Main Media

Get Latest Hindi News (हिंदी न्यूज़), Hindi Samachar

Support Us

रामसर साइट बनने के बाद भी बक्सर के गोकुल जलाशय की सूरत नहीं बदली

गोकुल जलाशय केवल एक ऑक्सबो झील नहीं, बल्कि दियारा क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण जलवायु बफर है। लेकिन संरक्षण की कमी, अवैध निर्माण, प्लास्टिक कचरे और घटते जलस्तर ने इसकी पारिस्थितिकी को कमजोर कर दिया है।

cropped bimal kumar singh.jpg Reported By Bimal Kumar |
Published On :
even after becoming a ramsar site, the condition of gokul reservoir in buxar has not changed

बिहार के बक्सर जिले में चक्की से ब्रह्मपुर तक फैला गोकुल जलाशय एक प्राकृतिक चमत्कार है। लगभग 27 किलोमीटर लंबा यह जलाशय धनुषाकार आकृति लिए हुए है, जो गंगा नदी की पुरानी उप-धारा का जीवंत प्रमाण है। विस्तार में 4.48 हेक्टेयर क्षेत्र कवर करने वाला एक ऑक्सबो झील है, जो दियारा क्षेत्र की पारिस्थितिकी को समृद्ध करता है।


ग्रामीणों की मान्यता के अनुसार, 1952-53 में गंगा ने अपनी मुख्य धारा को तब की जलधारा से करीब 8 किलोमीटर उत्तर की ओर मोड़ लिया और जवही दियारा के पार बहने लगी। लेकिन पीछे छोड़ गई एक उप-धारा, जो आज गोकुल जलाशय के रूप में जानी जाती है। यह नदी की निशानी मात्र नहीं, बल्कि जैव-विविधता का खजाना है। यहां 65 से अधिक दुर्लभ और प्रवासी पक्षी प्रजातियां निवास करती हैं। यह दियारा इलाके के लिए बाढ़ बफर का काम करता है, सिंचाई का स्रोत है और पशुओं की प्यास बुझाता है। पक्षियों के अलावा, जलचर जीव, जलीय पौधे और मछलियां यहां की पारिस्थितिकी को संतुलित रखती हैं। परंतु अब इस जलाशय पर खतरा मंडरा रहा है और हालात बद से बदतर हो रहे हैं।

Also Read Story

बदलते मौसम में समस्तीपुर के किसानों का फलों की ओर बढ़ता कदम

बिहार में क्यों बढ़ रही हैं कुत्ता काटने की घटनाएं

वैशाली में केले के कूड़े से कैसे बनाया जा रहा रेशा

बदलते मौसम और सड़ते मुनाफे के बीच पिसते भागलपुर के केला किसान

बिहार के अररिया में क्यों बढ़ रही अजगरों की आबादी

भागलपुर: अवैध रेत खनन से गंगा की पारिस्थितिकी व डॉल्फिन पर गहराता संकट

क्या जलवायु परिवर्तन के चलते बिहार में बढ़ रहीं सर्पदंश की घटनाएं?

भोजपुर: अवैध रेत खनन, जलवायु परिवर्तन से जूझ रही सोन नदी

रामसर साइट गोगाबिल झील में प्रवासी पक्षियों का हो रहा शिकार!

दोहरा संकट

लोकसभा चुनाव से ठीक पहले, तत्कालीन सांसद व पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने इसे इको-टूरिज्म हब बनाने के लिए 32 करोड़ रुपये की योजनाओं का शिलान्यास किया। वॉकवे, बर्ड वॉचिंग टावर और बोटिंग सुविधाओं का सपना दिखाया। इससे पहले 2008 में, तत्कालीन विधायक व समिति सदस्य प्रो. हृदयनारायण सिंह के नेतृत्व में एक उच्च-स्तरीय टीम ने निरीक्षण किया। विकास संबंधी अनुशंसाएं कीं और 3 करोड़ 71 लाख रुपये का प्राक्कलन तैयार कर मत्स्य विभाग के निदेशक को भेजा। लेकिन डेढ़ दशक गुजरने पर भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। ग्रामीण व्यंग्य करते हैं – “चुनाव आते ही नेता-अधिकारी गांवों का दौरा करते हैं, वादे बांटते हैं। लेकिन वोट पड़ते ही भूल जाते हैं। कोई पूछने वाला ही नहीं रहता।”


वर्तमान स्थिति चिंताजनक है। जलाशय के किनारे साफ-सफाई का अभाव है; प्लास्टिक कचरा, गंदगी और अवैध निर्माण ने इसे बदहाल बना दिया है जिसका सीधा असर इसपर आश्रित लोगों के जीवन पर पड़ रहा है। जलस्तर घटने से मछलियों की कई प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर हैं, जिसका सीधा असर मछुआरों के जीवन पर पड़ रहा है। अब उन्हें मजबूरी में अपनी जीविका चलाने के लिए बड़े शहरों का रुख करना पड़ रहा है। वे बताते हैं कि पहले अच्छी कमाई होती थी, अब परिवार चलाना मुश्किल है। वन विभाग का दावा है कि किनारों पर लाखों पेड़ लगाए गए, लेकिन हकीकत में अधिकांशतः सूख चुके हैं।

रामसर टैग के बाद भी उपेक्षा

सितंबर 2025 में विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर इसे रामसर सूची में शामिल किए जाने से आसपास के 86 गांवों के हजारों लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई। लेकिन इस उपलब्धि के लिये कई लोगों ने लंबा संघर्ष किया है। सामाजिक कार्यकर्ता शिवजी सिंह पिछले दो दशकों से गोकुल जलाशय को वैश्विक पटल पर लाने के लिए संघर्षरत हैं। विधायकों से लेकर मंत्रियों तक के चक्कर लगाए, याचिकाएं दाखिल कीं। गोकुल जलाशय को रामसर साइट की सूची में शामिल किए जाने पर उन्हें खुशी तो है, लेकिन उनकी कुछ शंकाएँ भी हैं।

रामसर साइट का दर्जा उन आर्द्रभूमियों को दिया जाता है, जिनका अंतरराष्ट्रीय महत्व होता है। ये दर्जा रामसर कॉन्वेंसन के तहत दिया जाता है, जिसकी शुरुआत 1975 में हुई थी। रामसर साइट का दर्जा देने का असल उद्देश्य महत्वपूर्ण आर्द्रभूमियों को संरक्षित करना है।

जलाशयों का संरक्षण जलवायु परिवर्तन के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि ये जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार कार्बन-डाई- आक्साइड को सोखकर कार्बन उत्सर्जन में कमी लाते हैं। इसके अलावा जलाशय भूगर्भ जल के रिचार्ज में भी अहम भूमिका निभाते हैं।

फिर भी, रामसर स्थल का दर्जा मिलते ही आशा की किरण दिखी है कि निकट भविष्य में इसका कायाकल्प होगा। इको-टूरिज्म से न केवल रोजगार बढ़ेगा, बल्कि जैव-विविधता संरक्षण भी सुनिश्चित होगी, जिसको लेकर जिला प्रशासन ने दावा किया कि जल्द ही जलाशय की सूरत बदलेगी। जिला वन अधिकारी (DFO) प्रद्युम्न गौरव ने बताया कि इंटिग्रेटेड मैनेजमेंट प्लान (IMP) के तहत पूरे जलाशय का जीर्णोद्धार किया जाएगा। इसके लिए पंचवर्षीय योजना भी स्वीकृत हुई है जिसके तहत अगले वर्ष कार्य प्रारंभ होनेवाला है। इसके तहत पक्षियों की गिनती तथा पर्यटकों के लिए कुछ मूलभूत सुविधाएं इत्यादि की व्यवस्था की जाएगी। उन्होंने बताया कि थोड़ा बहुत वृक्षारोपण भी हुआ है। एक अन्य सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि पूर्व सांसद अश्विनी कुमार चौबे द्वारा लोकसभा चुनाव से पूर्व शिलान्यास की गई योजनाओं का एक पैसा भी अभी तक खर्च नहीं हुआ हैं। अन्य योजनाओं के सवाल को टालते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं है।

सीमांचल की ज़मीनी ख़बरें सामने लाने में सहभागी बनें। ‘मैं मीडिया’ की सदस्यता लेने के लिए Support Us बटन पर क्लिक करें।

Support Us

बिहार के बक्सर जिले के रहनेवाले बिमल कुमार सिंह पत्रकारिता से स्नातकोत्तर हैं व एक दशक से इसी क्षेत्र में काम कर रहे हैं। गणादेश और प्रभात खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से शुरु कर के आज वो 'द जनमित्र' नामक न्यूज पोर्टल संचालित कर रहे हैं तथा अन्य पोर्टल व पत्रिकाओं के लिए भी काम करते रहें हैं।

Related News

सोलर आधारित कृषि में क्यों पिछड़ा है बिहार का सीमांचल?

सिवान के गांवों में पॉलिथीन कचरे का बढ़ता अंबार, बिहार सरकार का प्रतिबंध ताक पर

बिहार की खेती पर जलवायु परिवर्तन की मार, अररिया से ग्राउंड रिपोर्ट

बिहार में बाढ़ से कैसे जूझ रहे बेज़ुबान मवेशी

कोसी कटान से लाचार सहरसा के लोगों का दुःख-दर्द कौन सुनेगा?

‘मैं मीडिया’ ने बिहार के ग्रामीण पत्रकारों के लिए आयोजित की तीन दिवसीय जलवायु परिवर्तन कार्यशाला

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Latest Posts

Ground Report

बिहार के नवादा में अतहर की मॉब लिंचिंग के डेढ़ महीने बाद भी न मुआवज़ा मिला, न सबूत जुटे

बिहार चुनाव के बीच कोसी की बाढ़ से बेबस सहरसा के गाँव

किशनगंज शहर की सड़कों पर गड्ढों से बढ़ रही दुर्घटनाएं

किशनगंज विधायक के घर से सटे इस गांव में अब तक नहीं बनी सड़क

बिहार SIR नोटिस से डर के साय में हैं 1902 में भारत आये ईरानी मुसलमान