बिहार के किशनगंज जिले के हलामाला का इतिहास डेढ़ सौ वर्ष से भी अधिक पुराना है। यह जगह कभी विशाल हालामाला एस्टेट हुआ करती थी। एस्टेट की ऐतिहासिक पृष्टभूमि को जानने हम किशनगंज शहर से 14 किलोमीटर दूर हालामाला पंचायत स्थित हालामाला गांव पहुंचे।
‘हालामाला एस्टेट’ के साइन बोर्ड से करीब 100 मीटर की दूरी पर हमें एक मस्जिद और उसके सामने पुराना कुआं दिखा। स्थानीय लोगों ने जानकारी दी कि 2017 तक यहां हालामाला एस्टेट की डेढ़ सौ वर्ष पुरानी जामा मस्जिद थी जिसके जर्जर होने पर लोगों ने उसकी जगह नई मस्जिद बनवाई।
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हालामाला में एस्टेट की निशानी के तौर पर कुछ पुराने कुएं और एक जर्जर सी इमारत है। इमारत का आधे से अधिक भाग ख़त्म हो चुका है जहां आज ज़मींदारों के वंशज ने नए घर बना लिए हैं। बची हुई जर्जर इमारत आज भी अंग्रेजी हुकूमत के दौर वाली वास्तुकला की निशानी है। यहां कुछ वर्षों पहले तक लोग रहते थे लेकिन अब इसकी हालत बेहद जर्जर हो चुकी है। दीवारों में पेड़ निकल आए हैं और जगह जगह से छत कमज़ोर हो चुकी है।
“इस मकान में 4 भाग थे। पश्चिम भाग में मुंशी अज़हर अली फिर हशमत अली, मुराद अली और कल्लन का मकान था। सबके कमरे जुड़े हुए थे और कुल 12 कमरे थे,” ज़मींदार हशमत अली के परपोते इज़हार अस्फी बोले।
पुरानी इमारत के बारे में, इज़हार के बड़े भाई हसीब अख्तर ने कहा, “हमलोग बचपन में यहां रहे हैं। इस मकान की दीवारें 30 इंच से भी अधिक मोटी थी और एक लंबा से बरामदा था। वो इमारत अंग्रेजी मकान की तरह थी। हमलोग 1977-78 तक इस पुराने मकान में रहे। फिर यह जर्जर होता गया और मकान का एक बड़ा हिस्सा टूट गया। जो इमारत अभी बची हुई है, वहां करीब 15 साल पहले तक लोग रहते थे। अब वह रहने लायक़ नहीं रही।”
बताया जाता है कि यह इमारत एस्टेट की जामा मस्जिद से करीब कुछ वर्ष पहले बनाई गई थी। हालामाला एस्टेट की जामा मस्जिद करीब 150 वर्ष पुरानी थी जिसे 8 वर्ष पूर्व जर्जर अवस्था में होने के कारण तोड़कर वहां नई मस्जिद बनाई गई।
एस्टेट में रहते थे दर्जनों प्रवासी मज़दूर
मस्जिद के सामने फूंस का एक बैठक खाना भी बनाया गया था। विवाह और अन्य समारोहों में वहां करीब 150 लोगों के रहने का इंतज़ाम होता था। एस्टेट में खेतीबाड़ी के लिए दूसरे जिलों से मज़दूर बुलाये जाते थे जो कई महीने हालामाला में रहकर एस्टेट की ज़मीनों पर काश्तकारी करते थे। सिर्फ हालामाला एस्टेट में करीब 250 बीघा ज़मीन पर खेती की जाती थी। इसमें धान और पटुआ की खेती सबसे अधिक थी।
“1980 तक यहां दो महीनों के लिए सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर और दरभंगा के 100 मज़दूर आकर रहते थे जबकि कम से कम 50 मज़दूर, किसान और दूसरे कर्मचारी साल के 12 महीने यहां रहते थे,” ज़मींदार हशमती अली के परपोते सोहैलुज़ ज़फ़र ने बताया।
बैठक के पास बना पुराना कुआं आज भी मौजूद है जो मज़दूरों और गाँव के बाकी लोगों के लिए बनाया गया था। जामिया मिलिया इस्लामिया से ‘किशनगंज के मुसलमानों के इतिहास, सांस्कृतिक और सामाजिक संरचना व दैनिक जीवन में इस्लाम की भूमिका’ पर पीएचडी कर रहे वक़ार आज़म ने हमें बताया कि हालामाला एस्टेट की पुरानी यादगार के तौर पर करीब 14 एकड़ की झील आज भी मौजूद है जहां मछली पालन और मखाना की खेती होती है। मखाना किसान इस झील को भाड़े पर लेकर खेती करते हैं। हालामाला को आज मखाना के साथ साथ चाय की खेती के लिए भी जाना जाने लगा है।
“एस्टेट में कुल चार कुएं हैं। रमज़ान में कई और गांवों के लोग यहाँ से ठंडा पानी ले जाते थे। कई हिन्दू परिवार भी यहां से पानी लेने आते थे। कोई भेदभाव नहीं था,” वक़ार आज़म ने बताया।
कैसे बना हालामाला एस्टेट
हालामाला एस्टेट के इतिहास पर बहुत कुछ लिखा नहीं गया। कहा जाता है कि उन्नीसवीं सदी के मध्य में अस्तित्व में आया था जो बीसवीं सदी के शुरुआत में कई क्षेत्रों में फैल गया। ऐसा कहना है हालामाला निवासी मोहम्मद हसीब अख़्तर का। मोहम्मद हसीब हालामाला एस्टेट के संस्थापक की चौथी पीढ़ी हैं। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वज करीब 200 साल पहले बंगाल के सन्ना बाड़ी क्षेत्र से हालामाला आए थे।
खेदु नामक उनके पूर्वज ने पहले खेती बाड़ी की। धीरे धीरे उनके बच्चों ने ज़मीनें खरीदनी शुरू कीं और फिर वे गांव के ज़मींदार बने। स्थानीय लोगों के अनुसार खेदु के चार बेटे कल्लन, मुंशी अज़हर अली, मुराद अली और हशमत अली हुए। हशमत अली के परपोते मोहम्मद इज़हार अस्फी ने बताया कि मुंशी अज़हर अली की बेटियां थीं लेकिन कोई बेटा नहीं था। उन्होंने अपने तीन भाईओं की मृत्यु के बाद उनके बच्चों को अपने साथ रखा और एस्टेट को आगे बढ़ाया।
“ये लोग हाथी का कारोबार करते थे। हाथी खरीद कर लाते थे और खगड़ा मेला में बेचते थे। नदी के उस पार बालू मेला नाम से एक बहुत विशाल मेला लगता था, उसका ठेका लिया करते थे। फिर वे ज़मींदार हो गए, शान-ओ-शौकत वाले हो गए तो इन कामों को छोड़ दिया और ज़मींदारी में लग गए।” इज़हार अस्फी ने कहा।
आगे उन्होंने बताया कि कल्लन के पुत्र हाजी इरशाद अली, मुराद अली के बेटे अमीरुद्दीन और हशमत अली के बेटे मुज़ाहिर हुसैन जब बड़े हुए तो तीनो ने एस्टेट की बागडोर संभाली और उनके दौर में हालामाला एस्टेट का विस्तार हुआ। हालामाला एस्टेट की ज़मीनें तुलसिया, रंगात, दहीभात, रंगपानी, पिपड़ा और बिशनपुर जैसे क्षेत्रों में फैल गईं। जब ज़मींदारी चरम पर थी तो एस्टेट के पास 3,300 एकड़ ज़मीनें थीं।
एस्टेट के ज़मींदारों में से एक बहादुर हुसैन के पोते अब्दुल गफ़्फ़ार ने हमें बताया कि हालामाला एस्टेट में नया और पुराना दरबार हुआ करता था। मुज़ाहिर हुसैन और अमीरुद्दीन पुरानी जगह पर ही रहे जबकि बहादुर हुसैन और हाजी इरशाद अली नए दरबार की तरफ आ गए। हालांकि, दोनों दरबार हालामाला एस्टेट का ही हिस्सा रहा।
एस्टेट के राजनीतिक चेहरे
हालामाला एस्टेट के कई ज़मींदारों को क्षेत्र के प्रभावशाली व्यक्तियों के तौर पर पहचान मिली। इसमें अमीरुद्दीन, मुज़ाहिर हुसैन, हाजी इरशाद अली और बहादुर हुसैन के नाम शामिल हैं। बहादुर हुसैन के पुत्र दवेरुल हुसैन ने राजनीति में अपने हाथ आज़माये जिसमें वह काफी सफल रहे। वह अपने चचेरे भाई मोइनुद्दीन को भी राजनीति की दुनिया में लाए। दवेरुल हुसैन बेलवा पंचायत के सरपंच रहे और उनके चचेरे भाई मोइनुद्दीन प्रखंड प्रमुख बने।
“मेरे पिता मोइनुद्दीन अपने चचेरे भाई दवेरुल हुसैन के यहाँ ही रहे। उनकी देखरेख में लालन-पालन हुआ। दवेरुल हुसैन पहले सरपंच हुआ करते थे और वही मेरे पिता मोइनुद्दीन को राजनीति में लेकर आये। बेलवा पंचायत से मेरे वालिद साहब दो टर्म मुखिया रहे और फिर मुखिया से प्रमुख बने। वह लोगों के प्रति बहुत ईमानदार थे और इंसाफ के मामले में उनकी बहुत अच्छी छवि रही,” मोइनुद्दीन के बेटे सरवर हुसैन ने हमें बताया।
वहीं दवेरुल हुसैन के बेटे अब्दुल गफ़्फ़ार ने बताया कि उनके पिता ने चचेरे भाई मोइउद्दीन और मोइनुद्दीन को पढ़ाई के लिए जामिया मिल्लिया इस्लामिया भेजा। दवेरुल हुसैन कई साल बेलवा पंचायत के सरपंच रहे।
“हमारे पिता दवेरुल हुसैन को ज़मींदारी में दिलचस्पी नहीं थी। वह बहुत सिम्पल आदमी थे। कोई भी आता तो साथ में खाना और बग़ल में सुलाना, ये सब उनकी खासियत थी। मेरे पिता ने सब बच्चों को पालने और पढ़ाने लिखाने के लिए अपनी ज़मीनें बर्बाद कर दीं। उन्होंने सब बच्चों को आला तालीम दी,” बिहार सरकार के सेवानिवृत्त उर्दू अनुवादक अब्दुल गफ़्फ़ार बोले।
बहादुर हुसैन के भाई इरशाद अली के चार बेटे थे जिनमें से मोइनुद्दीन राजनीति में आए और काफी सफल रहे। मोइनुद्दीन के बेटे सरवर हुसैन ने कहा कि उनके पिता और पिता के जुड़वां भाई मोइउद्दीन ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया से स्कूल की पढ़ाई की। पिता की मृत्यु के कारण दोनों भाई को किशनगंज लौटना पड़ा। उसके बाद दोनों ने बहादुरगंज के रसल हाई स्कूल से नौवीं तक शिक्षा हासिल की लेकिन घर के हालात की वजह से पढ़ाई जारी नहीं रख सके। दोनों भाई खेलों के काफी शौक़ीन थे और उन दोनों को हालामाला में खेलकूद का कल्चर शुरू करने का श्रेय दिया जाता है।
“मेरे पिता दो दशक तक राजनीति में सक्रिय रहे। मुन्ना मुश्ताक़ जब मंत्री थे तो वह जनता दल के लोकप्रिय नेता था। मुन्ना मुश्ताक़ साहब उनके क़रीबी आदमी थे और दो टर्म चुनाव जिताने में (उनकी) सक्रिय भागेदारी थी। इलाके में तीन बड़े चेहरे के तौर पर अमीरुद्दीन, दवेरुल हुसैन और मोइनुद्दीन रहे,” मोइनुद्दीन के पुत्र सरवर हुसैन ने कहा।
बाबरी मस्जिद टूटने पर जब बढ़ा तनाव
मोइनुद्दीन को साफ़ छवि वाले और इंसाफ करने वाले नेता के तौर पर देखा जाता था। वह 1978 में मुखिया बने और फिर सन् 2000 तक किशनगंज के प्रखंड प्रमुख रहे। कहा जाता है कि मोइनुद्दीन हालामाला और आसपास के क्षेत्र के अलावा बहादुरगंज, ठाकुरगंज जैसे प्रखंडों में बड़े बड़े मतभेदों को हल किया करते थे।
“मोइनुद्दीन धर्मनिरपेक्षता के लिए मशहूर थे। उनका इंसाफ बहुत बढ़िया था। अमीर ग़रीब नहीं देखते थे जो सही फैसला हो वो करते थे। फैसला करने के लिए पूर्णिया से लोग आकर उन्हें ले जाते थे। वह सभी बिरादरी को साथ लेकर चलते थे,” पीएचडी स्कॉलर वक़ार आज़म ने कहा।
मोइनुदद्दीन के बारे में उनके बेटे सरवर हुसैन ने एक रोचक घटना का ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि बाबरी मस्जिद टूटने के समय देश भर में तनाव का माहौल था ऐसे में उनके पिता मोइनुद्दीन ने समझ बूझ से एक बड़ी घटना को होने से रोका।
वह कहते हैं, “1992 में जब बाबरी मस्जिद टूटने की घटना हुई तो ओद्रा घाट पर स्थित काली मंदिर तोड़ने के लिए कुछ लोग वहां पहुंच गए थे। मेरे वालिद साहब ने पुलिस को बुलाया और वह घटना होने नहीं दिया। स्थानीय हिन्दु भाइयों को उन्होंने कहा कि मेरे रहते हुए तुमलोगों को कोई टच भी नहीं करेगा। हमलोग उस समय छोटे थे। यह याद है कि रात 2 बजे पुलिस उन्हें घर पहुंचाने आई थी।”
एस्टेट की परंपराएं
हालामाला एस्टेट में पुरानी परंपराओं में पास के मोतीहारा में लगने वाला मुहर्रम का मेला, सूची में सबसे ऊपर है। यहां आज भी करीब 2 सदी पुराना मुहर्रम का कार्यक्रम होता है जिसमें कई गांवों के ताज़िए और अखाड़े लाये जाते हैं।
“मेरे दादा लोग मोतीहारा के मेले में हाथी और घोड़े पर मुहर्रम मनाने जाते थे। आज भी वो मेला लगता है लेकिन अब वैसी भीड़ नहीं होती,” हसीब अख्तर बोले।
आगे उन्होंने बताया कि 1952 के बाद मुजाहिर हुसैन, अमीरउद्दीन और हाजी इरशाद अली के नाम पर हालामाला एस्टेट का तीन अलग अलग भाग हो गया। तब एस्टेट में 6 सिपाही थे जो ज़मींदारों की सुरक्षा के लिए उनके साथ सफर करते थे। “रैय्यत के पास (आय) वसूल करने जाते थे तब भी सिपाही साथ रहता था। यहां 1980 तक सिपाही रहे,” हसीब अख्तर बोले।
एस्टेट की एक और पुरानी परंपरा यह थी कि एस्टेट में शादी समारोह के लिए व्यवस्था पहले से मौजूद रहती थी। वक़ार आज़म ने बताया कि गांव में किसी के घर शादी होने पर लोग शादी समारोह का सामान जैसे बर्तन इत्यादि एस्टेट से लेकर जाते और फिर इस्तेमाल कर वापस रख देते थे।
उन्होंने कहा, “सब मिल जुलकर गांव की शादी में हाथ बंटाते थे। यह प्रथा हालामाला की पहचान बन गई थी। कोई सामान खरीदने की ज़रूरत नहीं होती थी। यहीं से सामान लेकर जाते थे। खुद से सब टेंट बनाते थे, बर्तन का इंतज़ाम और सजावट के लिए बहुत खूबसूरती से आर्ट और क्राफ्ट भी करते थे, यहां तक कि शादी का कार्ड भी बड़ी ख़ूबसूरती के साथ हाथ से बनाते थे। यह हमने सन् 2000 तक यहां देखा।”
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