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गरीबों को रोजगार देने वाला मनरेगा कैसे बना भ्रष्टाचार का अड्डा

भारत में मजदूरों को सीधे तौर पर आर्थिक सहायता पहुंचाने के लिए भारत सरकार ने 7 सितंबर 2005 से महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना MGNREGA की शुरुआत की थी।

shah faisal main media correspondent Reported By Shah Faisal |
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भारत में वैसे मजदूर जिन्हें काम करने का तरीका न आता हो, उन्हें सीधे तौर पर आर्थिक सहायता पहुंचाने के लिए भारत सरकार ने 7 सितंबर 2005 से महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना MGNREGA की शुरुआत की थी।

योजना का मकसद था किसी भी ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्यों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराना, यानी कि सरकार वैसे किसी भी अकुशल मजदूर को प्रत्येक वित्तीय साल में 220 रुपये की दिहाड़ी पर 100 दिनों तक का रोजगार देगी जो काम करने को इच्छुक हों। लेकिन, ये योजना ज़मीन पर कितनी कारगर है, इसे समझने के लिए हमने पिछले एक महीने में बिहार के किशनगंज जिला में इसका गहन जायजा लिया।

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प्रधानमंत्री आवास योजना के लाभुक को मनरेगा का पैसा नहीं मिला

किशनगंज जिले के पोठिया प्रंखड के परलाबाड़ी पंचायत के वार्ड 12 कुजीबाड़ी गाँव के रहने वाले जहांगीर आलम एक प्रवासी मजदूर हैं, जो समय समय पर खेतीबाड़ी के काम से कुछ पैसे कमाने के लिए पंजाब चले जाते हैं। लॉकडाउन के कारण बाहर जाने का रास्ता बंद हो गया, इसी बीच प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए भी इनका चयन हुआ।


आर्थिक रूप से कमजोर जहांगीर आलम अपने घर के निर्माण कार्य में जुट गये। सरकारी नियमानुसार किसी भी आवास लाभुक को मनरेगा योजना से 90 दिनों का रोजगार देने का प्रावधान है। यानी कि आवास निर्माण योजना के एक लाख बीस हज़ार के अलावा आवास लाभुक के परिवार के वयस्क सदस्यों में एक या एक से अधिक सदस्यों को मनरेगा योजना से बतौर मजदूरी कुल 19800 रुपये अतिरिक्त दिये जाते हैं। लेकिन विभागीय लापरवाही के कारण यह पैसा लाभुक के खाते में ट्रांसफर होने के बजाय किसी और के खाते में भेज दिया गया।

मामला मनरेगा मजदूरी से जुड़ा हुआ है, इसीलिए हमने प्रखंड स्तरीय मनरेगा प्रोग्राम ऑफिसर से बात की तो उन्होंने बताया कि हमारे पास आवास के पोर्टल से सीधे डाटा आ जाता है उसी आधार पर पेमेंट किया जाता है।

काम किया, लेकिन लिस्ट में नाम नहीं

ऑनलाइन सिस्टम में सेंधमारी अगर हुई है तो ऐसा मुमकिन है कि मनरेगा में सेंधमारी बड़ा आसान है। कितना आसान है और सेंधमारी की पैठ कितनी मजबूत है, यह जानने के लिए हम किशनगंज जिले के पोठिया प्रखंड क्षेत्र में निकले।

प्रखंड की छत्तरगाछ पंचायत के कुर्साकांटा आदिवासी टोले का रुख किया, तो गांव तक जाने वाली सड़क पर मनरेगा बोर्ड लगा था। योजना कुछ महीने पहले ही समाप्त हुई थी। गांव में हमारी मुलाकात 33 वर्षीय बिटका मरांडी से हुई। बातचीत में पता चला कि लगभग 3 महीने से इनके पास कोई काम नहीं है, इसीलिए समय काटने के लिए मछली पकड़ने चले जाते हैं। इन्हें रोजगार तो चाहिए, लेकिन मनरेगा या जॉब कार्ड के बारे में कोई जानकारी नहीं है।

बिना काम धंधा के घर में बैठे बैठे बाबू लाल हेम्ब्रम परेशान हैं। रोजगार के नाम पर उन्हें सिर्फ अपने गांव की सड़क में काम करने का मौका मिला था, जिसमें 400 रुपये की दिहाड़ी मिली थी।

फूलमनी हासदा के परिवार की कमाई काफी कम होने के कारण घर की रिसती छत को भी ठीक कराने की हिम्मत नहीं है। फूलमनी बताती हैं कि गांव की सड़क में इन्होंने भी 400 रुपये की दिहाड़ी पर काम किया था।

छतरगाछ पंचायत के कुर्साकांटा के बिटका मरांडी, बाबू लाल हेम्ब्रम और फूलमनी हासदा के मामले में यह देखा गया कि इन्हें जॉब कार्ड या मनरेगा के विषय में कोई जानकारी नहीं है, जो गाँव इलाके में आम सी बात है। लेकिन जिस सड़क में इन तीनों ने 400 रुपए की दिहाड़ी पर मजदूरी की थी, वह सड़क मनरेगा योजना से निर्मित थी।

इस योजना से जुड़कर रोजगार पाने के लिए मजदूर का एक कार्ड बनता है, जिसे जॉब कार्ड कहा जाता है। इसी कार्ड में मजदूर की दैनिक हाजिरी सहित मजदूर को कितने दिन का रोजगार मिला है जैसी तमाम जानकारियों का लेखा-जोखा होता है। ये कार्ड कोई भी इच्छुक मजदूर पंचायत की सहायता से बनवा सकता है।

प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक पंचायत रोजगार सेवक

प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक PRS यानी पंचायत रोजगार सेवक होता है, जिसका काम मुख्य पंचायत के सभी जॉब कार्ड धारकों को हर हाल में 100 दिनों का काम उपलब्ध कराना होता है। जॉब कार्ड धारी मजदूरों को काम देने के लिए PRS को पंचायत में तरह तरह के काम करवाने पड़ते हैं। अब अगर पीआरएस जॉब कार्ड वालों को काम नहीं दे सका तो मनरेगा का नियम कहता है कि काम न पाने वाले जॉब कार्ड धारकों को बेरोजगारी भत्ता दिया जाये जिसका अपना एक नियम है। यानी कि मनरेगा योजना में काम करने वाले मजदूरों का जॉब कार्ड अनिवार्य है, साथ ही उनकी दिहाड़ी 220 रुपए प्रतिदिन की होती है।

छतरगाछ पंचायत के जॉब कार्ड धारकों की पूरी सूची में बिटका मरांडी, बाबू लाल हेम्ब्रम और फूलमनी हासदा का नामोनिशान नहीं है। और तो और मनरेगा पोर्टल में योजना का डिटेल देखने पर मालूम हुआ कि जिस सड़क को बनाने में आदिवासी गाँव के लोगों ने मजदूरी की थी, उस गांव के किसी भी सदस्य का नाम सूची में है ही नहीं। इस पर छतरगाछ पंचायत के रोजगार सेवक ने साफ़-साफ़ बताया कि मजदूरों को मजदूरी कैश चाहिए होता है।

पंचायत जनप्रतिनिधि रख लेते हैं पैसे

स्थिति को और अच्छे से समझने के लिए हमने पोठिया प्रखंड की एक और पंचायत के एक मजदूर से बात की, ये टूटे फूटे घर में रहने को मजबूर हैं। उन्होंने बताया कि उनके नाम से मनरेगा का जॉब कार्ड है या नहीं, उन्हें नहीं पता। हालांकि उन्होंने बताया कि कुछ दिन पहले उनकी बीवी के खाते में मनरेगा का पैसा आया था, लेकिन वार्ड सचिव ने 300 रुपये देकर सारे पैसे निकाल लिए।

छह लोगों के परिवार में मुर्मू अकेले कमाऊ सदस्य हैं, पैसों की किल्लत के कारण घर में सब्जी भी नहीं बन पाती है। बकौल मुर्मू इनका जॉब कार्ड वार्ड सदस्य ने रखा हुआ है। मांगने पर कहा जाता है कि खो गया है।

बातचीत करने के तुरंत बाद उन्हें जनप्रतिनिधियों की धमकियां मिलने लगीं, तो वह डर गए और अपना वीडियो डालने से मना करने लगे। उनकी सुरक्षा के मद्देनजर हमने उनका नाम बदल दिया है, तस्वीर ब्लर कर दी है और आवाज बदल दी है।

मनरेगा में घोटालेबाजी की जड़ें मजबूत

मनरेगा में घोटालेबाजी की जड़ें इतनी मजबूत हो गई हैं कि किसी भी ग्रामीण में इतनी हिम्मत नहीं कि वह इसका विरोध कर सके। मनरेगा लोगों को रोजगार से जोड़ने की योजना है, चूँकि लोगों के लिए रोजगार तैयार करना है, इसीलिए पंचायत में तरह तरह के कार्य किये जाते हैं। लेकिन लोगों ने रोजगार मुहैया कराने वाली योजना को अपने तरीके पर ढाल लिया है। स्थल पर योजना का प्राथमिक मकसद रोजगार देने के बजाय काम करना बन गया है।

इसलिए जॉब कार्ड बनने के बावजूद लोगों को पता नहीं कि उनके खाते में कौन सा पैसा आता है, जो मेंबर सचिव और रोजगार सेवक की मिलीभगत से निकाल लिया जाता है। अब देखना यह है कि भोली भाली जनता यूँ ही घोटालेबाजों की चक्की में पिसती रहेगी या फिर अधिकारी मनरेगा के वास्तविक उद्देश्य को जमीन पर उतारेंगे।

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Shah Faisal is using alternative media to bring attention to problems faced by people in rural Bihar. He is also a part of Change Chitra program run by Video Volunteers and US Embassy. ‘Open Defecation Failure’, a documentary made by Faisal’s team brought forth the harsh truth of Prime Minister Narendra Modi’s dream project – Swacch Bharat Mission.

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4 thoughts on “गरीबों को रोजगार देने वाला मनरेगा कैसे बना भ्रष्टाचार का अड्डा

  1. Ak dm sahee bat dikhaye gaye hai aisa hee hamare block mai ho raha hai 100 din kam krne ke bad bhee ghar mai toilet nahee bana hai or to or mjduri kre hue 2 months ho gaye abhee tk paise nahee mile.Na to ghar na rasan card hai or na ghar mai toilet hai.koi sunne bana hee nahee hai.sb chor hai

    Tahirhusain V.Harkishanpur post Allhipur mohakam block Afgalgarh tasheel Dhampur Distric Bijnor U.P.

  2. बस एक माइक ले कर कैमरा ले कर चल दिये और बन गए पत्रकार । एक रोजगार सेवक का मानदेय कितना है ? उस से मनरेगा के अलावा और क्या काम लिया जाता है ? बस तुमलोग घटिया लोग घटिया खबर ही लिखोगे । कभी कोशिश किये हो कि होता है तो क्यों ?

  3. Kabhi Bina paise ke kaam kiya hai rozgasevak ko aath aath mah Tak mandey nahi milta kabhi socha hai ki uske bhi bacchhe hai aur unhe bhi bhukh lagti hai unki bhi feesh na Dene ki vajah se school vale beijatt karte hai kabhi unke bare me socha kisi ne

  4. Pehle to manrega ka system government thik kare baad me sawal uthao tumlog , tumlog bss chote thekedar logon ke piche pade rehte ho

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