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बिहार की खेती पर जलवायु परिवर्तन की मार, अररिया से ग्राउंड रिपोर्ट

अररिया जिले में अनियमित बारिश और बढ़ते तापमान ने किसानों की नींद उड़ा दी है। धान की खेती में दाने कम बन रहे हैं और मखाना उत्पादन भी घटा है, जबकि लागत लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन से खेती की उत्पादकता और मिट्टी की गुणवत्ता दोनों पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।

ved prakash Reported By Ved Prakash |
Published On :
climate change impacts agriculture in bihar

बिहार के अररिया जिले में अनियमित वर्षा और बढ़ते तापमान से फसल चक्र गड़बड़ा गया है। देर से रोपनी के कारण किसानों को मोटर से पानी पटाना पड़ रहा है, जबकि अधिक तापमान से धान में दाने कम बन रहे हैं।


बारिश की अनिश्चितता और बढ़ते तापमान ने किसानों की नींद उड़ा दी है। कभी ज्यादा बारिश नुकसान पहुंचाती है तो कभी वर्षा न होने से पौधे सिकुड़ जाते हैं और किसानों को अधिक पटवन करना पड़ता है।

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धान और मखाना किसान

फॉरबिसगंज प्रखंड स्थित औराही पश्चिम के किसान पिनाकी रंजन बताते हैं कि पहले की तुलना में उत्पादन आधे से भी कम रह गया है, जिससे किसानों की आजीविका पर संकट गहराता जा रहा है।


बिहार सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 2024 में राज्य के 27 जिलों में बाढ़ से कुल 2,29,000 हेक्टेयर फसलें तबाह हुईं, जिससे 3,061.9 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। सिर्फ अररिया जिले में 200 हेक्टेयर फसल और 42.33 लाख रुपये का नुकसान दर्ज किया गया।

धान की खेती में पानी और मेहनत ज्यादा लगती है। मोहम्मद हारिस बताते हैं कि 15-20 साल पहले समय पर बारिश से अच्छी उपज और मुनाफा होता था, लेकिन अब जलवायु परिवर्तन के कारण पानी की कमी और अनियमित वर्षा ने पारंपरिक धान की खेती करना और मुश्किल कर दिया है।

मखाना को जलवायु परिवर्तन के प्रति अपेक्षाकृत लचीला माना जाता है, क्योंकि इसे तालाबों और स्थिर जल स्रोतों में उगाया जाता है। हालांकि, पिछले कुछ सालों में अनियमित मानसून और लंबी गर्मी ने तालाबों का संतुलन बिगाड़ दिया है।

फॉरबिसगंज प्रखंड की बोकड़ा पंचायत वार्ड 1 निवासी तौहीद आलम 30 साल से मखाना की खेती कर रहे हैं। उनका कहना है कि पिछले 10 सालों में जलवायु परिवर्तन और बे-मौसम बारिश से उत्पादन घटा है, जबकि खर्च बढ़ गया है जिससे बाजार में सही दाम नहीं मिल पा रहा। महंगाई बढ़ने के बावजूद मखाने के भाव में गिरावट है।

किसान रामनारायण विश्वास बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन से खेती काफी प्रभावित हुई है। पशुपालन घटने से प्राकृतिक खाद की उपलब्धता कम हुई है और किसान काफी हद तक रासायनिक खाद पर निर्भर हो गए हैं। इसका बुरा असर जमीन की गुणवत्ता और लोगों की सेहत पर पड़ रहा है।

अररिया कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. विनोद कुमार ने बताया कि बाढ़, सुखाड़, प्रदूषण और अनियंत्रित कीटनाशक छिड़काव जैसे कारणों से जलवायु परिवर्तन का असर खेती पर देखा जा रहा है। वैज्ञानिकों के सामने फसल उत्पादकता बनाए रखने की बड़ी चुनौती है, जिसके लिए नए-नए प्रभेद विकसित किए जा रहे हैं।

केंचुए खत्म हो रहे हैं

धान की सीधी बुआई के दौरान तापमान में उतार-चढ़ाव से धान के फूलने की प्रक्रिया प्रभावित हुई है। ज्यादा गर्मी में धान अचानक फूट सकता है, इसलिए किसानों को सतर्क रहकर दवा का छिड़काव करना चाहिए।

काशीपुर निवासी आफाक आलम का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण खेतों में पक्षियों की संख्या घट गई है, जिससे कीड़े बढ़ गए हैं और कीटनाशक का इस्तेमाल ज्यादा करना पड़ रहा है। यही कारण है कि मिट्टी को उपजाऊ बनाने वाले केंचुए भी धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं, जो खेती के लिए बहुत उपयोगी होते हैं।

कृषि वैज्ञानिक डॉ विनोद मानते हैं कि खेतों में पक्षीऔर मधुमक्खियों की संख्या घटी है। मोबाइल टावर की तरंगें और कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग इन जीवों के लिए नुकसानदायक साबित हो रहे हैं।

(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)

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अररिया में जन्मे वेद प्रकाश ने सर्वप्रथम दैनिक हिंदुस्तान कार्यालय में 2008 में फोटो भेजने का काम किया हालांकि उस वक्त पत्रकारिता से नहीं जुड़े थे। 2016 में डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में कदम रखा। सीमांचल में आने वाली बाढ़ की समस्या को लेकर मुखर रहे हैं।

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