अप्रैल अभी खत्म भी नहीं हुआ है, लेकिन बिहार में तापमान 40–45 डिग्री पार कर चुका है। लू की शुरुआत तय समय से पहले हो चुकी है और कई जिलों में हालात जानलेवा होते जा रहे हैं। भारत मौसम विज्ञान विभाग, पटना के अनुसार, बिहार में हीट वेव की स्थिति तेजी से बन रही है। अगले 2–3 दिनों में राज्य के उत्तर-पश्चिम, दक्षिण-पश्चिम और दक्षिण-मध्य हिस्सों के कई जिलों में तापमान 40°C से ऊपर और सामान्य से 3–4 डिग्री अधिक रहने की संभावना है। 21–22 अप्रैल 2026 के लिए मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर और वैशाली समेत कई जिलों में लू की चेतावनी जारी की गई है।
क्या है हीट वेब
जब किसी क्षेत्र का तापमान उसके सामान्य स्तर से काफी ऊपर चला जाता है और लगातार गर्म हवाएं चलती हैं, तो उसे हीट वेव या लू कहा जाता है। भारत मौसम विज्ञान के अनुसार, मैदानी इलाकों में 40°C या उससे अधिक तापमान और सामान्य से उल्लेखनीय वृद्धि होने पर यह स्थिति बनती है। भारत में सबसे अधिक हीट वेव मई-जून महीने में चलती है। पहले लू का प्रभाव केवल मई और जून के महीनों में दिखता था, लेकिन अब अप्रैल की शुरुआत से ही पारा 40 डिग्री पार करने लगा है।
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पर्यावरण विज्ञान विभाग, साउथ बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया के मौसम विज्ञानी प्रो. प्रधान पार्थ सारथी के अनुसार, बिहार में अप्रैल के दौरान पड़ रही भीषण गर्मी का मुख्य कारण सतही तापमान में अचानक वृद्धि और तेज़ पछुआ हवाएं हैं, जो अफगानिस्तान और पाकिस्तान के शुष्क इलाकों से होकर राज्य में प्रवेश करती हैं और अपने साथ अत्यधिक गर्मी लाती हैं। वह बताते हैं कि कैमूर, रोहतास, गया, शेखपुरा और नवादा जैसे जिले अपनी भौगोलिक बनावट के कारण अधिक संवेदनशील हैं, जहां विंध्य क्षेत्र की पथरीली सतह और पठारी हवाएं लू को और तीव्र बना देती हैं। उनके अनुसार, वर्तमान में क्लाउडी बादल की कमी और प्री-मानसून गतिविधियों के सक्रिय न होने के कारण लू की स्थिति बनी हुई है और जब तक ये स्थितियां नहीं बनतीं, तब तक राहत की संभावना कम है।
क्या कहते हैं आंकड़े?
बिहार में हीट वेव या लू से होने वाली मौतों के आंकड़े अलग-अलग सरकारी दस्तावेज़ों में अलग-अलग नजर आते हैं, जिससे वास्तविक स्थिति को समझना मुश्किल हो जाता है।
संसद में दिए गए जवाब के अनुसार, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों में वर्ष 2019 में बिहार में 215 लोगों की मौत दर्ज की गई है। वहीं, बिहार सरकार के हीट एक्शन प्लान 2024 में यही संख्या घटकर 117 बताई गई है। इसके अलावा, आपदा जोखिम न्यूनीकरण रोडमैप – 1.0 (2025–30) के अनुसार 2019 में हीट वेव से लगभग 55 लोगों की मृत्यु हुई है। यह सिर्फ एक साल नहीं बल्कि हर साल के आकड़ें अलग अलग दिखते हैं।
HAP 2024 के अनुसार, वर्ष 2018 से 2021 के0 बीच हीट वेव से कुल 291 लोगों की मौत हुई। वहीं आपदा जोखिम न्यूनीकरण रोडमैप 2025–2030 इस अवधि में मौतों की संख्या 225 बताता है। इसके विपरीत, संसद में दिए गए आंकड़े, जो राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर आधारित है, के अनुसार इसी अवधि (2018–2021) में 389 लोगों की मौत दर्ज की गई है।
जलवायु जोखिम सूचकांक में बिहार कहां?
विज्ञान और प्रोद्यौगिकी विभाग द्वारा तैयार क्लाइमेट वल्नरेबिलिटी असेसमेंट रिपोर्ट में जलवायु संकट का सामना करने में देश के 50 कमजोर जिलों में बिहार के 15 जिले शामिल हैं। बिहार के जिन 15 जिलों का जिक्र है, उनमें 12 उत्तर बिहार के हैं, जो हिमालय की तराई में स्थित हैं। ये जिले भीषण किस्म की मौसमी आपदाओं का सामना करते हैं। बाढ़, आंधी तूफान, वज्रपात आदि आपदाएं यहां नियमित हैं। 55.27 के स्कोर के साथ बिहार, देश का सबसे अधिक जलवायु-संवेदनशील राज्य बनकर उभरा है।
2019 में लू के चलते गया देश में पहला जिला बन गया था जहां जिलाधिकारी को अपनी प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते धारा 144 यानी कर्फ्यू लगा दिया था।
बिहार के हीट एक्शन प्लान 2024 के अनुसार, आने वाले दशकों में राज्य के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में अत्यधिक तापमान वाले दिनों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। आकलनों के मुताबिक, वर्ष 2041 से 2070 के बीच ऐसे दिनों की संख्या बढ़कर लगभग 6 से 9 दिन तक पहुंच सकती है, जबकि सदी के अंत तक यानी 2071 से 2100 के दौरान यह आंकड़ा 9 से 12 दिन तक होने का अनुमान है।

इससे मालूम होता है कि भविष्य में हीट वेव की घटनाएं न केवल अधिक बार होंगी, बल्कि उनकी अवधि और तीव्रता भी बढ़ेगी। ऐसे में राज्य का पहले से ही दबाव झेल रहा स्वास्थ्य ढांचा और जलवायु पर निर्भर आजीविका खासतौर पर कृषि और असंगठित मजदूर और अधिक जोखिम में आ सकते हैं।
बिहार सरकार की तैयारी
बिहार में हीट वेव से निपटने के लिए नीति स्तर पर कुछ अहम पहलें की गई हैं। राज्य का हीट एक्शन प्लान 2024 पहले से लागू है, और हाल ही में बिहार सरकार ने बिहार आपदा जोखिम न्यूनीकरण रोडमैप 1.0 (2025–2030) को 29 जनवरी 2026 को सैद्धांतिक स्वीकृति दे दी है। हीटवेव एक्शन प्लान 2024 के तहत वर्ष 2022 में हीट वेव (लू) को भी एक स्थानीय आपदा के रूप में चिन्हित किया गया, जिससे इस पर SDRF फंड के उपयोग का रास्ता खुलता है। राज्य आपदा राहत कोष (SDRF) के तहत उपलब्ध कुल धनराशि का 10 प्रतिशत तक हिस्सा ऐसी घटनाओं पर खर्च किया जा सकता है। लेकिन जब इस फंड के वास्तविक उपयोग और हीट वेव के खिलाफ जमीनी तैयारियों पर सवाल पूछा गया, तो तंत्र ने चुप्पी साध ली।
बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, राज्य में मौसम से जुड़ी आपदाओं से निपटने के लिए तकनीकी निगरानी को मजबूत किया जा रहा है। हालांकि, इस साल गर्मी ने तय समय से पहले ही असर दिखाना शुरू कर दिया है।
उक्त अधिकारी कहते हैं, “बिहार में तापमान तेजी से बढ़ा है और यह स्थिति लगभग 20 दिन पहले ही आ गई है, जो चिंता का संकेत है।” मौतों के आंकड़ों के अलग अलग डेटा पर कहते हैं कि सरकार के पास अभी ऐसा कोई प्रभावी टूल नहीं है, जिससे हीट वेव से होने वाली मौतों का सटीक आंकड़ा निकाला जा सके। स्वास्थ्य विभाग भी इन आंकड़ों को लेकर उतना सतर्क नहीं रहता। बिहार आपदा जोखिम न्यूनीकरण रोडमैप 1.0 (2025–2030) पर वह बताते हैं, “हीट वेव को पूरी तरह समाप्त करना संभव नहीं है, इसलिए रणनीति अब अनुकूलन पर केंद्रित की गई है। हम हीट वेव को रोक नहीं सकते, इसलिए एडॉप्टेशन पर काम किया जा रहा है। मौजूदा स्थिति को देखते हुए सभी संबंधित विभागों को फिर से अलर्ट भेजा गया है, ताकि वे अपने-अपने जिलों में उसी अनुसार तैयारी कर सकें।”

विभागवार जिम्मेदारी बनाम जमीनी हकीकत
अलग-अलग विभागों में हीट वेव को लेकर की जा रही तैयारियों की पड़ताल की। तस्वीर यह सामने आई कि कागज़ पर बने एक्शन प्लान का असर ज़मीन पर सीमित दिख रहा है।
मनरेगा विभाग की तैयारियों के संबंध में मुजफ्फरपुर के कुढ़नी प्रखंड की मनरेगा मजदूर आशा देवी बताती हैं कि बढ़ती गर्मी ने काम की परिस्थितियों को बेहद कठिन बना दिया है। वह कहती हैं, “हम लोग सुबह 6 बजे काम पर निकलते हैं और 12 बजे तक लौट आते हैं, लेकिन काम की जगह पर न तो शेड (छांव) है और न ही पीने के पानी की व्यवस्था। उनके मुताबिक, जल्दी काम पर जाने के कारण कई बार बिना खाना खाए ही निकलना पड़ता है। हीट वेव को लेकर किसी जागरूकता अभियान की जानकारी भी उन्हें नहीं है। “होर्डिंग भी शहर के आसपास ही दिखते हैं, गांवों तक कोई जानकारी नहीं पहुंचती,” वह कहती हैं।
शिक्षा विभाग की तैयारियों को लेकर ‘मैं मीडिया’ ने कुछ टीचरों से बात की। समस्तीपुर जिले के एक सरकारी स्कूल के शिक्षक ने नाम नहीं प्रकाशित करने की शर्त पर कहा, “हीट वेव से निपटने के लिए कोई विशेष बजट या स्पष्ट निर्देश नहीं मिले हैं। कंपोजिट ग्रांट से स्कूल मेंटेनेंस पर खर्च किया जा सकता है, लेकिन हीट वेव को लेकर कोई विशेष नोटिफिकेशन नहीं आया है।” हालांकि, जिला प्रशासन समय-समय पर स्कूल के समय में बदलाव और गर्मी की छुट्टी जैसे निर्देश जारी करता है। “सुरक्षित शनिवार” कार्यक्रम के तहत बच्चों को आपदा से बचाव की जानकारी दी जाती है, लेकिन रूफ पेंटिंग या ठंडा रखने के उपायों पर कोई निर्देश नहीं मिले हैं। स्कूलों में कुल ड्रिकिंग वाटर के नाम पर बस चापाकल का इस्तेमाल होता है अलग से कोई व्यवस्था नहीं होती है।
स्वास्थय विभाग की बात करें, तो ज्यादातर अस्पतालों में हीट वेव से राहत की तैयारी नहीं दिखती है। श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (SKMCH), जो उत्तर बिहार का एक प्रमुख स्वास्थ्य केंद्र है, वहां भी हीट वेव के बीच हालात चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं। अस्पताल में भर्ती रहमती बेगम ने बताया कि उन्हें गर्मी से कोई राहत नहीं मिल रही है। वह कहती हैं, “मैं 13 अप्रैल को यहां आई थी। बुखार और पेट दर्द था, लेकिन जिस एस्बेस्टस वाले कमरे में रखा गया है, वहां और ज्यादा गर्मी लगती है। पंखा भी खराब है, रात में सो नहीं पाते। इस गर्मी में तो स्वस्थ लोग बीमार पड़ जाएं, हम तो पहले से मरीज हैं।” हालांकि, अस्पताल प्रशासन तैयारी का दावा करता है। अस्पताल के अधीक्षक डॉ. महेश प्रसाद के अनुसार, हीट स्ट्रोक के लिए डेडिकेटेड वार्ड बनाया गया है, हालांकि अभी रिपोर्टिंग कम है। इमरजेंसी के ऊपर बने एस्बेस्टस वार्ड को खाली कराने की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। ऊर्जा व्यवस्था को लेकर वह स्वीकार करते हैं कि अस्पताल के नए भवनों में सोलर सिस्टम मौजूद है, लेकिन पुराने हिस्सों में अब भी इसकी कमी है, जिससे लगातार बिजली और कूलिंग की व्यवस्था प्रभावित होती है।

शहरी प्रबंधन में भी हीट वेव को लेकर कोई खास तैयारी नहीं दिखती है। पटना नगर निगम के एक अधिकारी के अनुसार, शहर में स्थायी रैन बसेरे तो संचालित हो रहे हैं, लेकिन अस्थायी रैन बसेरे केवल सर्दियों के दौरान ही चलाए जाते हैं। हीट वेव के दौरान राहत व्यवस्था पर पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि मौसम पूर्वानुमान को लेकर किसी व्यापक डिजिटल डिस्प्ले सिस्टम की व्यवस्था नहीं है। फिर भी निगम द्वारा माइकिंग के माध्यम से लोगों को जानकारी दी जाती है।
क्या कहते है विशेषज्ञ
आपदा प्रबंधन विभाग (बिहार) की तरफ से निकलने वाली पत्रिका के पूर्व वरीय संपादक कुलभूषण ने कहा कि आपदा विभाग डेटा की सत्यता पर ज्यादा ध्यान नहीं देते हैं, क्योंकि आपदा विभाग द्वारा अलग-अलग डेटा आने का एक कारण यह भी है कि जितने लोगों को आपदा विभाग मुआवजा देता है उतने को ही शायद नोटिफाइड करता है इसलिए डेटा कम दिखता है। वहीं आपदा और जागरूकता के सवाल पर उन्होंने कहा कि दरअसल बिहार राज्य में साल 2005 से ही गर्मी के मौसम में असामान्य गर्म हवाएं/लू का सामना कर रहा है। हीट वेव स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, अर्थव्यव्स्था पर गंभीर प्रभाव डालती है। प्रतिवर्ष होने वाली ये अकाल मौतें कई घरों से रोटी कमाने वाला ही छीन लेती हैं। इसका सबसे ज्यादा शिकार ग़रीब मजदूर तबका होता है। कुपोषण और गंभीर स्वास्थ्य रोगों से जूझता ग़रीब मजदूर-किसान वर्ग इन बीमारियों की चपेट में आसानी से आ जाता है। क्योंकि इन लोगों को हीट वेव की स्थिति में भी काम करने के लिए बाहर जाना पड़ता है। SDRF के धनराशि के उपयोग पर उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका ज़्यादातर पैसा सिर्फ रिलीफ में खर्च होता है।
पूसा विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक ए. सत्तार के अनुसार, बिहार पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील राज्य है, जिसके कारण हीट वेव का असर यहां अधिक गंभीर रूप में देखने को मिलता है चाहे वह जानमाल का नुकसान हो या आर्थिक क्षति। वे बताते हैं कि किसानों में हीट वेव को लेकर अभी भी पर्याप्त जागरूकता नहीं है और इससे सबसे ज्यादा प्रभावित वर्गों में किसान शामिल हैं। उनके अनुसार, हीट एक्शन प्लान 2024 के तहत गांव स्तर पर चौपाल और जागरूकता कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि किसान न केवल अपनी जान की सुरक्षा कर सकें, बल्कि फसलों और आय के नुकसान से भी बच सकें।
साफ है कि बिहार में हीट वेव अब एक मौसमी घटना भर नहीं, बल्कि एक स्थायी जलवायु संकट का रूप ले चुकी है। नीतियां और एक्शन प्लान कागज़ों पर मौजूद हैं, लेकिन ज़मीन पर उनकी प्रभावशीलता सीमित दिखती है।
(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)
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