कक्षा छठी में पढ़ने वाली बुलबुल कुमारी के लिए बारिश का मौसम संघर्ष लेकर आता है। वह समस्तीपुर जिले के बहादुरपुर स्थित राजकीय मध्य विद्यालय में पढ़ती है। बारिश के दिनों में उसके गांव और स्कूल के आसपास अक्सर पानी जमा हो जाता है, जिससे स्कूल तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है।
बुलबुल बताती है कि बारिश के समय उसे रोज़ घुटनों तक पानी से होकर स्कूल जाना पड़ता है। “रास्ते में कई जगह कीचड़ और गंदा पानी जमा रहता है। ऐसे में स्कूल पहुंचने से पहले ही जूते-मोजे उतारने पड़ते हैं क्योंकि पानी में भीग जाने से जूते खराब हो जाते हैं और चलना भी मुश्किल हो जाता है,” उसने कहा।
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लगातार गंदे पानी में चलने के कारण उसके पैरों की त्वचा में समस्या होने लगती है। बुलबुल बताती है कि पानी में लंबे समय तक रहने से पैरों की त्वचा गलने लगती है, जिससे चलना मुश्किल हो जाता है। उसे अपने पैरों पर मरहम लगाना पड़ता है और दवाइयों का सेवन करना पड़ता है। “कभी-कभी इतना दर्द और जलन होता है कि स्कूल जाना ही छोड़ना पड़ता है और ये एक दो रोज़ नहीं होता है, कई कई हफ़्ते स्कूल नहीं जा पाते हैं,” बुलबुल ने बताया।
स्कूल नहीं जाने से उसकी पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित होती है। “छूटे हुए पाठ समझना बहुत मुश्किल हो जाता है,” उसने कहा।
समस्या केवल स्कूल के रास्ते तक ही सीमित नहीं है। बारिश के दिनों में कई बार पानी उसके घर के अंदर भी घुस जाता है, जिससे आराम करना या ठीक से पढ़ाई करना मुश्किल हो जाता है।
बिहार में जलवायु परिवर्तन के चलते होने वाली चरम मौसमी घटनाएँ मसलन बाढ़, सुखाड़, शीतलहर आदि का असर केवल फसलों या घरों के नुक़सान तक सीमित नहीं है, बुलबुल की कहानी बताती है कि ये बच्चों की पढ़ाई पर भी असर डाल रहा है।
खगड़िया जिले के अलौली ब्लॉक के जोगिया शरीफ गांव में रहने वाली 13 वर्षीय पाबनी कुमारी बताती है कि कभी बाढ़ के कारण स्कूल हफ्तों तक बंद हो जाता है, तो कभी भीषण गर्मी के चलते कक्षा में बैठना मुश्किल हो जाता है।
पाबनी उर्दू मध्य विद्यालय में पढ़ती है। उसका कहना है, “गर्मी, बाढ़ और अत्यधिक ठंड के कारण कई दिनों तक पढ़ाई बाधित हो जाती है। जब स्कूल बंद हो जाता है, तो घर पर पढ़ने की कोशिश करते हैं लेकिन समझ में नहीं आता कि क्या पढ़ें। कोई पढ़ाने वाला भी नहीं रहता।”
पिछले साल जुलाई-अगस्त के महीने में जब कोसी नदी का पानी गांव में घुसा, तो उर्दू मध्य विद्यालय लगभग तीन हफ्ते तक बंद रहा। इस दौरान पाबनी की पढ़ाई पूरी तरह रुक गई। पाबनी कहती है, “कई बार किताबें भी भीग जाती हैं लेकिन स्कूल से नयी किताबें भी नहीं मिलती हैं। हमें उन्हीं किताबों से पढ़ना पड़ता है लेकिन पन्ने इतने भीग जाते हैं कि उसे फेंकने या कबाड़ में बेचने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता है।”
बाढ़ के बाद पाबनी का स्कूल खुला तो पाठ्यक्रम तेजी से खत्म कराए गए। पाबनी बताती है कि उसे गणित के कई अध्याय समझ ही नहीं आए। गर्मियों में हालात और मुश्किल हो जाते हैं। स्कूल में पानी की व्यवस्था नहीं है और एक बेंच पर 7–8 बच्चे बैठते हैं। पिछले साल जून में प्रार्थना के दौरान पाबनी चक्कर खाकर गिर गई थी।

क्या कहते हैं आंकड़े
यूनिसेफ़ की रिपोर्ट द स्टेट ऑफ वर्ल्ड चिल्ड्रेन 2024 कहती है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बच्चों के सामने गंभीर जोखिम पैदा हो रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि जनसांख्यिकीय बदलाव, जलवायु संकट और तकनीकी प्रगति का असर 2050 तक दुनिया भर के अनुमानित 2.3 अरब बच्चों के जीवन को प्रभावित कर सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में लगभग एक अरब बच्चे जलवायु और पर्यावरणीय खतरों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं, जिनमें भारत के बच्चे असमान रूप से अधिक प्रभावित हो रहे हैं। रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2040 के दशक तक भारत में लगभग 3.4 करोड़ लोग बाढ़ से प्रभावित हो सकते हैं, जबकि वर्ष 2070 के दशक तक तटीय बाढ़ से करीब 1.8 करोड़ लोगों पर असर पड़ने की आशंका है। बढ़ता तापमान और वायु प्रदूषण पहले से ही शिक्षा और स्वास्थ्य प्रणालियों को प्रभावित कर रहे हैं, जिससे विशेष रूप से ग्रामीण और निम्न-आय वाले क्षेत्रों के बच्चों के लिए जोखिम और बढ़ रहा है।
पाबनी की मां पूजा कुमारी बताती हैं कि मौसम से जुड़ी समस्याओं का असर सीधे बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता है। वे कहती हैं, “अगर स्कूल कई दिनों तक बंद रहता है, तो बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह छूट जाती है। घर पर भी नियमित पढ़ाना आसान नहीं होता क्योंकि हर विषय पढ़ाना मुश्किल है।”
पाबनी बताती है कि स्कूल में बुनियादी सुविधाओं की कमी भी बड़ी समस्या है। स्कूल में पानी की उचित व्यवस्था नहीं है इसलिए बच्चों को घर से पानी लेकर जाना पड़ता है। कई बार तेज गर्मी के दौरान प्रार्थना सभा में बच्चे बेहोश भी हो जाते हैं।
मिड-डे मील के दिन जब बच्चों को बाहर बैठकर खाना पड़ता है, तब तेज धूप में बैठने से तबीयत खराब होने का खतरा बढ़ जाता है। पूजा कुमारी का कहना है, “मेरी बेटी को कई बार धूप के कारण चक्कर आ गया है, जब डॉक्टर को दिखाया तब उन्होंने बताया कि सूरज की तेज किरणों से जितना हो सके दूर रखें इसलिए तपती गर्मी के कारण मैंने उसे दो हफ्तों तक स्कूल नहीं भेजा। फिर गर्मी की छुट्टियों के कारण स्कूल ही बंद हो गया और उसकी पढ़ाई रुक गई।”
यहाँ यह भी बता दें कि बिहार में कुल 94339 स्कूल चलते हैं, जिनमें कुल 2.11 करोड़ बच्चे पढ़ते हैं। साल 2023 की इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट बताती है कि सभी ज़िलों के डीएम ने सरकारी स्कूलों का निरीक्षण किया, जिसमें उन्होंने पाया कि कमोबेश सभी स्कूलों में बहुत सारे बच्चे पढ़ने में बेहद कमजोर हैं। बिहार सरकार ने 25 लाख ऐसे बच्चों को चिन्हित किया था, जो पढ़ने में कमजोर थे। इन बच्चों के लिए बिहार सरकार ने मिशन दक्ष शुरू किया था जिसके तहत इन कमजोर बच्चों को अतिरिक्त कक्षाएँ कराई जाती हैं।
गर्मी में स्कूल जाना चुनौती
मुजफ्फरपुर के गोपालपुर तरौरा स्थित राजकीय मध्य विद्यालय में पढ़ने वाले 11 वर्षीय प्रिंस के लिए गर्मियों में स्कूल जाना किसी चुनौती से कम नहीं है। हर दिन उसे तेज धूप और उमस भरे मौसम के बीच स्कूल आना-जाना पड़ता है।
प्रिंस बताता है कि दोपहर के समय जब स्कूल की छुट्टी होती है, तब धूप इतनी तेज होती है कि घर तक पहुंचते-पहुंचते कई बार उसके शरीर पर लाल चकत्ते पड़ जाते हैं और सिर भी भारी होने लगता है। वह कहता है, “अगर स्कूल मॉर्निंग हो जाए तो थोड़ी राहत मिलती है क्योंकि सुबह धूप इतनी तेज नहीं होती लेकिन जब छुट्टी के समय दोपहर की तेज धूप में निकलना पड़ता है, तो बहुत परेशानी होती है।”
स्कूल तक पहुंचने का रास्ता भी आसान नहीं है। प्रिंस को रोज़ कुछ दूरी पैदल तय करनी पड़ती है। रास्ते में पेड़ों की छाया बहुत कम है, जिससे तपती गर्मी में चलना और मुश्किल हो जाता है। गर्मियों के दिनों में पानी की कमी और तेज लू का असर छोटे बच्चों पर ज्यादा पड़ता है, जिससे उनकी पढ़ाई पर भी असर पड़ता है।

सरकारी स्कूलों में संसाधनों की कमी
चरम मौसमी घटनाओं के असर को स्कूलों में कम करने के लिए एसी, कूलर, पंखे जैसी व्यवस्था की जा सकती है, लेकिन इसके लिए फंड की ज़रूरत है, जो सरकारी स्कूलों के पास नहीं होते हैं।
बेगूसराय के जगतपुरा मोटिहानी मिडिल स्कूल के हेड मास्टर नृपेंद्र कुमार पटेल बताते हैं कि सरकारी स्कूलों में कई बदलाव हुए हैं लेकिन अभी भी निजी और सरकारी स्कूलों के बीच काफी अंतर है क्योंकि निजी स्कूल को अच्छी आमदनी होती है और सरकारी स्कूल सरकार के जिम्मे होता है, जिसका सही से रख-रखाव नहीं हो पाता है। “निजी स्कूलों में कूलर, एसी आदि की व्यवस्था हो सकती है लेकिन सरकारी काम में इतना वक्त लग जाता है कि कभी-कभी काफी देर हो जाती है। हालांकि सरकारी स्कूलों की सूरत बदली है,” उन्होंने कहा।
बाढ़, शीतलहर या भीषम के कारण स्कूल बार-बार बंद होते हैं, जिस कारण ना केवल बच्चों की पढ़ाई रुक जाती है, बल्कि कई बार बच्चे अवसाद में भी चले जाते हैं क्योंकि गर्मी के कारण उनका घर से निकलना बंद हो जाता है।
जलवायु परिवर्तन के कारण अक्सर जब स्कूल बंद हो जाता है, तब इसका असर बच्चों की बौद्धिक, सामाजिक और मानसिक स्तर पर भी गंभीर असर होता है। साथ ही, कई बार एक सत्र की परीक्षा दूसरे सत्र तक टल जाती है, जिससे बच्चों का शैक्षणिक सत्र भी काफी लेट हो जाता है। “जब स्कूल खुलता है, तब हम पर पाठ्यक्रम को जल्दी पूरा करने का तनाव होता है। इससे ये संभव है कि बच्चा ठीक से समझ ना पाए। ऐसे में जलवायु परिवर्तन बच्चों के शिक्षण पर काफी नकारात्मक असर डालता है,” नृपेंद्र कुमार पटेल ने कहा।

इस विषय पर मनोचिकित्सक डॉ. बिंदा सिंह बताती हैं, “जब जलवायु परिवर्तन के कारण बार-बार आपदाएं आती हैं, तो बच्चे केवल स्कूल या घर नहीं खोते हैं बल्कि वे अपनी सुरक्षा की भावना भी खो देते हैं। इससे उनके मन में डर, असुरक्षा और भविष्य को लेकर चिंता पैदा हो जाती है। एक सुरक्षित और स्थिर परिवेश ही बच्चों के मानसिक विकास की पहली आवश्यकता है लेकिन जलवायु परिवर्तन के चलते होने वाली चरम मौसमी घटनाएँ बच्चों को समग्र तौर पर प्रभावित करती है।”
उन्होंने आगे कहा, “जलवायु परिवर्तन के चलते एक तरफ उनकी शिक्षा प्रभावित होती है, तो वहीं दूसरी तरफ़ उनका स्वास्थ्य गंभीर तौर पर प्रभावित होता है। स्कूल बंद होने के दौरान मिड-डे मील की सुविधा भी बंद हो जाती है, जिससे कुपोषण से लड़ाई भी धीमी पड़ जाती है।”
(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)
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