शराबबंदी कानून से जुड़े अधिकांश मामलों में शराब पीने के आरोप इस आधार पर तय किये जाते हैं कि ब्रेद एनालाइजर रिपोर्ट में शराब की पुष्टि हुई है कि नहीं। लेकिन, पटना हाईकोर्ट के एक ताजा आदेश के बाद अब शराब पीने का आरोप साबित करने के लिए यूरिन टेस्ट या खून की जांच रिपोर्ट पेश करनी होगी।
साल 2024 के शराब से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए पटना हाईकोर्ट ने कहा कि केवल ब्रेद एनालाइजर रिपोर्ट पर्याप्त नहीं है और यूरिन रिपोर्ट या ब्लड टेस्ट की रिपोर्ट भी देनी होगी।
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मामला सारण जिले के चेतन छपरा गांव के निवासी नरेंद्र कुमार राम से जुड़ा हुआ है, जो एक सरकारी कर्मचारी हैं और घटना के दौरान किशनगंज में कार्यरत थे।
घटना के मुताबिक, 2 मई 2024 को नरेंद्र कुमार राम को उनके किशनगंज स्थित अस्थाई निवास से गिरफ्तार किया गया था। एक्साइज विभाग की टीम ने उनके आवास पर दस्तक दी थी और ब्रेद एनालाइजर से टेस्ट कर उनके खिलाफ शराबबंदी कानून की धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की थी। फिलहाल, मामला अतिरिक्त जिला व सत्र जज – IV (किशनगंज) की अदालत में लंबित है।
एफआईआर दर्ज होने के बाद उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई भी की गई थी। उन्होंने इस कार्रवाई के खिलाफ पटना हाईकोर्ट में क्रिमिनल रीट दायर कर एफआईआर रद्द करने की अपील की थी।
नरेंद्र कुमार राम के वकील ने अदालत को बताया, “पूरी कार्रवाई सिर्फ ब्रेद एनालाइजर रिपोर्ट पर आधारित है, जो शराब के सेवन के लिए निर्णायक सबूत नहीं हो सकती है। कानून में ब्लड टेस्ट या यूरिन टेस्ट अनिवार्य है, लेकिन ये जांच नहीं कराई गई।”
वकील ने कोर्ट के सामने ये जानकारी भी दी कि एफआईआर दर्ज होने से तीन हफ्ते पहले उनके मुवक्किल ने पेट में संक्रमण के इलाज के लिए एक होम्योपैथी चिकित्सालय का दौरा किया था, जहां उन्हें होम्योपैथी दवाइयां दी गई थीं, जिनमें अल्कोहल आधारित तरल पदार्थ था।
पुलिस की रिपोर्ट के मुताबिक, उनके शरीर में अल्कोहल की मात्रा 41 मिलीग्राम/100 मिलीलीटर पाई गई थी। इस पर वकील ने कहा कि अल्कोहल आधारित होम्योपैथी दवाई का सेवन करने से ब्रेद एनालाइजर में ये मात्रा पाई गई होगी क्योंकि शराब के सेवन की पुष्टि करने के लिए अन्य किसी भी तरह की जांच नहीं की गई।
इस दलील पर सरकार की तरफ से पैरवी करने वाले वकील ने कहा कि उन्हें उनके घर पर नशे की हालत में पाया गया था और ब्रेद एनालाइजर ने उनके शरीर में 41 मिलीग्राम/100 मिलीलीटर शराब के सेवन की पुष्टि की। उन्होंने एक्साइज विभाग की कार्रवाई को सही बताते हुए आरोपी के दावों को आधारहीन बताया।
जस्टिस ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का दिया हवाला
पटना हाईकोर्ट के जस्टिस बिबेक चौधरी ने कहा कि सभी पक्षों को सुनने और उपलब्ध साक्ष्यों को देखने का बाद यह कहने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है कि अथॉरिटी, सुप्रीम कोर्ट के उस कथन को ध्यान में रखने में पूरी तरह विफल रहा, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ब्रेद एनालाइजर रिपोर्ट शराब के सेवन की पुष्टि की निर्णायक रिपोर्ट नहीं हो सकती है। कोर्ट ने आगे कहा, “उपरोक्त वजहों से बिहार मद्यनिषेध व एक्साइज एक्ट, 2016 की धारा 37 के तहत दर्ज एफआईआर (एफआईआर नंबर 559/2024) को रद्द किया जाता है।”
हालांकि, ऐसा पहली बार नहीं है कि पटना हाईकोर्ट ने इस तरह का आदेश दिया है। पूर्व में भी अदालत, शराब पीने की पुष्टि के लिए सबूत के तौर पर ब्रेद एनालाइजर जांच के अलावा खून की जांच या यूरिन टेस्ट कराने का आदेश दे चुकी है।
पिछले साल 3 दिसम्बर को ऐसे ही एक मामले की सुनवाई करते हुए पटना हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस संदीप कुमार ने भी कहा था कि ब्रेद एनालाइजर रिपोर्ट, शराब के सेवन का निर्णायक सबूत नहीं होती है।
इस मामले में आरोपी सुपौल जिले का रहने वाला डोमी कमात था, जिसे पुलिस ने 2017 में रात्रि गश्ती के दौरान गिरफ्तार किया था। पुलिस के आरोप के मुताबिक, डोमी कमात के पास से चार बोतल नेपाल निर्मित शराब मिली थी और पुलिस ने ब्रेद एनालाइजर से जांच की थी, तो उसके शरीर में शराब की मौजूदगी पाई गई थी।
आरोपी डोमी कमात के खिलाफ पुलिस ने शराबबंदी कानून की धारा 30 (ए) और 37(ए) के तहत एफआईआर दर्ज की थी। 27 मार्च 2019 को इस मामले की सुनवाई करते हुए अतिरिक्त सत्र जज -II ने डोमी कमात को धारा 30(ए) का दोषी पाते हुए पांच साल की सजा और एक लाख रुपये जुर्माना, वहीं, धारा 37(ए) के तहत 50000 रुपये जुर्माना लगाया था।
इस सजा के खिलाफ उन्होंने पटना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने अतिरिक्त सत्र जज के आदेश को रद्द कर दिया था।
क्या ब्लड या यूरिन टेस्ट करा रही है पुलिस?
उल्लेखनीय हो कि दोनों ही आदेशों में न्यायाधीशों ने सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का हवाला दिया, जो लगभग चार दशक से भी पुराना है। ऐसे में शराबबंदी से जुड़े इस तरह के मामलों में पुलिस को पहले से ही ब्रेद एनालाइजर रिपोर्ट की जगह ब्लड टेस्ट या यूरिन टेस्ट कराना चाहिए, लेकिन अधिकतर मामलों में ऐसा नहीं होता है। एक्साइज अदालतें भी इस तरह के केसों की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ध्यान में नहीं रखती हैं।
गौरतलब हो कि अप्रैल 2016 में राज्य में बिहार मद्यनिषेध और उत्पाद अधिनियम लागू हुआ था। तब से लेकर नवम्बर 2024 तक इस अधिनियम के तहत 7,70,250 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है और इनमें से 4,89,033 लोग फिलहाल जेल में बंद हैं।
इस अधिनियम की धारा 37 में शराब का सेवन करने वालों के लिए कम से कम पांच साल और अधिकतम 10 साल तक के कारावास तक तक प्रावधान था। उस वक्त के अधिनियम की धारा 37 के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति किसी स्थान पर शराब अथवा मादक द्रव्य का उपभोग करता है अथवा किसी स्थान में नशे में अथवा मदहोश अवस्था में पाया जाता है तो दोष सिद्ध होने पर उसे कम के कम पांच साल की सजा हो सकती है, जिसे बढ़ाकर सात साल भी किया जा सकता है और कम से कम एक लाख रुपये जुर्माना लगाया जा सकता है जिसे बढ़ाकर 10 लाख तक भी किया जा सकता है। वहीं, नशे की अवस्था में किसी स्थान पर उपद्रव अथवा हिंसा करता है, तो उसे कम से कम 10 साल की सजा मिल सकती है जिसे बढ़ाकर आजीवन कारावास किया जा सकता है। साथ ही एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है, जिसे बढ़ाकर 10 लाख रुपये तक किया जा सकता है।
वर्ष 2022 में इस धारा में संशोधन कर थोड़ी ढील दी गई। संशोधन के बाद अब अगर कोई व्यक्ति पहली बार शराब या नशीले पदार्थ का सेवन करता है, तो उसे 2000 से 5000 रुपये तक जुर्माना देना होगा या फिर तीन महीने की जेल की सजा होगी। अगर वह दूसरी बार नशे की हालत में पाया जाता है, तो उसे एक साल की जेल और एक लाख रुपये जुर्माना लगाया जाएगा। वहीं, अगर नशे की हालत में व्यक्ति उपद्रव करता है, तो उसे पांच से 10 साल तक की जेल व 5 लाख रुपये तक जुर्माने की सजा होगी।
एक्साइज विभाग के आंकड़े बताते हैं कि शराबबंदी कानून के लागू होने के बाद से लेकर 14 मई 2023 तक शराब पीने के मामले में 2.41 लाख लोगों पर 2000 से 500 रुपये तक का जुर्माना लग चुका है। वहीं, 5242 दोषियों को एक महीने की सजा, 614 लोगों को तीन महीने की सजा/50,000 रुपये जुर्माना व 1352 दोषियों को एक साल से लेकर आजीवन कारावास की सजा हो चुकी है।
शराबबंदी कानून से संबंधित कई मामलों को देख रहे वकील संतोष कुमार ने कहा, “निचली अदालतों में इस नियम का नहीं के बराबर पालन होता है और सिर्फ ब्रेद एनालाइजर की रिपोर्ट के आधार पर लोगों को दोषी करार दे दिया जा रहा है। अगर कोई मामला पटना हाईकोर्ट में पहुंचता है, तभी अदालत ब्रेद एनालाइजर की रिपोर्ट को खारिज करती है और आरोपी को राहत मिलती है।” “ऐसा तब हो रहा है, जब पटना हाईकोर्ट की तरफ से कम से कम तीन मामलों में ये आदेश आ चुका है कि शराब पीने की पुष्टि के लिए सिर्फ ब्रेद एनालाइजर की रिपोर्ट पर्याप्त नहीं है,” संतोष कुमार ने कहा।
शराबबंदी से जुड़े मामलों की पैरवी करने वाले एक अन्य वकील अमरेंद्र कुमार ने भी बताया कि शराब पीने के 99 प्रतिशत मामलों में सबूत के तौर पर सिर्फ ब्रेद एनालाइजर की रिपोर्ट कोर्ट में दी जाती है और इसी के आधार पर सजाएं भी होती हैं।
“जितने भी केस हम देखते हैं, उनमें पहला सवाल हम जांच अधिकारी से यही पूछते हैं कि क्या शराब पीने की पुष्टि के लिए आरोपी की किसी तरह की मेडिकल जांच कराई गई है, तो जांच अधिकारी ना में ही जवाब देते हैं,” उन्होंने कहा।
जांच अधिकारी कई मामलों में ब्रेद एनालाइजर रिपोर्ट ये कहकर कोर्ट में देते हैं कि इंडियन एविडेंस एक्ट, 1872 में इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को मान्य किया गया है। इंडियन एविडेंस एक्ट में साल 2000 में संशोधन कर धारा 65बी जोड़ी गई, जिसमें कहा गया है कि इलेक्ट्रॉनिक सबूत कोर्ट में मान्य होंगे।
अमरेंद्र कुमार कहते हैं, “इसी तरह के एक मामले में मेरे क्लाइंट को एक साल की सजा हो गई है, जबकि पुलिस की तरफ से सिर्फ ब्रेद एनालाइजर रिपोर्ट पेश की गई थी। मैंने कोर्ट में मेडिकल जांच की बात कही, तो कोर्ट ने कहा कि इंडियन एविडेंस एक्ट में इलेक्ट्रॉनिक सबूत मान्य है, इसलिए ब्रेद एनालाइजर रिपोर्ट मान्य होगी।”
उन्होंने आगे कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने बहुत पहले ही अपने आदेश में कहा है कि ब्रेद एनालाइजर रिपोर्ट नाकाफी है और इसके लिए ब्लड रिपोर्ट या यूरिन रिपोर्ट जरूरी है। सभी अदालतों में इसका पालन होना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है और बिना ठोस सबूत के लोगों को सजाएं हो रही हैं।”
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