बिहार, भारत का तीसरा सबसे ज़्यादा आबादी वाला राज्य, देश का सबसे बाढ़-प्रवण राज्य भी है। यहाँ उत्तर बिहार की लगभग 76% आबादी हर साल भीषण बाढ़ के खतरे में रहती है। राज्य का करीब 73% क्षेत्र, यानी 94,160 वर्ग किलोमीटर में से 68,800 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र बाढ़ से प्रभावित होता है। हर साल बाढ़ सिर्फ जानें नहीं लेती, बल्कि करोड़ों की संपत्ति और लाखों पशुधन को भी नुकसान पहुँचाती है। इस साल अब तक बिहार के 10 ज़िलों में 25 लाख से अधिक लोग बाढ़ की चपेट में आए हैं, और कई नदियाँ खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं।
सबसे अधिक प्रभावित वे लोग होते हैं, जिनका घर नदी के किनारे या उसके आसपास है। हर साल लोग अपनी मेहनत से बनाए घर छोड़ने के लिए मजबूर हो जाते हैं, और अपनी आंखों के सामने घरों को पानी में बहते हुए देखते हैं।
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कुछ ऐसा ही हाल है पटना में गंगा के बीच बसे एक नदी द्वीप, नक्टा दियारा का। नक्टा दियारा पटना सदर की एक ग्राम पंचायत है, जहां मुख्य रूप से यादव समाज के लोग रहते हैं। यहाँ सालभर हरियाली रहती है, और ये इलाका शहर के लिए ताज़ी सब्ज़ियाँ नियमित रूप से सप्लाई करता है। साथ ही, यहाँ के लोग हज़ारों पशुधन पाले हुए हैं। दूध का उत्पादन और उसकी बिक्री उनकी आजीविका का अभिन्न हिस्सा है।
मवेशियों की सबसे बड़ी चुनौती
नक्टा दियारा के लोग पीढ़ियों से पुल न होने के कारण नाव के सहारे ही आवागमन करते आए हैं। लेकिन बाढ़ के दिनों में, जब गंगा का पानी बढ़ जाता है, तो हालात बेहद गंभीर हो जाते हैं। ज़िंदगी जैसे ठहर सी जाती है।
जिन घरों में पानी घुस आता है, वहां के लोग जो कुछ भी बचा सकते हैं, बचाते हैं और उन्हें समेट शहर की ओर निकल पड़ते हैं, जहां एक अनिश्चित भविष्य उनका इंतजार करता रहता है।
सबसे बड़ी मुश्किल पशुपालकों के सामने आती है क्योंकि उन्हें अपने साथ-साथ मवेशियों को भी सुरक्षित रखना पड़ता है।
जैसे ही पानी का स्तर बढ़ता है, मवेशी अपनी आवाज़ से मालिक को चेतावनी देते हैं। मजबूरी में उन्हें नाव पर चढ़ाना पड़ता है। लेकिन यह सफर आसान नहीं होता, ख़ासकर उन जानवरों के लिए जो इस तरह की यात्रा के आदी नहीं हैं।
जलवायु बदलाव के ये मूक पीड़ित, शारीरिक और मानसिक दोनों तरह का भारी तनाव झेलते हैं।
बीमारियों और आर्थिक दबाव का दोहरा संकट
पीढ़ियों से दूध का व्यापार करने वाले वल्मीकि राय आजकल अपना समय नदी के किनारे, मरीन ड्राइव पर, मवेशियों के लिए बनाए गए अस्थायी शेड में उनकी देखभाल करते हुए बिता रहे हैं। वह बताते हैं कि अचानक पानी बढ़ जाने पर कई बार मवेशी डूबकर मर जाते हैं। उन्हें नाव पर लादकर शहर ले जाना बहुत मुश्किल होता है, कई बार वे रास्ते में चोटिल भी हो जाते हैं। इससे उनका तनाव बढ़ता है और बीमारी भी हो जाती है। इससे उनका आर्थिक जीवन भी सीधे तौर पर प्रभावित होता है।
पशु चिकित्सक मानते हैं कि बाढ़ और जलवायु संकट का असर सिर्फ इंसानों पर ही नहीं, बल्कि मवेशियों पर भी गहरा पड़ता है। लंबे समय तक पानी में रहने या बार-बार जगह बदलने के कारण मवेशियों में मानसिक तनाव और मूड स्विंग्स देखने को मिलते हैं, जिससे उनकी सेहत और दूध उत्पादन क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
पटना पशु चिकित्सा महाविद्यालय के निदेशक (विस्तार) डॉ. उमेश सिंह बताते हैं कि बाढ़ का पानी कई तरह की बीमारियाँ लेकर आता है। इनमें फुट-एंड-माउथ डिज़ीज़ (FMD), लम्पी स्किन डिज़ीज़, लीप्टोस्पाइरोसिस, गलघोटू (हेमरेजिक सेप्टीसीमिया) और पेट से जुड़ी परजीवी बीमारियाँ प्रमुख हैं। इनसे जानवरों की तबीयत बहुत बिगड़ सकती है और कई बार जानलेवा भी साबित होती है। बहुत सारे जानवरों को एक साथ किसी एक जगह पर रखा जाता है, तो बीमारी फैलने का ख़तरा और भी बढ़ जाता है।
वे ज़ोर देते हैं कि ऐसी परिस्थितियों में पशुपालकों को अपने मवेशियों की नियमित डिवॉर्मिंग और समय पर टीकाकरण बेहद ज़रूरी है।
2016 में असम के काजीरंगा नेशनल पार्क में बाढ़ ने 200 से अधिक जंगली जानवरों की जान ले ली, जिनमें 17 दुर्लभ एक-सींग वाले गैंडे भी थे। दुनिया भर में भी ऐसी कहानियाँ आम हैं। 2018 में नाइजर में आई बाढ़ ने 30,000 से अधिक मवेशियों की जान ले ली।
अगर बिहार की बात करें, तो सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2015 से 2024 तक यानी की 10 साल में बाढ़ से 1483 मवेशियों की मृत्यु हो गई और 51.93 लाख मवेशी प्रभावित हुए।
बाढ़ के समय नक्टा दियारा के नाविकों पर जिम्मेदारी का बोझ बढ़ जाता है। नाविक जालंधर राय की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। वह और उनके जैसे अन्य नाविक हफ्तों से दिन-रात नाव चला रहे हैं। थकान और नींद की कमी के कारण वे खुद को बीमार महसूस कर रहे हैं, लेकिन उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। अपने गाँव वालों को ऐसे संकट में अकेला छोड़ना उनके लिए असंभव है। जालंधर और उनका 11 साल का बेटा पूरे दिन धूप और बारिश में, और देर रात तक लोगों को नाव में बिठाकर सुरक्षित स्थान तक पहुँचाते हैं। लेकिन सबसे ज्यादा कठिनाई तब होती है जब उन्हें मवेशियों को नाव पर चढ़ाना पड़ता है।
1-2 महीनों तक सड़क किनारे लगे अस्थायी टेंटों में हज़ारों मवेशी मजबूरी में अपना समय काटते हैं। उनके साथ उनके मालिक भी वहीं रहते हैं, दिन-रात देखभाल करते हुए, उन्हीं के बीच सोते-जागते हुए। पानी घटने पर मवेशियों को नावों से वापस गाँव ले जाया जाता है, लेकिन वहाँ पहुँच कर भी उनकी परेशानी ख़त्म नहीं होती।
पशुपालक बताते हैं कि बाढ़ से उबरने के बाद इन जानवरों को दोबारा सामान्य होने में हफ़्तों लग जाते हैं। तनाव और थकान धीरे-धीरे कम होती है, तब जाकर वे खुले मैदानों में अपनी मर्ज़ी से घूम-चर पाते हैं।
लेकिन इन सबके कारण, हर साल लगभग 2–3 महीने की कमाई बाढ़ के दौरान जानवरों की देखभाल और दवाइयों पर ही खर्च हो जाती है। इसी वजह से पशुपालक और उनके परिवार आर्थिक दबाव में रहते हैं, और उनका जीवन और भी मुश्किल हो जाता है।
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