Main Media

Get Latest Hindi News (हिंदी न्यूज़), Hindi Samachar

Support Us

“मखाना की फसल में कीड़ा लग जाता है, पत्ता गल जाता है”

मखाना को लेकर असर और रिजेनरेटिव बिहार द्वारा हाल ही में किये गये एक शोध में ये बात सामने आई है कि मखाना पर बीमारियों का प्रकोप विध्वंसकारी है। क्लाइमेट चेंज एंड मखाना फार्मर्स ऑफ बिहार नाम से किये गये इस शोध में बासैठ कृषि विज्ञान केंद्र, मधुबनी के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. मंगलानंद झा इसे जलवायु परिवर्तन से जोड़ते हैं।

cropped md faisal kaleem.jpeg Reported By Md. Faisal Kaleem |
Published On :
disease casts a shadow on the makhana crop in bihar
बिहार के मखाना की फसल पर बीमारी का साया

पिछले लगभग 7-8 साल से मखाना की खेती कर रहे अररिया जिले के किसान मो. मुशर्रफ आलम अपने 40 बीघा खेत में फैले मखाना को देखते हैं, तो उनका कलेजा मुंह को आ जाता है। उन्हें डर सताता रहता है कि कहीं इस बार मखाना पूरी तरह बर्बाद न हो जाए। इसी डर से निजात पाने के लिए वह अब तक 6-7 बार मखाना के पौधों में स्प्रे कर चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें भरोसा नहीं है कि इस बार मखाने की उपज अच्छी होगी। 


“मखाना में कई तरह की बीमारी है। मौसम बदलने से बीमारी और हावी हो रहा है। अब तक 6-7 बार स्प्रे कर चुके हैं, और 4-5 स्प्रे लगेगा, क्योंकि अभी फूल आने का समय है और अभी पत्ता और फल को कीड़ा खा रहा है।”

Also Read Story

ईंट-भट्ठों से ज़हरीली होती हवा: ग्रामीण बिहार में एनीमिया और प्रदूषण का गहरा रिश्ता

क्या नीलगाय-किसान का संघर्ष बदल रहा बिहार का क्रॉप पैटर्न?

मोल का पानी, मुफ़्त का ज़हर: अररिया की मांस फ़ैक्ट्रियों का जलवायु सच

बिहार में लू का कहर: बढ़ता तापमान, उलझे आंकड़े और अधूरी तैयारी

क्यों सूख रहा है मिथिलांचल का भू-जल?

बिहार के पूर्वी चंपारण में क्यों कम हो रही गन्ने की पैदावार?

सुपौल में क्यों घट रही जूट की खेती?

कोसी कटान में उजड़े आशियाने, दशकों से पुनर्वास के इंतज़ार में बाढ़ विस्थापित

बिहार में दलहन की खेती पर जलवायु परिवर्तन का कैसा असर?

कई किसानों के पास उतनी पूंजी नहीं होती कि वे कीटनाशक खरीद सकें। 


पिछले तीन साल से मखाना की खेती कर रहे अररिया के तिरहुत बिट्टा गाँव के किसान मो. अशफ़ाक़ आलम ने इस बार दो एकड़ खेत में मखाना की खेती की है। उन्होंने मखाना की खेती इसलिए चुना था क्योंकि इसमें मुनाफा अधिक था। लेकिन अब मखाना की खेती उन्हें मुनाफा से ज़्यादा चिंताएं देती है। “अभी कीड़ा का बहुत समस्या है और कीटनाशक बहुत महंगा है। इस वजह से जितना चाहिए नहीं डाल पा रहे हैं। हर बार दवाई भी नया लेना पड़ता है। दुकानदार के पास जाते हैं तो वो बोलता है कि अब पुराना दवाई नहीं काम नहीं करेगा और नई दवा दे देता है,” मो. अशफाक आलम कहते हैं।  

एक अन्य किसान अफ़ज़ल करीब 30 सालों से मखानों की खेती कर रहे हैं और इस बार उन्होंने करीब 40 बीघा खेत में मखाना लगाया है। उनके तीन दशकों के मखाना खेती के अनुभव का निचोड़ यही है कि अब मखाना में बीमारियां ज्यादा होने लगी है, जबकि पहले ऐसा नहीं था। अफ़ज़ल कहते हैं, “अभी फसल में बीमारी ज़यादा हो गया है। कीड़ा लग जाता है, पत्ता गल जाता है। पहले बिना खर्च के ज़्यादा उपज था। अब बीमारी की वजह से खर्च बढ़ गया है।” 

मो. मुशर्रफ आलम कहते हैं, “पहले जब मखाना लगाते थे, तब 1-2 बार खाद डालते थे। लेकिन, अभी 3-4 बार डाल देते हैं, फिर भी खाद अच्छा काम नहीं कर रहा है।” किसानों का कहना है कि बीमारियां व कीटों का प्रकोप मखाना उत्पादन को को बुरी तरह प्रभावित करते हैं। 

md. musharraf alam, a farmer from araria district
अररिया जिले के किसान मो. मुशर्रफ आलम

रकबा बढ़ने के साथ बढ़ा कीटों का प्रकोप

हाल के वर्षों में मखाना एक सुपरफूड के तौर पर लोकप्रिय हुआ और इसी मांग में तेजी आई तो मिथिला और सीमांचल क्षेत्र के किसानों में मखाना की खेती करने की होड़ लग गई। आंकड़े बताते हैं कि बिहार में मखाना की खेती का रकबा लगातार बढ़ रहा है। 

आंकड़ों के मुताबिक, 2022-23 में 27.7 हज़ार हेक्टेयर में मखाना की खेती होती थी, जो 2024-25 में बढ़कर 28.0 हज़ार हेक्टेयर हो गया है। लेकिन उपज में उतार चढाव दर्ज़ की गई है। 2022-23 में 56.8 हज़ार टन उपज 2023-24 में घटकर 56.4 हज़ार टन हो गया, हालांकि 2024-25 में ये बढ़कर 58.8 हज़ार टन हुआ है। 

लेकिन मखाना की खेती के लिए जो दौड़ शुरु हुआ, वो बीमारियों व कीटों के चलते अब धीमा होता नजर आ रहा है।

इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च के वैज्ञानिकों द्वारा प्लांट हेल्थ इश्यूज इन फॉक्स नट/मखाना/ (यूरेली फेरॉक्स): ऐन एग्रोनॉमिक पर्सपैक्टिव शीर्षक से प्रकाशित शोध कहता है कि मखाना एक सहनशील (हार्डी) फसल माना जाता था, क्योंकि पारंपरिक जीविकोपार्जन आधारित खेती प्रणाली में इसमें कीटों और रोगों की घटनाएँ बहुत कम देखी जाती थीं। लेकिन जैसे-जैसे इसकी खेती में व्यावसायिक रुचि बढ़ी और उत्पादन व गुणवत्ता सुधार के लिए गहन शोध कार्य किए गए, वैसे-वैसे विभिन्न खरपतवार, कीट, रोग तथा असंतुलित या अपर्याप्त पोषण से जुड़ी समस्याएँ सामने आईं। 

मखाना में रोगों और कीटों के हमलों का असर भयावह हो सकता है। शोध बताता है कि ये कुल उत्पादन में 20–25% तक की कमी ला सकते हैं और कई बार पूरी फसल भी तबाह करने की क्षमता रखते हैं। 

व्यावसायिक स्तर पर मखाना की खेती करने वाले किसानों के लिए इन रोगों और कीटों के बारे में जानकारी होना आवश्यक है ताकि वे इसकी शिनाख्त कर समय पर उपचार कर सकें। लेकिन दिक्कत ये है कि किसान इससे बिल्कुल अनजान हैं। 

मसलन कि मो. मुशर्रफ आलम को ही लीजिए। उन्हें कीटों की फोटो खींचकर दुकानदार को दिखाना पड़ता है दवा के लिए। वह कहते हैं, “खेत की तरफ जब आते हैं, तो पत्ता को उठा कर देखते हैं, कीड़ा दिखता है तो उसका फोटो व वीडियो कर लेते हैं, दुकान पर लेकर जाते हैं। वो दवाई देते हैं और बोलते हैं ये दवाई डालिये और निश्चिन्त हो जाइये, लेकिन 8-10 दिन बाद फिर वही समस्या आ जाती है।”

“जो हरा भरा अच्छा पत्ता है, बड़ा फल होता है, उसको कीड़ा खाता है,” वह आगे कहते हैं। 

मखाना फसल पर हमला करने वाले मुख्य कीटों में एफिड्स, केस वर्म और रूट बोरर शामिल हैं, जबकि अल्टरनैरिया टैन्यूस द्वारा होने वाला पत्ती झुलसा रोग (लीफ ब्लाइट) सबसे अधिक विनाशकारी माना गया है।

चूंकि मखाना जलीय वातावरण में उगाया जाता है, इसलिए रासायनिक कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग करने से बचना चाहिए, जब तक कि नुकसान आर्थिक रूप से असहनीय न हो जाए। इसके साथ ही, संतुलित और पर्याप्त पोषण देना भी आवश्यक है, क्योंकि इससे फसल स्वस्थ और सशक्त बनी रहती है तथा विभिन्न जैविक और अजैविक तनावों, जैसे कीट और रोग का बेहतर सामना कर पाती है।

farmer showing a leaf eaten by insects
कीड़े द्वारा खाये गए पत्ते को दिखाते किसान

बिहार कृषि विश्वविद्यालय के भोला पासवान शास्त्री कृषि महाविद्यालय, पूर्णिया के वैज्ञानिकों के शोध इमर्जिंग पेस्ट्स ऑफ मखाना (यूरेली फेरॉक्स सैलिब्स.) क्रॉप इन कोशी रिजन ऑफ बिहार में मखाना फसल में कुल छह प्रकार के कीटों तथा कुछ अज्ञात गैस्ट्रोपोड (घोंघा/स्लग वर्ग) प्रजातियों को कीट के रूप में दर्ज किया गया है। मखाना पौधे के लगभग सभी भाग—जैसे पत्तियाँ, पत्ती की शिराएँ, डंठल (पेटियोल), तना (शूट), रेशेदार जड़ें, फूल और फल—इन कीटों के हमले से प्रभावित पाए गए।

परिवर्तित फसल प्रणाली और गहन खेती के कारण एफिड, केस वर्म, रिब बोरर तथा गैस्ट्रोपोड जैसे कीट अधिक गंभीर समस्या बनकर उभरे हैं, जो अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने में बड़ी बाधा हैं।

इसके अलावा, कुछ कीट जैसे लीफ बग और सिंघाड़ा बीटल अभी गौण कीट के रूप में पाए गए हैं, लेकिन भविष्य में खेती के तरीकों में बदलाव और तीव्रता बढ़ने के साथ इनकी संख्या और प्रकोप बढ़ सकता है।

संरक्षित प्लॉट पर खेती फायदेमंद

कीटों के प्रकोप को देखते हुए जानकारों का मानना है कि संरक्षित प्लॉट में इसकी खेती से संभावित नुकसान को काफी कम किया जा सकता है। इसके लिए विज्ञानियों ने अध्ययन किया और पाया संरक्षित प्लॉट में मखाना का उत्पादन 3378 से 3940 किग्रा/हेक्टेयर के बीच रहा, जबकि असंरक्षित प्लॉट में यह 2666 से 3471 किग्रा/हेक्टेयर के बीच था। औसत देखें, तो असंरक्षित प्लॉट में मखाना का उत्पादन संरक्षित प्लॉट के मुकाबले 17.04% कम रहा। लेकिन, किसानों को नहीं पता कि संरक्षित प्लॉट क्या होता है।

मखाना को लेकर असर और रिजेनरेटिव बिहार द्वारा हाल ही में किये गये एक शोध में ये बात सामने आई है कि मखाना पर बीमारियों का प्रकोप विध्वंसकारी है। क्लाइमेट चेंज एंड मखाना फार्मर्स ऑफ बिहार नाम से किये गये इस शोध में बसैठ कृषि विज्ञान केंद्र, मधुबनी के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. मंगलानंद झा इसे जलवायु परिवर्तन से जोड़ते हैं।

वह कहते हैं, “बदलते मौसमीय परिस्थितियाँ कीटों और रोगों के प्रसार के लिए अनुकूल बनती जा रही हैं, जिससे उनका प्रकोप लगातार बढ़ रहा है। दूसरी ओर, अत्यधिक कृषि रसायनों के उपयोग और सतही जल स्रोतों में सूक्ष्मजीवों के प्रदूषण के कारण पानी का अम्लीकरण तेज़ी से हो रहा है। अत्यधिक गर्मी और शुष्क मौसम के कारण वाष्पीकरण बढ़ने से पानी में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा घट रही है, जिससे अम्लीकरण की प्रक्रिया और तेज़ हो जाती है।”

लेकिन, इन मखाना किसानों की इन समस्याओं का कोई समाधान होता हुआ नहीं दिख रहा है। नतीजतन किसान किस्मत के भरोसे मखाना की खेती करते हैं और नफा नुकसान प्रकृति पर छोड़ देते हैं। 

farmer md. ashraful
किसान मो. अशरफुल

अपने 25 बीघा खेत में मखाना की खेती कर रहे मो. अशरफुल कहते हैं, “इसमें काला-काला कीड़ा होता है। कीड़ा लगने के 2-3 दिन के अंदर अगर इसको स्प्रे नहीं किया जाता है, तो पूरे खेत को ये बर्बाद कर देता है। पत्ता खा लेता है।”

वह आगे कहते हैं, “सही उपज होने पर 2.5 क्विंटल प्रति बीघा हो जाता है, लेकिन बीमारी लगने पर 1-1.5 क्विंटल उपज मुश्किल से होती है…इतने में किसान का क्या बचेगा!”

फिर भी, अशरफूल जैसे किसान इसी उम्मीद में मखाना की खेती करते जाते हैं इस साल नहीं हुआ, तो अगले साल अच्छी उपज हो जाएगी, लेकिन अगले साल भी नाउम्मीदी ही हाथ लगती है। ये चक्र साल दर साल चलता जा रहा है, मगर ये कब तक चलेगा, कहना मुश्किल है।

सीमांचल की ज़मीनी ख़बरें सामने लाने में सहभागी बनें। ‘मैं मीडिया’ की सदस्यता लेने के लिए Support Us बटन पर क्लिक करें।

Support Us

फैसल अररिया के पत्रकार हैं और वे ‘सीमांचल डायरी’ नामक संस्थान के संस्थापक हैं।

Related News

लीची पर फ्लाई ऐश की मार, मशरूम बना मुजफ्फरपुर के किसानों का सहारा

किशनगंज में मक्के की खेती कैसे बन रही है मानव-हाथी संघर्ष की वजह?

रामसर दर्जा मिलने से बिहार के वेटलैंड्स की स्थिति में क्या बदलाव आया है?

हर साल ग्रीन बजट लाने वाला बिहार आंकड़ों में कितना ‘ग्रीन’ है?

जलवायु संकट की मार झेलते बिहार के किसान, प्री-मानसून ओलावृष्टि से तबाह खरीफ फसल

नाव, नदी और नसीब: कोसी के गांवों में मातृत्व की अधूरी कहानियाँ

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Latest Posts

Ground Report

VB-G RAM G: लागू होने से पहले ही क्या नया कानून मनरेगा मज़दूरों का हक़ छीन रहा?

बिहार के नवादा में अतहर की मॉब लिंचिंग के डेढ़ महीने बाद भी न मुआवज़ा मिला, न सबूत जुटे

बिहार चुनाव के बीच कोसी की बाढ़ से बेबस सहरसा के गाँव

किशनगंज शहर की सड़कों पर गड्ढों से बढ़ रही दुर्घटनाएं

किशनगंज विधायक के घर से सटे इस गांव में अब तक नहीं बनी सड़क