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किशनगंज के इस गांव में बढ़ रही दिव्यांग बच्चों की तादाद

रुइया में करीब दो दर्जन बच्चे किसी न किसी दिव्यांगता के शिकार हैं। गांव के लोग लंबे समय से APHC यानी अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की मांग कर रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि उनके गांव में छोटी-मोटी बीमारी के इलाज के लिए भी 10 से 12 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। गांव में न APHC है न HSC, जिसके कारण गर्भवती महिला व नवजात बच्चों को सामान्य इलाज नहीं मिल पाता है।

बिहार-बंगाल सीमा पर वर्षों से पुल का इंतज़ार, चचरी भरोसे रायगंज-बारसोई

करीब 100 फ़ीट लंबे इस चचरी पुल का अधिकतर हिस्सा पश्चिम बंगाल के रायगंज विधानसभा क्षेत्र में आता है वहीं, दूसरी तरफ बिहार का बारसोई है। चचरी के इस पुल से दोनों राज्यों के सैकड़ों लोग रोजाना आवागमन करते हैं जिसके लिए उन्हें किराया देना पड़ता है।

अररिया में पुल न बनने पर ग्रामीण बोले, “सांसद कहते हैं अल्पसंख्यकों के गांव का पुल नहीं बनाएंगे”

रामपुर दक्षिण पंचायत वार्ड संख्या 12 के कजड़ाधार घाट पर ग्रामीण चचरी का पुल बनाकर आवाजाही करते हैं लेकिन बरसात के मौसम में पानी का बहाव अधिक रहने से हर साल चचरी का पुल बह जाता है।

किशनगंज: दशकों से पुल के इंतज़ार में जन प्रतिनिधियों से मायूस ग्रामीण

पुल नहीं होने से महिलाओं को भी कई समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है। डाला गांव निवासी मीना कहती हैं कि साल भर घाट पर पानी रहता है जिससे आवाजाही में बहुत समस्या होती है। आगे उन्होंने कहा कि पुल का काम नहीं हुआ तो वह चुनाव में वोट भी नहीं देंगी।

मूल सुविधाओं से वंचित सहरसा का गाँव, वोटिंग का किया बहिष्कार

“बढ़ता बिहार-बदलता बिहार” के दावों के बीच सिमरी बख़्तियारपुर विधानसभा के महिषी प्रखंड स्थित झाड़ा पंचायत में ग्रामीण आज भी एक अदद पक्की सड़क को तरस रहे हैं।

सुपौल: देश के पूर्व रेल मंत्री और बिहार के मुख्यमंत्री के गांव में विकास क्यों नहीं पहुंच पा रहा?

बिहार के सुपौल जिले का एक परिवार जिसके सदस्य केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री, राज्य सरकार में मंत्री, पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष, सांसद और विधायक बने, सुपौल के लोग इस परिवार को बलुआ बाजार परिवार के नाम से जानते हैं। बलुआ सुपौल जिले की एक पंचायत है।

सुपौल पुल हादसे पर ग्राउंड रिपोर्ट – ‘पलटू राम का पुल भी पलट रहा है’

मामले को लेकर सुपौल की जिलाधिकारी कौशल कुमार ने बताया कि इस घटना में जितने भी लोग प्रभावित थे वे सभी सुरक्षित हैं, सिर्फ एक की मौत हुई है। उन्होंने कहा कि अभी इस मलबे के अंदर कोई भी दबा हुआ नहीं है।

बीपी मंडल के गांव के दलितों तक कब पहुंचेगा सामाजिक न्याय?

मुसहर टोले में रहने वाला 21 वर्षीय मनीष ऋषिदेव 2024 के लोकसभा चुनाव में पहली बार वोट करेगा। मनीष एकदम धीमी आवाज में कहता हैं, "मेरे मां-पिता ने सबको वोट दिया लेकिन आज तक हमारे लिए किसी ने भी कुछ नहीं किया। आज भी हम लोग झुग्गी झोपड़ी में रहते हैं। विकास के नाम पर इतना हुआ है कि गांव में कुछ रास्ते को छोड़कर लगभग सड़क बन चुकी है।"

सुपौल: घूरन गांव में अचानक क्यों तेज हो गई है तबाही की आग?

पछुआ मौसम के शुरुआती दौर में ही आग ने सुपौल में गांवों में अपना रौद्र रूप दिखाना शुरू कर दिया है। स्थानीय न्यूज के मुताबिक 3 जनवरी 2024 को सुपौल की बैरिया पंचायत के सुरती पट्टी वार्ड नं 01 में आग लगने से 6 परिवारों के घर जल गये थे। कुछ लोग गंभीर रूप से झुलस भी गए थे। फिर सुपौल स्थित सदर प्रखंड के घूरन गांव में ही एक सप्ताह के भीतर ही 300 से ज्यादा घर जलकर राख हो गये हैं।

क़र्ज़, जुआ या गरीबी: कटिहार में एक पिता ने अपने तीनों बच्चों को क्यों जला कर मार डाला

ग्रामीणों का कहना है कि दिनेश सिंह ने पत्नी से विवाद और तनाव के कारण खुद को और अपने बच्चों को पेट्रोल छिड़क कर आग के हवाले कर दिया। शुक्रवार देर रात लोगों को घटना की जानकारी मिली लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

त्रिपुरा से सिलीगुड़ी आये शेर ‘अकबर’ और शेरनी ‘सीता’ की ‘जोड़ी’ पर विवाद, हाईकोर्ट पहुंचा विश्व हिंदू परिषद

'बंगाल सफारी' में 'शेर-शेरनी' की 'जोड़ी' का नाम 'अकबर-सीता' होने को लेकर ही हिंदुत्ववादी संगठनों ने आपत्ति जताई है। इसे लेकर विश्व हिंदू परिषद ने‌ जलपाईगुड़ी स्थित कलकत्ता हाईकोर्ट की सर्किट बेंच में बीते 16 फरवरी को मुकदमा दायर किया है जिसे स्वीकृत भी कर लिया गया है। अब 20 फरवरी 2024 को जस्टिस सौगत भट्टाचार्य की पीठ इस मुकदमे की सुनवाई करेगी।

फूस के कमरे, ज़मीन पर बच्चे, कोई शिक्षक नहीं – बिहार के सरकारी मदरसे क्यों हैं बदहाल?

पिछले तीन महीनों में हमने government aid से चल रहे 1128, 205 और 609 केटेगरी के करीब एक दर्जन मदरसों को दौरा किया। इन मदरसों की हालत इतनी दयनीय है की राज्य में अगर कोई सरकारी स्कूल इस हालत में दिख जाए तो मेनस्ट्रीम मीडिया से लेकर सरकारी महकमे में हलचल मच जायेगी।

आपके कपड़े रंगने वाले रंगरेज़ कैसे काम करते हैं?

बिहार के कटिहार में कई लोग आज भी ऐसे हैं, जो कपड़ों को रंगने काम करते हैं। कपड़ों में रंगाई करने वाले ये लोग रंगरेज़ कहलाते हैं। रंगरेज़ रंगों और केमिकल से कपड़ों को रंगने का काम करते हैं।

‘हमारा बच्चा लोग ये नहीं करेगा’ – बिहार में भेड़ पालने वाले पाल समुदाय की कहानी

डोरिया गांव में एक नहर के किनारे रह रहे चरवाहों ने बताया कि वे साल में 6 महीने अररिया जिले के आसपास के इलाके व सुपौल के सीमावर्ती इलाकों में भेड़ चराने निकल जाते हैं। अमूमन ये लोग नदी किनारे मैदानों में भेड़ चराते हैं और 4 से 5 लोगों झुंड में एक जगह अस्थाई टेंट बनाकर निवास करते है।

पूर्णिया के इस गांव में दर्जनों ग्रामीण साइबर फ्रॉड का शिकार, पीड़ितों में मजदूर अधिक

साइबर चोरी में पैसे खोने वालों में अधिकतर बैंक खाते महिलाओं के हैं। जालसाज़ों ने उन लोगों को शिकार बनाया है, जो सीएसपी यानी ग्राहक सेवा केन्द्रों पर जाकर अपना पैसा निकलवाते हैं, इनमें से अधिकतर खाता धारकों के पास डेबिट कार्ड भी नहीं है।

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