बिहार के नालंदा जिलान्तर्गत राजगीर में 29 अगस्त से 7 सितंबर तक पुरुष हॉकी एशिया कप 2025 खेला गया। भारत ने चौथी बार इस प्रतियोगिता को जीता, जबकि यह देश में आयोजित होने वाला तीसरा पुरुष हॉकी एशिया कप था। इस तरह राजगीर, पुरुष हॉकी एशिया कप की मेज़बानी करने वाला राजधानी नई दिल्ली और चेन्नई के बाद तीसरा शहर बन गया।
बिहार में पहली बार पुरुष हॉकी प्रतियोगिता की चकाचौंध के बीच हमें कुछ बच्चियां दिखीं, जिनमें से कुछ के हाथों में पेन और काग़ज़ के टुकड़े थे। पूछने पर पता चला कि इन होनहार युवा खिलाड़ियों को मैदान में खेल रहे अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के बारे में काग़ज़ पर लिखने को कहा गया है।
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“हमने उन्हें एक असाइनमेंट दिया है जिनमें उन्हें मैच के नोट्स बनाने को कहा जाता है। कौन सा प्लेयर किस पोज़ीशन में खेल रहा है और कैसे खेल रहा है यह उन्हें लिखना होता है। हर मैच खत्म होने के बाद हम उन्हें डिब्रीफ करते हैं,” बिहार स्टेट स्पोर्ट्स एसोसिएशन के डायरेक्टर जनरल रवींद्रन संकरण ने हमें बताया।
वहीं, अंडर 19 खिलाड़ी पुष्पांजलि कहती हैं, “यहाँ जितना भी मैच हमलोग देखते हैं, उसको डायरी में नोट करते हैं कि आज हमने क्या सीखा। जितने प्लेयर आए, उन सबसे हमलोग कुछ न कुछ सीखते हैं। हॉस्टल वापस जाकर डायरी में लिखते हैं कि आज हमने क्या क्या सीखा।”
मिला नया लक्ष्य
पुरुष और महिला की अलग-अलग श्रेणियों के करीब 100 हॉकी खिलाड़ी राजगीर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में हॉकी के गुर सीख रहे हैं। 1 जनवरी 2025 को पूर्णिया जिले में स्थित एकलव्य महिला हॉकी सेंटर को राजगीर शिफ्ट कर दिया गया था। तब से केंद्र की करीब दो दर्जन लड़कियां कॉम्प्लेक्स में रहकर हॉकी खेल रही हैं। इनमें से कई लड़कियों ने अलग-अलग आयु वर्ग में बिहार का नेतृत्व किया है।
पुरुष हॉकी एशिया कप के दौरान महज़ कुछ मीटर की दूरी पर अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों को देखकर अंडर 14 खिलाड़ी रानी कुमारी काफी उत्साहित नज़र आईं।
“इन खिलाड़ियों को खेलते देखने से हमलोग को काफी सीखने को मिलता है। आगे हमको भी इंडिया प्लेयर बनना है, इसलिए इनसे सीख रहे हैं,” पूर्णिया से राजगीर आई रानी कुमारी ने ‘मैं मीडिया’ से कहा।
वहीं, अंडर 17 खिलाड़ी सुरभि रानी कहती हैं, “इस प्रतियोगिता से हमें बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है। कैसे अटैक करते हैं, कैसे डिफेंस करते हैं, बहुत कुछ सीख रहे हैं। बिहार में लगातार ऐसा टूर्नामेंट होना चाहिए। इससे और भी बच्चे खेलेंगे, उनमें और इंटरेस्ट पैदा होगा।”
सुरभि पूर्णिया के कृत्यानंद नगर प्रखंड स्थित प्राणपट्टी गांव की रहने वाली हैं। 15 वर्षीय सुरभि ने 2 वर्ष पहले पूर्णिया के एकलव्य केंद्र में हॉकी खेलना शुरू किया था। केंद्र के शिफ्ट होने पर वह राजगीर कॉम्प्लेक्स आईं और पिछले 9 महीने से यहां हॉकी की बारीकियां सीख रही हैं।
वो कहती हैं, “पापा काफी सपोर्ट करते हैं। वह कहते हैं कि तुम जॉब की तलाश में मत रहो, बस हॉकी खेलो। पहले तो हम बिहार के लिए मैडल लाना चाहते हैं और फिर आगे जाकर इंडिया खेलना चाहते हैं।”
सुरभि के पिता किसान हैं जो हॉकी खेलने पर अपनी बेटी का समर्थन करते हैं। उसके गांव से दो महिला हॉकी खिलाड़ियों ने अपने खेल के दम पर सरकारी जॉब की राह ढूंढ़ी जिनसे प्रेरित होकर सुरभि ने हॉकी स्टिक से अपनी किस्मत बनाने की ठान ली।
गांव से निकल कर दो महिला खिलाड़ियों का पूर्णिया जिला स्तर पर हॉकी खेलने से सुरभि के लिए हॉकी चुनने का फैसला आसान हो गया और इसमें उन्हें घर-परिवार का भी पूरा समर्थन मिला। हालांकि, कई हॉकी खिलाड़ियों के लिए राह इतनी आसान नहीं होती।
सामाजिक रूढ़िवाद को चुनौती
पूर्णिया के बड़हरा कोठी प्रखंड स्थित औराही पंचायत के उरांव टोला की निवासी पुष्पांजलि कुमारी पिछले 6 वर्षों से हॉकी खेल रही हैं। अंडर 19 खिलाड़ी पुष्पांजलि भारतीय पुरुष टीम के कप्तान हरमनप्रीत सिंह की तरह विश्व स्तरीय ड्रैग फ्लिकर बनना चाहती हैं।
छोटे से गांव से निकली पुष्पांजलि के लिए हॉकी खेलने का निर्णय इतना आसान नहीं था। गांव में हॉकी यूनिफार्म को लेकर उनकी काफी आलोचना की गई लेकिन सामाजिक दबाव के बावजूद उन्होंने अपने खेल को जारी रखा। “गांव में लोग कहते थे कि इस खेल कूद से कुछ नहीं होगा, पढ़ाई किया करो। कुछ लोग कहते थे कि छोटे कपड़े मत पहना करो,” पुष्पांजलि कहती हैं।

आगे उन्होंने कहा कि पेशे से किसान पिता और गृहिणी मां ने हमेशा उन्हें खेलने के लिए प्रोत्साहित किया जिससे वह 2019 से हॉकी खेल रही हैं और इस खेल में अपनी संभावनाएं तलाश कर रही हैं।
12 वर्षीय रानी कुमारी को भी हॉकी खेलने के लिए अपने गांव में लोगों से ताने सुनने पड़े। पूर्णिया के कसबा प्रखंड के भभरा गांव निवासी रानी को शॉट्स में हॉकी खेलने पर आस-पड़ोस वालों ने निशाना बनाया लेकिन उनके माता पिता के समर्थन ने उन्हें पूर्णिया से निकल कर राजगीर में हॉकी खेलने का अवसर दिया।
“गांव वाले बोलते हैं कि इतनी छोटी उम्र से शॉर्ट्स पहनना गलत बात है। पढ़ाई करो, खेलना है तो फ़ुल पहनो और दूसरी लड़कियों की तरह सूट सलवार पहनो, शॉर्ट्स मत पहनो, लेकिन मेरे माता पिता उन सबको बोलते हैं कि मेरी बेटी एक दिन कुछ कर के दिखाएगी तब आपको समझ में आएगा,” अंडर 14 खिलाड़ी रानी कुमारी बोली।
रानी ने आगे कहा, “मैं अपने गांव और प्रखंड में अकेली लड़की हूँ जो इस स्तर पर खेल रही है। मैं चाहती हूँ कि बिहार को गोल्ड मेडल जिताऊं और सबसे अधिक गोल मैं करूँ। जो माता-पिता बच्चों को खेलने नहीं देते उनको बोलूंगी कि लड़कियां भी बहुत कुछ कर सकती हैं। उनको खेलने दें और साथ साथ पढ़ाई भी कराएं।”
मिट्टी से एस्ट्रो टर्फ का सफर
पूर्णिया एकलव्य केंद्र से राजगीर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स आना इन खिलाड़ियों के लिए एक बहुत बड़ा बदलाव था। उनके अनुसार, इससे उनके खेल में काफी सुधार आया है। उनका मानना है कि अगर राजगीर में हॉकी एशिया कप जैसी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताएं होती रहीं, तो राज्य के कई खिलाड़ी भारतीय टीम में खेलते नज़र आएंगे।
“पूर्णिया में हमलोग मिट्टी पर खेलते थे, लेकिन जब किसी बड़ी प्रतियोगिता में जाते थे तो टर्फ में खेलना पड़ता था इसलिए उतना अच्छा प्रदर्शन नहीं हो पाता था। यहां आकर मेरे गेम में बहुत सुधार आया है। 2025 में रांची में एक सब जूनियर प्रतियोगिता में हमने अच्छा खेला। वहां मैंने तीन स्कोर किया था। टीम क्वार्टर फाइनल तक गई थी,” अंडर 19 खिलाड़ी पुष्पांजलि कहती हैं।
उन्होंने आगे कहा, “जब हम हॉकी शुरू किये तो हमलोग टूटे हुए स्टिक से खेलते थे। तब हमारे पास एक ही दो बॉल रहते थे, उसी से हम सब प्रैक्टिस करते थे। जूते भी अच्छे नहीं थे, तब घर वाले भी उतना समर्थन नहीं करते थे कि ‘तुम लड़की हो तो हॉकी नहीं खेल सकती’, फिर पापा को मनाया तो पापा ने कहा – ठीक है तुम खेल सकती हो।”
वहीं, अंडर-14 खिलाड़ी रानी कुमारी ने बताया कि पूर्णिया के एकलव्य केंद्र में खेलने की पर्याप्त सुविधा नहीं थी। वहां उनकी कोच रानू अपने पैसे से बच्चियों के लिए हॉकी स्टिक और जूते आदि लाकर देती थीं। रानी राजगीर में एस्ट्रो टर्फ पर खेलना अपने लिए एक बड़ी उपलब्धि मानती हैं।
रानी ने इसी वर्ष मध्यप्रदेश में हुए एक राष्ट्रीय स्तर के टूर्नामेंट में बिहार अंडर-14 टीम का प्रतिनिधित्व किया और अब वह आगे की तैयारी में जुट गई हैं।
पूर्णिया की शाहीना परवीन ने 2023 में पूर्णिया के एकलव्य केंद्र में खेलना शुरू किया। यह अंडर-17 खिलाड़ी भारतीय हॉकी स्टार रानी रामपाल जैसी बड़ी खिलाड़ी बनना चाहती हैं।
“जब हम यहां आए थे, तो सोचे नहीं थे कि हमलोग के रूम में एसी लगी होगी। पूर्णिया में रहते थे, तो खुद से झाड़ू पोछा करते थे। यहां वो भी नहीं करना पड़ता है, सारी सुविधा है। दो दो टर्फ भी मिला यहां, बहुत अच्छा लगा हमलोग को,” शाहीन बोलीं।
वह आगे कहती हैं, “बिहार में अब तक हॉकी में मेडल नहीं आया है, हम सोचते हैं कि मेडल लाएं और फिर इंडियन टीम में खेलें। मैं दिखाना चाहती हूँ कि हॉकी खेलकर मैं कुछ बड़ा कर सकती हूँ।”
वहीं, सुरभि रानी का सपना है कि वह भारत के लिए एक दिन मेडल लाएं। फिलहाल वह बिहार अंडर-17 दल का हिस्सा हैं और कुछ महीने पहले झारखण्ड में सब जूनियर प्रतियोगिता में खेली थीं, जिसमें बिहार की टीम क्वार्टर फाइनल तक पहुंची।
पूर्णिया और राजगीर में खेलने के अलग अलग अनुभव के बारे में वह कहती हैं, “वहाँ (पूर्णिया में) खेलते थे, तो हमलोग का ग्राउंड घेरा हुआ नहीं था। इससे बहुत डिस्टर्ब होता था। यहां आने के बाद प्रदर्शन बेहतर हुआ है, राष्ट्रीय स्तर पर भी अच्छा खेल रहे हैं अब।”
खेल के साथ पढ़ाई की चुनौती
राजगीर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में 22 लड़कियां पूर्णिया के एकलव्य केंद्र से आई हैं। कॉम्प्लेक्स में कुल मिलाकर 38 महिला हॉकी खिलाड़ी रह रही हैं, जिनमें कुछ पटना एकलव्य केंद्र की खिलाड़ी भी शामिल हैं। ये खिलाड़ी खेल के साथ-साथ पढ़ाई के लिए भी समय निकालती हैं।
पूर्णिया की शाहीना परवीन दसवीं की छात्रा हैं। उनका दाखिला पूर्णिया के एक स्कूल में है, लेकिन वह राजगीर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स के हॉस्टल में रहकर बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रही हैं। शाहीना ने बताया कि कॉम्प्लेक्स में सुबह 5 बजे से अभ्यास शुरू हो जाता है। शाम को भी दो घंटे अभ्यास चलता है। इन सबके बीच वह रोज़ कुछ घंटे अपनी पढ़ाई को देती हैं।
वहीं, छठी कक्षा की छात्रा रानी कुमारी का दाखिला राजगीर के ही एक निजी स्कूल में है। वह सुबह 4 बजे उठकर पढ़ाई करती हैं और फिर अपना किट लेकर मैदान में अभ्यास के लिए दौड़ पड़ती हैं।
वे सपने जो टूट गए
युवा महिला हॉकी खिलाड़ियों के प्रशिक्षण के लिए बने पूर्णिया एकलव्य केंद्र को 1 जनवरी 2025 को राजगीर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में शिफ्ट कर दिया गया। कई खिलाड़ी वहां चली गईं, लेकिन कुछ को परिवार की मंज़ूरी न मिलने पर हॉकी खेलने का सपना छोड़ना पड़ा।
इस पर पूर्णिया एकलव्य केंद्र की प्रशिक्षक ने ‘मैं मीडिया’ से कहा, “कुछ लड़कियां गईं हैं, कुछ ने छोड़ भी दिया है। वहाँ स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स हम उन्हें लेकर गए थे, वहां सबकुछ अच्छा है, एस्ट्रो टर्फ भी लगा हुआ है। अधिकतर लड़कियां वहीं हैं। कुछ के घर वाले नहीं माने तो वह नहीं जा सकीं। हमारे पास किशनगंज, अररिया, खगड़िया, कटिहार और पूर्णिया की लड़कियां थीं।”
रानू 2013 से पूर्णिया एकलव्य सेंटर से जुड़ी थीं, लेकिन जनवरी 2025 में उनका ट्रांसफर राजगीर हुआ तो वह वहां नहीं जा सकीं। उनका मानना है कि इस निर्णय से कई लड़कियों के खेल में सकारात्मक बदलाव आया, लेकिन कोसी-सीमांचल की कई प्रतिभाएं राजगीर नहीं जा सकीं। एकलव्य सेंटर की कई खिलाड़ी नौकरी भी पा चुकी हैं, लेकिन राजगीर शिफ्ट होने से पीछे छूट चुकी दर्जनों काबिल खिलाड़ियों के सपने टूट गए।
वर्तमान भारतीय महिला हॉकी टीम में बिहार से कोई खिलाड़ी नहीं है। हालांकि, टीम के कोच हरेंद्र सिंह का ताल्लुक बिहार के छपरा जिले से है, लेकिन वहां सुविधाओं की कमी के कारण उन्होंने अपनी हॉकी दिल्ली से ही शुरू की और बाद में मुंबई में भी खेले।
राजगीर में पिछले 11 महीनों में अंतरराष्ट्रीय हॉकी के दो बड़े टूर्नामेंट हुए। इन आयोजनों से बिहार के युवा खिलाड़ियों में कितना सुधार होता है, यह समय बताएगा। साथ ही यह देखना भी दिलचस्प होगा कि इससे भारतीय टीम में बिहार की भागीदारी बढ़ती है या नहीं।
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