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कोसी कटान में उजड़े आशियाने, दशकों से पुनर्वास के इंतज़ार में बाढ़ विस्थापित

रेयाजुल जैसे हज़ारो लोग बिहार में वार्षिक बाढ़ विभीषिका का शिकार होते हैं और दशकों के इंतज़ार के बाद भी उनका पुनर्वास नहीं हो पाता है। सहरसा जिले में कोसी नदी हर साल अपने रौद्र रूप से तबाही मचाती है।

Sarfaraz Alam Reported By Sarfraz Alam |
Published On :
homes destroyed in kosi erosion, flood displaced waiting for rehabilitation for decades

बिहार के सहरसा के रहने वाले मोहम्मद रेयाजुल एक दिहाड़ी मज़दूर हैं, दशकों पहले उन्होंने पाई पाई जोड़कर करीब 50,000 रुपए की लागत से अपने गाँव छतवन में पुस्तैनी ज़मीन पर एक घर बनाया था। लेकिन 2016 में आई बाढ़ में उनका घर कोसी नदी में बह गया। छोटे-छोटे बच्चों को लेकर परिवार के साथ अपने गाँव से करीब 3 किलोमीटर दूर मझौल पूर्वी कोसी तटबंध पर आ कर बस गए। यहाँ फिर से अपना आशियाना बसाने में रेयाजुल को करीब 70,000 रुपए खर्च करने पड़े।


रेयाजुल जैसे हज़ारो लोग बिहार में वार्षिक बाढ़ विभीषिका का शिकार होते हैं और दशकों के इंतज़ार के बाद भी उनका पुनर्वास नहीं हो पाता है। सहरसा जिले में कोसी नदी हर साल अपने रौद्र रूप से तबाही मचाती है। नौहट्टा और महिषी प्रखंड के दर्जनों गांवों में यह दृश्य आम हो चुका है। हर वर्ष बाढ़ का पानी न जाने कितने लोगों के सपनों को अपने साथ बहा ले जाता है। लोगों का बना-बनाया आशियाना, उनकी जमीन, उनकी मेहनत, सब कुछ कुछ ही दिनों में पानी में समा जाते हैं। बिहार आपदा प्रबंधन के आकड़ों के अनुसार 2024 में आई बाढ़ से बिहार में 10,135 घर कटे थे। बाढ़ के कारण मजबूर होकर लोग अपने गांव छोड़ देते हैं और कोसी तटबंध के किनारे शरण लेने को विवश हो जाते हैं। वहां वे सालों से सड़क किनारे झोपड़ियां बनाकर जीवन यापन कर रहे हैं। एक छोटा सा घर बनाने में करीब 1 से 2 लाख रुपये खर्च हो जाते हैं, लेकिन हर साल बाढ़ उस घर को उजाड़ देती है। यह दर्द और संघर्ष साल दर साल दोहराता रहता है।

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कोसी बेसिन पर केंद्रित अंतर्राष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र (ICIMOD) की एक रिपोर्ट के अनुसार नदी बेसिनों में कटाव और सेडिमेंटेशन या तलछट जमाव के लिए प्राकृतिक और मानवजनित दोनों कारण जिम्मेदार होते हैं, हालांकि प्राकृतिक कारणों का प्रभाव अधिक व्यापक होता है। कोसी में ज्यादा तलछट आने की मुख्य वजह इसकी जटिल भौगोलिक संरचना है, जिसमें अलग-अलग हिमालयी क्षेत्र शामिल हैं। ये क्षेत्र टेक्टोनिक गतिविध) के कारण सक्रिय रहते हैं, जिससे भूस्खलन और मिट्टी का बहाव बढ़ता है। इसके अलावा, पहाड़ों पर वनों की कटाई और खराब भूमि उपयोग भी कटाव को तेज करते हैं। मानसून के दौरान तेज बारिश इन प्रक्रियाओं को और बढ़ा देती है, जिससे बड़ी मात्रा में तलछट नदियों के मैदानी हिस्सों में आकर जमा हो जाती है। तटबंधों के कारण नदी का फैलाव सीमित हो जाता है, जिससे तलछट जमाव और बढ़ता है। इससे नदी का तल ऊंचा हो जाता है, जिसके कारण तटबंध टूटने, बाढ़ और किनारों के कटाव का खतरा बढ़ जाता है। साथ ही, नदी के रास्ता बदलने की संभावना भी अधिक हो जाती है।


नौहट्टा की अंचलाधिकारी मोनी बहन बताती हैं कि बाढ़ से प्रभावित लोगों को सरकार की तरफ से ₹7000 की सहायता राशि दी जाती है पिछले साल जो लोग बाढ़ से प्रभावित हुए उन सभी को राशि दे दी गई है। कोसी बाढ़ पीड़ितों के बीच लम्बे समय से काम करने वाले कोसी नवनिर्माण मंच के संस्थापक महेंद्र यादव कहते बाढ़ पीड़ितों का पुनर्वास एक बड़ा मसला है, जिसके ठोस समाधान से सरकार अब भी कोसों दूर है।

(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)

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एमएचएम कॉलेज सहरसा से बीए पढ़ा हुआ हूं। फ्रीलांसर के तौर पर सहरसा से ग्राउंड स्टोरी करता हूं।

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