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सिवान के गांवों में पॉलिथीन कचरे का बढ़ता अंबार, बिहार सरकार का प्रतिबंध ताक पर

पॉलिथीन के इस्तेमाल का असर दोहरा है। अव्वल तो पॉलिथीन निर्माण में जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे ग्रीनहाउस गैस निकलता है। ये ग्रीनहाउस गैस, जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी वजह है। वहीं, पॉलिथीन कचरे के निपटान से भी ग्रीनहाउस गैस निकलती है।

cropped azad ansari.jpg Reported By Azad Ansari |
Published On :
growing piles of polythene waste in siwan villages, bihar government's ban ignored

सिवान, बिहार: बलकेसिया देवी (बदला हुआ नाम) खेतों में दिहाड़ी पर घास चुनने का काम करती हैं। पहले घास चुनते हुए उन्हें मालिक से डांट नहीं सुननी पड़ती थी, लेकिन अब स्थितियां बदल गई हैं।


“हमनी के धान के सोहनी करे में पलोथीन चुनते-चुनते अगुता गइल बानी सन, काहे कि दिन भर के धान सोहनी में एक छईटी पलोथीन आ प्लास्टिक के छोटका बोतल आउर पतल निकल जाला। ई सब के निकाले से धान के सोहनी करे में देर हो जाला, काहे से कि प्लोथीनवा टूट जाला तअ तीन चार हाली खुरपी से खोद के निकलेनी सन (धान के खेत से घास निकालते समय अब हम पॉलिथीन चुनते-चुनते परेशान हो गए हैं। घास के साथ पॉलिथीन की थैलियां और प्लास्टिक की बोतलें निकलती हैं। पॉलिथीन मिट्टी में दबकर छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट जाती है, जिसे निकालने में काफी देर हो जाती है क्योंकि खुरपी की मदद से तीन-चार बाद खोदकर उन्हें निकालना पड़ता है),” सिवान के भगवानपुर हाट के खेत में घास की सफाई कर रहे 5 महिलाओं के समूह में शामिल बलकेसिया देवी कहती हैं।

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लेकिन, खेत मालिक को नहीं पता है कि उनके खेत में पॉलिथिन का कचरा है। “खेत के मालिक समझते हैं कि हम जानबूझकर घास की सफाई में देरी कर रहे हैं। बीस साल पहले खेतों में इनका नामोनिशान नहीं था, तब केवल बरसाती कीड़े दिखाई देते थे, जो अब गायब हो गए हैं और उनकी जगह पॉलिथीन ने ले ली है,” बलकेसिया देवी ने कहा।


खेतों में पॉलिथीन प्रदूषण की बात जिले की सहसरव पंचायत में खेत से घास निकाल रहे अरुण कुमार भी स्वीकार करते हैं। “जबसे प्लास्टिक की थैलियों का उपयोग बढ़ा है, खेत से प्लास्टिक की बोतल और पॉलिथीन के टुकड़े निकल रहे हैं। खासकर उन खेतो में ज्यादा मिल रहे हैं, जो रोड के किनारे हैं। सड़क से आते-जाते राहगीर बोतल और पॉलिथीन खेतों में फेंक देते हैं, जिससे खेतों की जुताई करते वक़्त समस्या होती है।”

बलकेसिया देवी और अरुण कुमार जो कुछ कह रहे हैं, वो चिंता का विषय है क्योंकि पॉलिथीन का सबसे ज्यादा इस्तेमाल शहरों में होता है, लेकिन अब ये सुदूर गांवों के लिए भी समस्या बनती जा रही है।

इस रिपोर्टर ने सिवान जिले की 79 पंचायतों के 600 लोगों से बातचीत की और पाया कि ग्रामीण इलाकों में पॉलिथीन का इस्तेमाल आम हो चला है, लेकिन लोगों को इसके संभावित खतरे की जानकारी नहीं है। बातचीत में हमने पाया कि 90% ग्रामीण रोज़ पॉलिथीन बैग का इस्तेमाल करते हैं और 85% को इसके खतरों की जानकारी तक नहीं है। 62% किसानों ने पॉलिथीन को खेत में जलाने की बात स्वीकारी।

पॉलिथीन के इस्तेमाल का दोहरा असर

पॉलिथीन के इस्तेमाल का असर दोहरा है। अव्वल तो पॉलिथीन निर्माण में जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे ग्रीनहाउस गैस निकलता है। ये ग्रीनहाउस गैस, जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी वजह है। वहीं, पॉलिथीन कचरे के निपटान से भी ग्रीनहाउस गैस निकलती है। यानी कि इसके उत्पादन से लेकर इसके निपटान (जलाकर) तक में ग्रीनहाउस गैस निकलती है, जो जलवायु परिवर्तन में बड़ी भूमिका निभाती है। वहीं, अगर इसे लैंडफिल में दबा दिया जाए, तब भी इससे ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन होता है।

पॉलिथीन का स्वास्थ्य पर भी काफी बुरा असर पड़ता है। पॉलिथीन का इस्तेमाल कैंसर के खतरे को बढ़ाता है। यह शिशु के विकास को प्रभावित करता है और मिट्टी की उर्वरता नष्ट कर देता है, क्योंकि यह वर्षों तक नहीं गलता। पॉलिथीन से फसलों की जड़ें प्रभावित होती हैं, भूजल रिचार्ज बाधित होता है। प्लास्टिक के अधिक संपर्क से खून में हानिकारक तत्व बढ़ते हैं। 2023 में वैज्ञानिकों द्वारा की गयी एक स्टडी से पता चला है कि माँ के दूध में माइक्रोप्लास्टिक के कण मिले हैं।

प्लास्टिक प्रदूषण दुनियाभर के लिए वैश्विक संकट बनकर उभरा है। हर दिन 2,000 ट्रक कचरे जितना प्लास्टिक महासागरों व नदियों में पहुंचता है। आंकड़े बताते हैं कि हर साल 190-230 लाख टन प्लास्टिक जलीय तंत्र में रिसता है, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र, आजीविका और खाद्य सुरक्षा पर गंभीर खतरा मंडराता है।

a pig eating garbage near bhagwanpur market
भगवानपुर बाजार के पास कचरा खाता हुआ सूअर

दूसरी तरफ, खुले में पॉलिथीन फेंकने से मवेशी उन्हें खा जाते हैं, जिससे उन्हें कई तरह की बीमारियों का खतरा होता है।

हमने इस संबंध में 150 पशुपालकों से बात की, जिनमें से 95% ने बताया कि उनके जानवर कभी न कभी पॉलिथीन खा चुके हैं। खासकर बकरी पालकों का कहना है कि उनकी बकरियों के बच्चे खेतों में घास खाने के लिए जाते हैं और वहां जाकर पॉलिथीन खाने लगते हैं। बकरियों के बच्चों को पॉलिथीन के टुकड़े खाने की आदत पड़ गई है, जिसके चलते उनको भूख ही नहीं लगती है। मलमालिया बाजार के पास सूअर चरा रहे समफुल राम (बदला हुआ नाम) ने कहा कि सबसे ज्यादा सूअर पॉलिथीन खाते हैं क्योंकि लोग खाने पीने का सामान पॉलिथीन में ही भरकर फेंकते हैं।

ग्रामीण पशु चिकित्सक भी मवेशियों के पॉलिथीन खाने की बात स्वीकार करते हैं। एक पशु चिकित्सक (हालांकि उनके पास कोई डिग्री नहीं है) ने बताया, “हमारे पास ऐसे कई केस आते हैं, जहां गाय या बछड़ा पॉलिथीन खा लेने से बीमार पड़ जाते हैं। पेट में प्लास्टिक जमा हो जाने से उनका खाना पच नहीं पाता और कई बार मौत भी हो जाती है।”

बिहार में पॉलिथीन प्रतिबंध की हकीकत

गौरतलब हो कि बिहार में वर्ष 2018 से ही पॉलिथीन के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध है। इसमें 100 माइक्रोन से कम मोटाई वाले प्लास्टिक उत्पाद और थर्मोकोल के सामान जैसे कप, प्लेट, चम्मच और सजावट के सामान शामिल हैं। इसके अलावा मिठाई के डिब्बों पर चढ़ाई जाने वाली प्लास्टिक पर भी प्रतिबंध है, जबकि बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक को छूट दी गई है।

हाल ही में इस फैसले को चुनौती देते हुए प्लास्टिक कारोबारियों की याचिका पटना हाईकोर्ट ने खारिज कर दी और सरकार के प्रतिबंध को वैध ठहराया। अदालत का निर्णय स्पष्ट करता है कि पॉलिथीन स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए कितना घातक है। लेकिन, बिहार सरकार के प्रतिबंध का असर जमीन पर नहीं दिखता है।

हमने जब जिले के 50 छोटे बाज़ारों का निरीक्षण किया तो पाया कि हर जगह छोटे दुकानदार और सब्ज़ी विक्रेता धड़ल्ले से पॉलिथीन बैग में सामान दे रहे थे। पॉलिथीन के इस्तेमाल को लेकर सब्जी विक्रेताओं से लेकर ग्राहकों तक के अपने अपने बहाने हैं।

खैरवा बाजार के एक सब्जी विक्रेता राकेश शाह ने बताया, “ग्राहक झोला लाते नहीं इसलिए हमें पॉलिथीन में सामान देना पड़ता है। अगर पॉलिथीन बैग में सामान नहीं देंगे, तो ग्राहक दूसरे दुकानदार से सब्जी ले लेते हैं।”

shopkeeper selling tea in polythene bags
पॉलिथीन में चाय बेचता दुकानदार

इसी बाज़ार में सब्जी खरीदने आये ओम प्रकाश लापरवाही से कहते हैं, “सरकारी आदेश की परवाह किसे है? दुकान पर सामान लेने जाओ तो वही पतली पॉलिथीन में सामान थमा दिया जाता है, तो आदत लग गई है। इसलिए अब झोला लेकर बाज़ार नहीं आते हैं क्योंकि हमें मालूम है कि पॉलिथीन में सामान मिल जाएगा।”

सिवान के सामाजिक कार्यकर्ता और जिला न्यायालय के वकील सईद अंसारी कहते हैं कि पॉलिथीन पर प्रतिबंध के बावजूद बाज़ारों में इसका खुलेआम उपयोग जारी है। उन्होंने कहा, “गांवों के बाज़ार में सब्जी और किराने का सामान पॉलिथीन बैग में दिया जा रहा है, जिससे खेत, पोखर और नालियां पॉलिथीन से भर रही हैं। यह एक कृषि-प्रधान जिला है और यहां की अर्थव्यवस्था खेती, पशुपालन पर निर्भर है। यहां पॉलिथीन पर्यावरण के साथ-साथ स्वास्थ्य, आजीविका और सामाजिक संस्कृति के लिए भी गंभीर संकट बन रहा है अतः इसे रोकना बहुत जरूरी है।”

दरअसल पॉलिथीन पर प्रतिबंध के बावजूद इसका धड़ल्ले से इस्तेमाल इसलिए भी जारी है क्योंकि हर दैनिक जरूरत की चीजें पॉलीथीन में मिल रही हैं, इस वजह से ये अब आदत में शुमार हो चुका है।

हमने सर्वे में पाया कि यहाँ के आम जीवन की हर जरूरत में पॉलिथीन शामिल हो गया है। जन्म से लेकर मरण तक हर जगह में पॉलिथीन मौजूदगी है। इसका ज्यादा इस्तेमाल खाने-पीने के समान में किया जा रहा है, जिसमें बच्चे के स्कूल के टिफिन भी शामिल है, वही बाज़ार में लोग चाय दुकान से गर्म चाय को पॉलिथीन में भरकर ले जाते हैं। यहाँ तक कि समोसा, दाल-चावल, रोटी, सब्जी और पानी-पूरी भी पॉलिथीन में पैक कराकर ले जा रहे है।

हैरानी की बात ये है कि पॉलिथीन के संभावित खतरों से लोग बिल्कुल ही अनजान हैं। मसलन, महराजगंज के किसान भोला सिंह ने कहा कि वह खेत में पॉलिथीन जलाते हैं क्योंकि उन्हें नहीं पता था कि इससे मिट्टी और फसल का नुकसान होता है। स्थानीय कार्यकर्ता अमित कुमार का कहना है पॉलिथीन को इकठ्ठा करके खेत में जला देने से पॉलिथीन मिट्टी में जाने के बाद उसकी गुणवत्ता को खराब कर देता है। जड़ तक पानी और पोषक तत्वों का प्रवाह रुक जाता है। लंबे समय तक यह जारी रहा तो उपजाऊ जमीन बंजर हो सकती है।

घर-घर से कचरा उठाव की हकीकत

सिवान ज़िले में स्वच्छ भारत मिशन, लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान, हरित बिहार अभियान, सिंगल-यूज़ प्लास्टिक प्रतिबंध 2018 जैसी योजनाएँ जरूर चल रही हैं। लेकिन, ये सब कागजों में ही दिखते हैं, जमीनी स्तर पर पॉलिथीन प्रदूषण की समस्या बनी हुई है।

हमने पाया कि जिले की पंचायतों में लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत सभी प्रकार के कचरा ढोने के लिए रिक्शा मिला हुआ है। घर-घर से कचरा इकठ्ठा करने के लिए बाल्टी का भी वितरण किया गया है। इन कचरे को हर घर से उठाकर ले जाने के लिए कर्मचारियों की नियुक्ति भी कर दी गई है, लेकिन ज़्यादातर पंचायतों में कर्मचारी काम नहीं कर रहे हैं क्योंकि उन्हें पैसा नहीं मिला है।

कौड़िया पंचायत के राजेश राय ने बताया कि जब से बाल्टी मिली है तब से कोई कचरा उठाने आया ही नहीं, कचरा उठाने वाली बाल्टी अभी नयी है इसलिए इसमें खाने-पीने का सामान रखा जा रहा है। इसी पंचायत के कचरा उठाने वाले कर्मचारी सैनूद्दीन अंसारी का कहना है, “कचरा उठाते हुये मुझे एक साल होने को है लेकिन अभी तक वेतन नहीं मिला है, जिसके चलते कचरा उठाना छोड़ दिया है। पैसा नहीं मिलने से परिवार चलाना मुश्किल हो रहा है।”

a rickshaw exposes the truth about waste management
कचरा प्रबंधन की सच्चाई उजागर करता एक रिक्शा

कचरा उठाने वाले कर्मचारियों का वेतन नहीं मिलने के सवाल पर स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के जिला संयोजक विनोद कुमार ने बताया कि कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर हड़ताल पर हैं इसलिए अभी तक वेतन नहीं मिल पाया है।

कचरा और कचरे में शामिल पॉलिथीन का उठाव नहीं होने से लोग इसे इधर उधर फेंक देते हैं जिससे ये यत्र-तत्र-सर्वत्र फैल जाते हैं। हमने पाया कि कौड़ियां पंचायत के 10 में से 8 तालाबों में प्लास्टिक कचरे की परत तैर रही थी। कौड़ियां पंचायत के सामाजिक कार्यकर्ता सैनुल्लाह अंसारी ने बताया कि पोखरे का पानी बदबू मारता है और अब इसमें मछली भी कम हो गई है। “इन पोखरों में शादी-ब्याह में उपयोग होने वाले प्लास्टिक से बने प्लेट और ग्लास फेंक देते हैं। इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि एक शादी में कम से कम एक हजार लोग खाना खाते हैं तो एक हजार प्लेट, गिलास, चमच पाँच सौ मिठाई के डब्बे का प्रयोग किया जाता है। अगर पंचायत में 50 शादियां हों, तो कचरे का अंदाजा लगा सकते हैं,” उन्होंने कहा।

बसंतपुर नगर पंचायत के टुनटुन मुखिया ने बताया कि शादी-ब्याह के कचरे को फेंकने से कोई रोकता भी नहीं है। यहाँ तक कि नदी के किनारे भी कचरे का ढेर देख सकते हैं। हम चाह कर भी रोक नहीं पाते हैं। किसी को बोलने जाओ तो कहता है कि आपके खेत में थोड़े फेंक रहे हैं। सरकारी जांच नहीं होने से भी लोग इस पर ध्यान नहीं देते हैं।

हालांकि सरकारी अधिकारियों का दावा है कि पॉलीथिन व प्लास्टिक कचरा का नियमित उठाव व निस्तारण होता है। स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के जिला संयोजक विनोद कुमार ने बताया कि जिले में प्लास्टिक और पॉलिथीन प्रबंधन के लिए दो यूनिट का संचालन किया जा रहा है। एक नौतन प्रखंड के खलवा गाँव में और दूसरा बड़हरिया में हैं। इन दोनों इकाइयों में साल 2024-2025 में 25 टन प्लास्टिक व पॉलिथीन कचरे का निस्तारण हुआ है। इन दोनों इकाइयों के संचालन का जिम्मा संभाल रही तारिका सिंह कहती हैं, “हर पंचायत से प्लास्टिक और पॉलिथीन का संग्रह कर यहां उसका निस्तारण किया जाता हैं। इतना ही नहीं जिले के हर पंचायत के कचरा प्रबंधन की निगरानी की जाती है।

“शिकायत मिलने पर होगी कार्यवाई”

सिवान जिला पदाधिकारी आदित्य प्रकाश को आधिकारिक बयान के लिए ईमेल भेज दिया गया है। उनका जवाब आता है, तो हम स्टोरी को अपडेट कर देंगे।

वहीं, पंचायत अधिकारी से इस संबंध में पूछने पर उन्होंने इतना ही कह कर अपना पल्ला झाड़ लिया कि पॉलिथीन पर प्रतिबंध लगना उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है।

सिवान के जिला कृषि अधिकारी आलोक कुमार का कहना है, “मैं जिले में किसानों के साथ हर महीने में कई सभाएं करता रहता हूं लेकिन किसानों द्वारा पॉलिथीन की समस्या को लेकर अभी तक शिकायत नहीं मिली है। जिले के किसान नीलगाय से होनेवाली समस्या को लेकर हमारे पास आते हैं तो उसका समाधान करता हूं। अगर किसान शिकायत करते हैं तो इस समस्या का भी निराकरण नियमानुसार किया जाएगा, क्योंकि पॉलिथीन और प्लास्टिक खेतों को कई तरह से नुकसान पहुंचाते हैं।”

(यह रिपोर्ट “अर्थ जर्नलिज्म नेटवर्क“ के सहयोग से की गई है)

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आज़ाद अंसारी पर्यावरण को समर्पित पत्रकार और मीडिया स्कॉलर हैं। इनका पत्रकारिता के क्षेत्र में एक दशक से अधिक का पेशेवर अनुभव रहा है। इन्होंने नई दुनिया और पंजाब केसरी जैसे प्रमुख हिंदी अखबारों में रिपोर्टर के रूप में कार्य किया है। ये कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोधपत्र प्रस्तुत कर चुके हैं और शोध पत्रिकाओं में इनके शोध प्रकाशित हो चुके हैं। इनके शोध पत्रों में पर्यावरण कवरेज, मीडिया में अल्पसंख्यकों और महिलाओं का प्रतिनिधित्व पर किए गए अध्ययन शामिल हैं। वर्ष 2021 में नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया (NFI), नई दिल्ली से स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए फैलोशिप भी प्राप्त हुई।

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