजोर इलाकों में बदल जाते हैं,” डॉ. अमित कुमार कहते हैं।

वे यह भी बताते हैं कि बिहार में जो बढ़त दिखती है वह ज्यादातर खुले और मध्यम घने जंगलों में है, न कि घने जंगलों में।

“जैव विविधता की भरपाई के लिए सिर्फ पेड़ लगाना काफी नहीं है। जंगल के पूरे तंत्र को वापस लाना जरूरी है। लेकिन ज्यादातर योजनाएं सिर्फ पौधों की संख्या पर ध्यान देती हैं,” वे कहते हैं।

बजट, नीतियां और जमीन पर काम

बिहार का ग्रीन बजट, पर्यावरण को बजट में शामिल करने की एक कोशिश है। इसमें अलग-अलग विभागों के पर्यावरण से जुड़े खर्च को जोड़ा जाता है।

सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार 2020–21 में बिहार ने ग्रीन बजट के तहत 231 योजनाओं के लिए 5,693.88 करोड़ रुपये का प्रावधान किया था। लेकिन रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि कई योजनाओं पर खर्च नहीं हुआ। 66 ‘ग्रुप ए’ योजनाओं में से 13 में कोई खर्च दर्ज नहीं किया गया।

विशेषज्ञ कहते हैं कि सिर्फ योजनाएं बनाना काफी नहीं है, सही जानकारी और निगरानी भी जरूरी है।

“बिहार के जंगलों और वन्यजीवों की स्थिति पर खुली जानकारी की कमी है। राज्य को अपने जंगलों और जैव विविधता का पूरा आकलन करना चाहिए और वन प्रबंधन में सुधार करना चाहिए,” देबादित्य सिन्हा कहते हैं।

उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि बिहार में पर्यावरण की स्थिति कई कारणों से प्रभावित होती है। एक तरफ सरकार ग्रीन बजट और पौधारोपण जैसी पहल कर रही है। दूसरी तरफ जंगलों का कुल क्षेत्र कम है और कई सालों में हजारों हेक्टेयर जंगल की जमीन विकास के लिए दी गई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि असली चुनौती सिर्फ पेड़ बढ़ाने की नहीं है, बल्कि जंगल की गुणवत्ता और जैव विविधता को बचाने की है।

फिलहाल आंकड़े यही दिखाते हैं कि बिहार का ग्रीन बनने का सफर अभी जारी है।

(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)

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चंद्र प्रताप तिवारी भारत में पर्यावरण, वन्यजीवन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, और शहरी मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं। उनकी दिलचस्पी इस बात में है कि नीतियाँ क्या वादा करती हैं, ज़मीन पर काम क्या होता है, और इसके बीच नुकसान किसे उठाना पड़ता है। उनका काम फील्ड रिपोर्टिंग, दस्तावेज़ों और डेटा पर आधारित है। वे हिंदी और अंग्रेज़ी में लिखते हैं।

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