शायद आपको यकीन न हो, पर बिहार के गांवों की हवा अब दिल्ली जैसी ज़हरीली हो चली है। एक नए अध्ययन में पाया गया है कि मानसून के बाद और सर्दियों के महीनों में बिहार के पांच प्रमुख क्षेत्रों—जिन्हें ‘एयरशेड’ कहा जाता है—वहाँ वायु प्रदूषण का स्तर राष्ट्रीय मानकों से दो से तीन गुना अधिक है।
रिपोर्ट चेतावनी देती है कि साल के इन महीनों में करीब 90 प्रतिशत दिनों में ग्रामीण बिहार के लोग ऐसी हवा में सांस लेते हैं जो उनकी सेहत के लिए खतरनाक है। ‘एयरशेड’ दरअसल वह इलाका होता है जहाँ स्थानीय मौसम और ज़मीन की बनावट की वजह से प्रदूषण फंस जाता है और बाहर निकल नहीं पाता।
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यह नया अध्ययन भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर के प्रोफेसर सच्चिदानंद त्रिपाठी ने ‘अमृत’ (AMRIT—Ambient air quality Monitoring over Rural areas using Indigenous Technology) प्रोजेक्ट के तहत किया है। इस प्रोजेक्ट का मकसद ग्रामीण इलाकों की हवा की गुणवत्ता की जांच करना है।
इस अध्ययन के तहत बिहार के सभी 38 जिलों के हर ब्लॉक में 538 छोटे और सस्ते सेंसर लगाए गए। यह वायु गुणवत्ता की निगरानी के लिए सबसे बड़े सेंसर नेटवर्क में से एक है। राज्य में पांच वायु विभाजकों को सीमांकित करने के लिए डेटा-संचालित मशीन-लर्निंग तकनीकों का उपयोग किया गया और पीएम2.5 के स्तर को दर्ज किया गया। आंकड़ों की जांच से पता चला कि राज्य के उत्तर-पश्चिमी हिस्से (मानचित्र में संख्या 1) में प्रदूषण का स्तर सबसे ज़्यादा है। यह शोध नवंबर 2025 में एनवायरनमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी जर्नल में प्रकाशित किया गया।
अभी तक प्रदूषण मापने की मशीनें और योजनाएं सिर्फ शहरों तक सीमित रही हैं, इसलिए गांवों में रहने वाले करोड़ों लोगों की सेहत पर क्या असर पड़ रहा है, इसका कोई हिसाब नहीं था। इस नए अध्ययन के मुताबिक ग्रामीण बिहार में प्रदूषण की मुख्य वजहें हैं: खाना पकाने के लिए लकड़ी और गोबर के उपलों का इस्तेमाल; उत्तर-पश्चिम भारत से बहकर आने वाली प्रदूषित हवा; और ईंट-भट्ठों से निकलने वाला धुआँ।
बिहार सिंधु-गंगा के मैदानी इलाके (Indo-Gangetic Plains) में स्थित है जिसे भारत की ‘ईंट बेल्ट’ (Brick Belt) कहा जाता है। एक अनुमान के मुताबिक इस इलाके में में 47,000 से भी ज़्यादा ईंट के भट्ठे हैं। साल 2023 के अध्ययन के मुताबिक इस पूरे क्षेत्र में होने वाले वायु प्रदूषण में 8 से 14 प्रतिशत तक का हिस्सा अकेले ईंट बनाने के काम का है।
उत्तर प्रदेश के बाद भारत में बिहार ईंटों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, जहाँ करीब 6,800 भट्ठों में हर साल 19 से 20 अरब ईंटें बनती हैं। ये भट्ठे कोयले से चलते हैं, जिससे हवा में भारी मात्रा में धुआं और ग्रीन हाउस गैस घुलती हैं। बिजली घरों के बाद ईंट भट्ठे ही राज्य में सबसे ज्यादा कोयले की खपत करते हैं, और साथ ही ये उपजाऊ मिट्टी और भूजल का भी भारी नुकसान पहुंचाते हैं।
ईंट बनाने का जो पारंपरिक तरीका है, उसमें न केवल बहुत ज़्यादा मेहनत लगती है, बल्कि यह बहुत प्रदूषण भी फैलाता है और इसमें ईंधन (कोयले) की भारी बर्बादी होती है। इसमें सबसे पहले मिट्टी तैयार की जाती है, फिर हाथों से ईंटें ढाली जाती हैं, जिन्हें धूप में सुखाने के बाद भट्ठों में पकाया जाता है। इस तकनीक को आमतौर पर ‘फिक्स्ड चिमनी बुल ट्रेंच किल्न’ (FCBTK) के नाम से जाना जाता है।
ईंट पकाने के इन पुराने तरीकों के खतरों को देखते हुए, साल 2016 में बिहार सरकार ने भट्ठा मालिकों को निर्देश दिया कि वे प्रदूषण घटाने के लिए पर्यावरण के अनुकूल ‘ज़िग-ज़ैग’ डिज़ाइन अपनाएं। साल 2018 में, पटना हाई कोर्ट ने सभी ईंट उद्योगों में ज़िग-ज़ैग तकनीक को लागू करने का आदेश दिया, और फिर 22 फरवरी 2022 को केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने एक सूचना जारी की कि अब पूरे देश के भट्ठों में इस बेहतर और साफ-सुथरी तकनीक का इस्तेमाल किया जाए।
इस तकनीक में कच्ची ईंटों को एक खास टेढ़े-मेढ़े यानी ज़िग-ज़ैग तरीके से एक के ऊपर एक रखा जाता है (चित्र देखें)। जब इन ईंटों को पकाया जाता है, तो गर्म हवा का बहाव भी इसी ज़िग-ज़ैग रास्ते से होता है, जिससे हवा ईंटों के संपर्क में ज़्यादा समय तक रहती है और गर्मी का फैलाव बेहतर तरीके से होता है। इसका फायदा यह होता है कि ईंधन (कोयला) अच्छी तरह से जलता है, धुआं कम और साफ़ निकलता है, और आखिर में ईंटों की क्वालिटी भी बढ़िया हो जाती है।

इस साफ़-सुथरी ज़िग-ज़ैग तकनीक को अपनाकर भट्ठा मालिक न सिर्फ प्रदूषण कम कर सकते हैं, बल्कि वे कोयले की खपत में भी 20 प्रतिशत तक की बचत कर सकते हैं। इसके अलावा, इससे करीब 90 प्रतिशत तक ‘क्लास ए’ (सबसे अच्छी श्रेणी) की ईंटें तैयार होती हैं, जो बाज़ार में ऊंचे दामों पर बिकती हैं।
मोंगाबे इंडिया (Mongabay India) की एक रिपोर्ट के अनुसार, बिहार के 60 प्रतिशत ईंट भट्ठों ने पहले ही कम प्रदूषण फैलाने वाले डिज़ाइन को अपना लिया था। आज के समय में, राज्य के लगभग 82-85 प्रतिशत भट्ठे ज़िग-ज़ैग तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं।
इसके बावजूद, ग्रामीण बिहार में ईंट भट्ठों से निकलने वाला धुआं अब भी लोगों की सेहत पर बुरा असर डाल रहा है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), नई दिल्ली की प्रोफेसर संगीता बंसल और पारुल जैन के एक अध्ययन (‘हेल्थ इंप्लिकेशन्स ऑफ एयर पॉल्यूशन: एविडेंस फ्रॉम द ब्रिक सेक्टर’) में बिहार के भट्ठों से होने वाले प्रदूषण और 15-49 साल के पुरुषों और महिलाओं की सेहत पर इसके असर का आकलन किया गया है। इस अध्ययन में यह बात सामने आई है कि ईंट-भट्ठों से होने वाले वायु प्रदूषण और स्थानीय लोगों में एनीमिया (खून की कमी) के बीच एक गहरा संबंध है।
46,000 से ज़्यादा लोगों पर किए गए स्वास्थ्य सर्वे के ज़रिए शोधकर्ताओं ने यह पाया कि भट्ठों के करीब रहने वाले लोगों में एनीमिया (खून की कमी) होने का खतरा बहुत ज़्यादा है। इसकी वजह हवा में मौजूद धूल के बेहद बारीक कण (PM2.5 और PM10) हैं, जिनसे शरीर के अंदर लंबे समय तक सूजन बनी रहती है।
अध्ययन से पता चला कि जिन इलाकों में बहुत सारे भट्ठे मौजूद हैं, वहाँ 5 से 7 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले लोगों में एनीमिया होने की संभावना काफी बढ़ गई है। अगर 15 किलोमीटर के दायरे में 100 से ज़्यादा भट्ठे हों, तो एनीमिया होने का खतरा उन इलाकों की तुलना में 6.8 प्रतिशत तक बढ़ जाता है जहाँ एक भी भट्ठा नहीं है। इससे यह साफ़ होता है कि जब कई सारे प्रदूषण फैलाने वाले साधन एक साथ मिल जाते हैं, तो वे सेहत के लिए एक ‘खतरनाक केंद्र’ (hotspot) बना देते हैं।
भारतीय ईंट उद्योग
चीन के बाद भारत दुनिया में ईंटों का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। यहाँ 1 लाख से भी ज़्यादा ईंट-भट्ठे चल रहे हैं, जो हर साल लगभग 140 अरब ईंटें तैयार करते हैं। भारत में ईंटों के कुल उत्पादन का करीब 65 प्रतिशत हिस्सा उत्तर भारत के गंगा के मैदानी इलाकों (IGP) से ही आता है। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल इस क्षेत्र के सबसे बड़े उत्पादक राज्य हैं। ईंट-भट्ठे हर साल करीब 80 लाख मज़दूरों को रोज़गार देते हैं। भारत सरकार ईंट भट्ठों को ऐसी तकनीकों की ओर ले जाने की कोशिश कर रही है जो आधुनिक हों और जिनसे प्रदूषण कम हो। इसमें ‘ज़िग-ज़ैग’ तकनीक, वर्टिकल शाफ्ट, या ईंधन के रूप में ‘पाइप्ड नेचुरल गैस’ (PNG) के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके अलावा, सरकार ने भट्ठों की चिमनी से निकलने वाले धुएं (पार्टिकुलेट मैटर) के लिए 250 mg/Nm3 का एक मानक भी तय कर दिया है।
यह कहानी सबसे पहले चिंतन की ‘ऑन एयर’ में प्रकाशित हुई जो भारत की एकमात्र वायु गुणवत्ता संबंधी वेब पत्रिका है। मूल कहानी यहां पढ़ें।
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