दुनियाभर में मखाना को सुपरफूड के रूप में पहचान मिल रही है। पूरी दुनिया में होने वाले मखाना उत्पादन का 80 प्रतिशत से अधिक उत्पादन भारत में होता है। बिहार आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार, वर्ष 2023-24 में राज्य में 27.8 हजार हेक्टेयर भूमि पर मखाना की खेती हुई, जिससे कुल 56.4 हजार टन मखाना का उत्पादन हुआ। यह भारत के कुल मखाना उत्पादन का 85 प्रतिशत है। बिहार के मधुबनी, दरभंगा, सीतामढ़ी, सहरसा, कटिहार, पूर्णिया, सुपौल, किशनगंज और अररिया ज़िले मखाना उत्पादन के प्रमुख केंद्र हैं।
मखाना की खेती और प्रोसेसिंग एक बेहद मेहनत और समय लेने वाली प्रक्रिया है, जिसमें बीजों को हाथों से इकट्ठा करना, सुखाना, भूनना, फोड़ना, भंडारण और ग्रेडिंग जैसे कई चरण शामिल हैं। लेकिन जलवायु संकट के बढ़ते असर के कारण मखाना की खेती से लेकर उसकी प्रोसेसिंग तक, हर स्तर पर नई चुनौतियाँ खड़ी हो रही हैं।
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पूर्णिया के किसान प्रमोद महलदार 15 साल से मखाना की खेती कर रहे हैं। प्रमोद मल्लाह समुदाय से आते हैं। इस समुदाय को मखाना की खेती में महारत हासिल है। अपने पांच भाइयों के साथ मिलकर उन्होंने पहले 10 बीघा खेत में मखाना लगाया था। समय के साथ उसे बढ़ा कर 70 बीघा तक ले गए। लेकिन, अब पिछले कुछ सालों में उन्होंने इसे घटा कर 50 बीघा कर लिया है।
बदलते मौसम
मखाना की खेती की प्रक्रिया दिसंबर-जनवरी के ठंड में शुरू होती है। जनवरी में अंकुरण आना शुरू होता है। दो महीने खेत में रखने के बाद फसल रोपने के लिए तैयार हो जाती है। फ़रवरी-मार्च में पौधे रोपने लायक हो जाते हैं। अप्रैल में गर्मी बढ़ने के साथ-साथ पछुआ हवा चलती है। उसी समय मखाना का फूल आने लगता है। जुलाई से अक्टूबर तक पैदावार को पानी से निकालने का काम चलता है। इसी दौरान मखाना की प्रोसेसिंग भी शुरू हो जाती है, जो दिसंबर तक चलती रहती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, मखाना की सही ढंग से वृद्धि और विकास के लिए 20–35°C तक की अनुकूल हवा का तापमान, 50–90% तक की ह्यूमिडिटी और 1,000–2,500 mm तक की वार्षिक वर्षा आवश्यक होती है। लेकिन बिहार में तापमान में काफी वृद्धि दर्ज की गई है, जो अक्सर 40-42°C तक पहुँच जाता है, जबकि ह्यूमिडिटी घटकर 40–45% तक रह गई है। बीते कुछ दशकों में औसत वार्षिक वर्षा भी घटकर 800 mm तक रह गई है। इसके अलावा, वर्षा के पैटर्न में भी बदलाव आया है — पहले यह चार महीनों में समान रूप से वितरित होती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है।
विशेषज्ञों की चेतावनी
हाल ही में ASAR और Regenerative Bihar ने मिलकर Climate Change and Makhana Farmers of Bihar नाम से एक अध्ययन जारी किया है। अध्ययन रिपोर्ट शोधकर्ता इस्तियाक अहमद और मुन्ना कुमार झा द्वारा तैयार की गई है। मखाना की खेती तालाबों और नीचले खेतों में होती है। इस्तियाक ने अपने रिसर्च में पाया है कि जलवायु परिवर्तन का ज़्यादा असर निचले खेतों के मखाना पर पड़ रहा है।
मई 2025 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय (Lalit Narayan Mithila University) के शोधकर्ताओं ने पाया कि बिहार में वार्षिक और मौसमी वर्षा वितरण में उतार-चढ़ाव तो है, लेकिन कुल मिलाकर वर्षा में गिरावट का रुझान दिखाई दे रहा है, विशेष रूप से पूर्वी बिहार में। अध्ययन में यह भी पाया गया कि मॉनसून के दौरान होने वाली वर्षा में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है।
किसान बताते हैं कि आजकल मानसून के आगमन से पहले अप्रैल में तेज़ बारिश हो जाती है। जिससे मखाना के फूल सड़ने लगते हैं। बारिश के तुरंत बाद होने वाली तेज़ धूप उस नुकसान को और बढ़ा देती है। जुलाई के बाद किसान मानसून की आस में रहते हैं, जिससे फसल को खेत से उठाने में आसानी हो। मखाना को खेत से छांक कर उठाने के लिए कम से कम एक फ़ीट पानी चाहिए। मानसून में बारिश की कमी की वजह से प्रमोद अपने खेतों में मोटर से पानी डलवा रहे हैं। पानी की कमी न सिर्फ मखाना की गुणवत्ता में कमी आती है, बल्कि उपज भी कम हो जाता है।
बदलते मौसम की स्थिति कीट और रोगों के पनपने के लिए अनुकूल होती जा रही है, जिससे इनका प्रकोप बढ़ रहा है। दूसरी ओर, सतही जल स्रोतों में अत्यधिक कृषि रसायनों और सूक्ष्मजीवों की मिलावट के कारण जल का अम्लीकरण बढ़ रहा है। अत्यधिक गर्मी और सूखे मौसम के कारण वाष्पीकरण में भी वृद्धि हो रही है, जो जल में घुले ऑक्सीजन की मात्रा में गिरावट और तेजी से अम्लीकरण की एक प्रमुख वजह बन रही है।
मज़दूरों की परेशानियाँ
जलवायु परिवर्तन जहाँ मखानों किसानों के फसल को नुक्सान पहुंचा रहा है, वहीं मखाना मज़दूर के स्वास्थ्य पर इसका सीधा प्रभाव पड़ता है। शिवानंद महतो साल में तीन-चार महीने मखाना की फसल निकालने का काम करते हैं। ये काम जुलाई से शुरू हो कर अक्टूबर तक चलता है। रोज़ाना पांच घंटे चिलचिलाती धूप के बीच पानी में खड़े होकर मज़दूर मखाना की फसल को निकालते हैं और उसे छांक कर इकट्ठा करते हैं। बारिश की कमी की वजह से मोटर से ग्राउंडवाटर खेत में डाला जाता है, इस वजह उन्हें कुछ हद तक राहत मिलती है।
बढ़ती गर्मी का सीधा असर मखाना प्रोसेसिंग में लगे मज़दूरों पर भी साफ़ देखा जा सकता है। मल्लाह समुदाय से आने वाले ये मज़दूर अक्सर पूरे परिवार के साथ हर साल छह महीने तक इस काम में जुटे रहते हैं। ‘लावा फोड़ी’ का यह कठिन और श्रमसाध्य काम जुलाई से दिसंबर तक चलता है। रोज़ाना इन्हें करीब 16 घंटे काम करना पड़ता है।
मखाना बीजों को पहले लगभग 250°C तापमान पर भूना जाता है। इसके बाद, मज़दूर इन गर्म बीजों को अपनी हथेलियों पर उछालते हैं और फिर जब ये बीज अब भी गर्म होते हैं, तब उन्हें लकड़ी के हथौड़े से लकड़ी के पटरे पर तोड़ा जाता है। इसी प्रक्रिया से मखाना ‘पॉप’ होकर तैयार होता है।
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