बिहार: वैशाली के राजापाकर बाजार की गलियों से गुजरते हुए जब आप नीलम देवी के घर के पास पहुंचते हैं, तो कानों में मशीनों की ‘खट-खट’ और आंखों के सामने सफेद चमकदार रेशों की कतारें एक बिल्कुल अलग दुनिया का अहसास कराती हैं। यह कहानी है उस कचरे की, जिसे कल तक बिहार के किसान अपने खेतों के लिए एक बड़ा बोझ समझते थे। आज वही कचरा न केवल वैशाली जिले की महिलाओं की तकदीर बदल रहा है, बल्कि जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक समस्या के खिलाफ एक खामोश लेकिन बेहद कारगर हथियार बनकर उभर रहा है।
दरअसल, बिहार के वैशाली जिले में अब तक किसान जिस चीज को ‘खेतों का बोझ’ और जलवायु विशेषज्ञ पर्यावरण के लिए ‘मीथेन का बम’ मानते थे, उसे राजापाकर की नीलम देवी सहित दर्जनों महिलाओं और जगत कल्याण जैसे उत्साही युवा उद्यमियों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की एक नई और मजबूत डोर बना दिया है। इन लोगों ने न केवल केले की खेती की पारंपरिक परिभाषा को चुनौती दी है, बल्कि कृषि-अपशिष्ट को ‘ग्रीन टेक्सटाइल’ में बदल कर एक सफल आंत्रप्रेन्योर और सफल स्टार्टअप्स के रूप में अपनी नई पहचान स्थापित की है।
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चुनौती से शुरू हुआ सफर
वैशाली के राजापाकर निवासी 43 वर्षीय नीलम देवी आज जब अपने प्लांट में खड़ी होती हैं, तो उनके चेहरे पर एक ऐसी संतुष्टि दिखती है जो बरसों के संघर्ष के बाद आती है। वे पुरानी बातों को याद करते हुए बताती हैं, “शुरुआत में संघर्ष पैसे से ज्यादा लोगों की सोच से था। पहले हम अपने बागानों में केले के उन भारी-भरकम तनों को काटकर फेंक देते थे या फिर वे खेतों के कोनों में सड़ते रहते थे। जब मुझे पहली बार पता चला कि इस सड़ांध के पीछे एक बेशकीमती रेशा छिपा है, तो मैंने इसे एक मिशन की तरह लिया।”
नीलम आगे बताती हैं कि जब वे सड़ते हुए तनों को इकट्ठा करने लगीं, तो गांव के लोग उन पर हंसते थे। लोग कहते थे कि पढ़ी-लिखी महिला होकर ये गंदगी ढोकर क्या मिलेगा?
लेकिन नीलम को अपनी 26 वर्षीय बेटी अदिति राज का साथ मिला। दोनों ने ठान लिया था कि वे इस मज़ाक को एक मिसाल में बदलेंगी। आज वही कचरा न केवल उनके घर का चूल्हा जला रहा है, बल्कि इलाके की दर्जनों महिलाओं की कमाई का मुख्य जरिया बन गया है।
केले के कचरे से मीथेन का खतरा
नीलम देवी के इस व्यक्तिगत जज्बे को एक बड़ा वैज्ञानिक आधार देते हैं हरिहरपुर स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के वरीय वैज्ञानिक डॉ. अनिल कुमार सिंह। डॉ. सिंह एक ऐसे सच से पर्दा उठाते हैं जो पर्यावरण के लिहाज से बेहद डरावना है। वे बताते हैं, “केले की फसल कटने के बाद किसान तनों को खेत में ही सड़ने के लिए छोड़ देते हैं। यह सड़ता हुआ जैविक कचरा भारी मात्रा में ‘मीथेन गैस’ पैदा करता है।

वैज्ञानिक अनुसंधान बताते हैं कि मीथेन, ग्लोबल वार्मिंग के लिए कार्बन डाइऑक्साइड से 25 गुना ज्यादा खतरनाक है।”
डॉ. सिंह के मुताबिक, मीथेन जलवायु परिवर्तन में दूसरा सबसे बड़ा योगदानकर्ता है। वे कहते हैं, “नीलम देवी और जगत कल्याण जैसे लोग जो कर रहे हैं, वह सिर्फ एक बिजनेस मॉडल नहीं है, बल्कि हमारी धरती को बचाने का एक बड़ा मिशन है। मीथेन पृथ्वी के वायुमंडल में गर्मी को रोकता है और ग्लोबल वार्मिंग के लिए लगभग 30 फीसदी तक सीधे तौर पर जिम्मेदार है।”
बिहार के वैशाली, नवगछिया और कटिहार जैसे जिलों में 31,000 हेक्टेयर से अधिक भूमि पर केले की खेती होती है। एक एकड़ के केले के खेत से औसतन 40 टन तक कृषि-अपशिष्ट निकलता है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, प्रति टन तने से 15 से 20 किलो तक उच्च गुणवत्ता वाला रेशा आसानी से निकल जाता है। केले का यह फाइबर 100% बायोडिग्रेडेबल है। इसमें से निकलने वाले अवशेष (पल्प) से बेहतरीन जैविक खाद बनती है और इसके तरल रस का उपयोग तरल उर्वरक, औषधीय और प्राकृतिक रंगों के निर्माण में किया जाता है।
नीलम देवी के साथ-साथ वैशाली के ही जगत कल्याण इस औद्योगिक क्रांति का दूसरा बड़ा चेहरा बनकर उभरे हैं। वर्ष 2021 में इस काम में कदम रखने वाले जगत बताते हैं कि शुरू में उन्हें बाजार खोजने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। लेकिन आज वे बनाना फाइबर के उत्पादों से सालाना लाखों का मुनाफा कमा रहे हैं।

जगत ने हाजीपुर इंडस्ट्रियल एरिया में एक व्यवस्थित प्लांट लगाया है। वे बताते हैं, “आज हम हर महीने 4 से 5 टन बनाना फाइबर तैयार कर रहे हैं। बिहार का यह फाइबर अब सिर्फ स्थानीय बाजारों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसकी सप्लाई केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी हो रही है, जहाँ से इसे अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक भेजा जाता है।”
जगत का मॉडल भी पूरी तरह से ईको-फ्रेंडली है। वे फाइबर निकालने के बाद बचने वाले गुदे से कंपोस्ट और तरल पदार्थ से लिक्विड कंपोस्ट (जैविक खाद) बनाकर नर्सरी और किसानों को बेचते हैं। जगत के मॉडल की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे किसानों को भी इस कमाई का हिस्सा बनाते हैं। वे आसपास के किसानों से 15 से 20 रुपये प्रति तने के हिसाब से खरीदारी करते हैं, जिससे किसान अब केले की फसल के साथ-साथ उसके कचरे से भी मुनाफा कमा रहे हैं।
महिलाओं का स्वावलंबन और ट्रेनिंग का विस्तार
कृषि विज्ञान केंद्र की विषय वस्तु विशेषज्ञ डॉ. कविता वर्मा इस पूरे अभियान को तकनीकी मजबूती दे रही हैं। वे बताती हैं कि वैशाली जिले में अब यह एक क्लस्टर का रूप ले चुका है। डॉ. कविता कहती हैं, “ट्रेनिंग के दौरान हम महिलाओं को सिर्फ रेशा निकालना नहीं, बल्कि उसकी वैल्यू एडिशन भी सिखाते हैं। यह फाइबर रेशम जैसा चमकदार और जूट से कहीं अधिक मजबूत होता है, जिससे बैग, मैट और घर की सजावट का सामान बनाया जाता है।”
डॉ. कविता बताती हैं कि अब इस मॉडल की गूँज भागलपुर तक पहुँच चुकी है। भागलपुर, जो अपने सिल्क के लिए जाना जाता है, वहां के किसान भी अब केले के कचरे से रेशा निकालने की तकनीक में रुचि दिखा रहे हैं।

नीलम देवी की यूनिट में काम करने वाली महिलाओं की बातचीत में एक अलग ही आत्मविश्वास झलकता है। यहाँ काम करने वाली एक महिला बताती हैं, “पहले हमें काम के लिए दूर जाना पड़ता था और उसमें वह सम्मान नहीं था। अब हम जानते हैं कि हम जो बना रहे हैं, वह प्लास्टिक को खत्म करने में मदद करेगा। हम गंदगी से चांदी जैसा रेशा निकाल रहे हैं।” नीलम देवी कहती हैं कि चार साल पहले जब उन्होंने और उनकी बेटी अदिति राज ने यह काम शुरू किया था, तब उनके पास सिर्फ एक विचार था। आज उनके पास एक पहचान है। वे गर्व से कहती हैं कि अब उनके इलाके में केले के तने खेतों में लावारिस नहीं पड़े रहते, वे अब एक ‘रिसोर्स’ बन चुके हैं।
भले ही वैशाली में यह मॉडल सफल हो गया है, लेकिन राह में अभी भी कई चुनौतियां हैं। सबसे बड़ी समस्या आधुनिक मशीनों की उपलब्धता और बड़े ब्रांड्स के साथ सीधा जुड़ाव न होना है। नीलम और जगत जैसे उद्यमियों का मानना है कि अगर सरकार मार्केटिंग और बड़े क्लस्टर्स बनाने में और अधिक सहयोग करे, तो बिहार का यह ‘बनाना फाइबर’ वैश्विक सस्टेनेबल फैशन इंडस्ट्री का बड़ा हिस्सा बन सकता है।
(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)
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