कोसी तटबंधों के बीच बसे बेलागोठ गांव की रहने वाली सहायक नर्स मिडवाइफ (एएनएम) राधा देवी हाल के वर्षों में स्वास्थ्य लाभ में देरी की वजह से जच्चा और बच्चा दोनों की मौत की 12 घटनाओं की गवाह रही हैं।
वह कहती हैं, “नाव की कमी के कारण मैंने कई गंभीर मामलों में गर्भवती महिलाओं के बच्चों को खोते देखा है। आपातकाल में प्राइवेट नाव मिल भी जाए तो सुपौल सदर अस्पताल पहुँचने में तीन घंटे लग जाते हैं।”
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बाढ़ के दौरान जलस्तर बढ़ने पर या तो नाव मिलने में अतिरिक्त देर होती है। कई बार डीजल से चलने वाली नाव मिल भी जाती है, तो उसका किराया 2000 से 5000 रुपये तक होता है, जो हमारे ग्रामीण दलित समाज के लिए बहुत महंगा है। जलस्तर बढ़ने पर यात्रा करना जोखिम भरा होता है। “इतना जोखिम उठाकर भी समय पर अस्पताल पहुंचने के बाद भर्ती की कोई गारंटी नहीं होती,” उन्होंने कहा।
राधा देवी पिछले 25 साल से बतौर एएनएम काम कर रही हैं। एएनएम का मुख्य काम ग्रामीण स्वास्थ्य, मातृत्व और शिशु स्वास्थ्य में मदद करना है।
बेलागोठ के नवदम्पत्ति ओमप्रकाश और रिंकू देवी ने दो मौकों पर, जब कोसी में पानी का स्तर ऊपर था, तब नाव के अस्पताल पहुंचने में विलम्ब की वजह से अपने दो अजन्मे बच्चों को खो दिया।
22 वर्ष की रिंकू देवी इस आघात को अभी तक नहीं भूल पाई हैं और इस पर बात करने से बचती हैं।
उनके पति ओमप्रकाश, जो मद्रास में एक कम्पनी में काम करते हैं, फ़ोन पर बताते हैं, “एक बार दो साल पहले जब बाढ़ के वक़्त मेरी पत्नी की डिलीवरी जटिल हो गयी थी तो हम जब तक उसको अस्पताल ले जाने के लिए नाव का इंतजाम कर पाये, काफी देर हो चुकी थी। नाव में उसकी डिलीवरी हो गई, लेकिन बच्चा बच नहीं सका।”
नाव में खून ही खून था। उस मंज़र को याद कर ओमप्रकाश अब भी कांप जाते हैं। दूसरी बार रिंकू गर्भवती हुई, तब भी ऐसी ही स्थिति बन गई थी। “सात महीने पहले जब बाढ़ आई थी, मेरी पत्नी की डिलीवरी का टाइम हो गया था। डिलीवरी के लिए ऑपरेशन की आवश्यकता थी और हमें नाव की तुरंत जरूरत थी, लेकिन दोपहर की जगह नाव हमें शाम में मिली थी। तब तक काफी देर हो गई थी और इस बार भी नवजात की गर्भ में ही मौत हो चुकी थी,” ओमप्रकाश ने बताया।
बाढ़ के दिनों में आपातकालीन स्थिति में नाव नहीं मिलना बाढ़ग्रस्त इलाकों में काफी आम है, और ऐसा तब भी होता है जब किसी गर्भवती महिलाओं को पीड़ा उठ जाए या उनका मामला पेंचीदा हो जाए।

कुछ ऐसी ही कहानी सुपौल जिले के खोकनाहा गांव के घूरन मुखिया की पत्नी अनीता देवी (35) के साथ भी ऐसा ही हुआ था। अपनी मृत पत्नी को याद करते हुए बताते हैं, “जब हमारे दूसरे बच्चे के पैदा होने की घड़ी आयी, तब मेरी पत्नी के पेट में सुबह करीब आठ बजे दर्द उठा और गांव की औरतों ने मुझे सतर्क कर दिया कि अब अस्पताल ले जाने का समय आ गया है, पर नाव मिल नहीं रही थी। बाढ़ के पानी की वजह से सब उथल पथल हो रखा था।” जैसे-तैसे तीन बजे तक नाव मिली, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। नाव रास्ते में थी कि अनीता देवी और उसके गर्भ में पल रहे नवजात की मौत हो गई।
“अगर सुबह ही हमें अस्पताल जाने को नाव मिल जाती तो मेरी पत्नी आज ज़िंदा होती,” घूरन मुखिया अफसोस के साथ कहते हैं।
बेलागोठ गांव की रहने वाली फूल कुमारी का कहना है, “गर्भवती होने पर चिकित्सा सुविधा के अभाव के अलावा माहवारी के दिनों में जानकारी के आभाव में दिक्कतें होती हैं, महिलाओं को इन्फेक्शन खतरा रहता है। ये सब हमारे तटबंधी गावों की महिलाओं की रोज़मर्रा की हकीकत है,” फूल कुमारी ने कहा।
बिहार में बाढ़
बिहार का एक बड़ा हिस्सा बाढ़ प्रवण है। आंकड़े बताते हैं कि राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 73 प्रतिशत हिस्सा बाढ़ प्रवण है और लगभग हर साल बाढ़ की विभीषिका झेलता है।
जिलों की बात करें, तो 38 में से 29 जिले बाढ़ प्रवण हैं और इनमें से 15 जिले भीषण बाढ़ के खतरे में हैं।
सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़, पिछले एक दशक में साल 2015 से साल 2024 के बीच बाढ़ से 6.76 करोड़ लोग प्रभावित हुए और 1,752 लोगों की मौत हो गई।
हालांकि, बाढ़ बिहार के लिए कोई नई आपदा नहीं है। दशकों से बिहार बाढ़ की त्रासदी झेल रहा है, लेकिन जानकारों का कहना है कि हाल के समय में जलवायु परिवर्तन के चलते बाढ़ का असर बढ़ा है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की वेबसाइट पर छपा एक लेख प्रचंड बाढ़ को जलवायु परिवर्तन से जोड़ता है। लेख कहता है, “लंबे समय से हो रहे वैश्विक जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम के जो ज़्यादा उग्र पैटर्न बन रहे हैं, उनसे बाढ़ आने की संभावना बढ़ जाती है। जंगलों की कटाई और जलवायु परिवर्तन बाढ़ के जोखिम को बढ़ाते हैं।”
“बहुत ज़्यादा बारिश, लंबे समय तक बारिश होना, बार-बार बारिश होना या इन सभी का मिला-जुला असर, बहुत भयंकर बाढ़ का कारण बन सकता है,” लेख कहता है।
जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के ग्लोबल रिसोर्स इंफॉर्मेशन डेटाबेस के निदेशक पास्कल पेडुज़ी उक्त लेख में कहते हैं, “हालांकि किसी एक बहुत बड़ी घटना और जलवायु परिवर्तन के बीच सीधा संबंध जोड़ना मुश्किल है, लेकिन यह साफ़ है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हमें और भी ज़्यादा भयंकर और बार-बार होने वाली जल-मौसम संबंधी बड़ी घटनाओं का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा।”
मेघ पाइन अभियान के एकलव्य प्रसाद, जो बाढ़ग्रस्त इलाकों में काम करते हैं, ने कहा, “कोसी तटबंध की बाढ़ की घटनाओं की पनपती स्थिति सिर्फ़ स्थानीय मॉनसून पैटर्न नहीं बल्कि अप्रत्याशित व तेज़ी से बदलते नदी तंत्र से जुड़ी है। और इसके पीछे जलवायु परिवर्तन और मानवीय हस्तक्षेप की गहरी भूमिका देखी जा रही है।”

मानक संचार प्रक्रिया कागजों तक सीमित
बाढ़ के चलते तमाम दुश्वारियां आती हैं और इसका सबसे बड़ी भुक्तभोगी महिलाएं होती हैं। उन्हें खास तौर पर स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पाती हैं। गर्भवती महिलाओं को आपातकालीन स्थिति में अस्पताल ले जाना जोखिम भरा होता है। उन्हें आपातकालीन स्थिति में सरकारी स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिल पाती हैं और न ही जरूरत के वक्त सरकारी नावें। विडम्बना तो ये है कि ऐसा तब होता है, जब बाढ़ को लेकर बनी मानक संचार प्रक्रिया में गर्भवती महिलाओं को लेकर विशेष कार्ययोजना बनाने की बात कही गई है।
मानक संचालन प्रक्रिया (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) में गर्भवती महिलाओं की शिनाख्त कर उनके लिए मोबाइल मेडिकल टीम तैयार करनी है, ताकि उनकी बेहतर देखभाल की जा सके।
मानक संचार प्रक्रिया कहती है, “आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से ग्राम स्तर पर गर्भवती महिलाओं तथा धातृ माताओं की पहचान की जाएगी और इसकी सूची बाल विकास परियोजना पदाधिकारी के स्तर पर तैयार की जाएगी। बाल विकास परियोजना पदाधिकारी इस सूची की एक प्रति प्रखंड विकास पदाधिकारी को उपलब्ध करायेंगे, जो बाढ़ आने पर मोबाइल मेडिकल टीमों को यह सूची उपलब्ध करा देंगे।”
मानक संचालन प्रक्रिया में यह भी कहा गया है कि मोबाइल मेडिकल टीमों को गर्भवती महिलाओं की सूची उपलब्ध कराई जाएगी। टीम बाढ़ के दौरान गाँवों का भ्रमण करेगी और उनके स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखेगी। यही नहीं, बाढ़ग्रस्त इलाक़ों से बचाव कार्य में गर्भवती महिलाओं का विशेष ख्याल रखने की बात भी कही गई है। लेकिन बाढ़ के दौरान गर्भवती रही महिलाओं से हमारी बातचीत से पता चलता है कि उन्हें सरकार की तरफ़ से विशेष सहायता नहीं मिलती है और उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है।
सुपौल के बाढ़ प्रवण इलाकों में काम कर रहे गैर सरकारी संगठन कोसी नवनिर्माण मंच के संस्थापक महेंद्र यादव कहते हैं, “मोबाइल मेडिकल टीम तटबंध के भीतर तो कहीं नहीं दिखती है और न ही गर्भवती महिलाओं के लिए कोई विशेष सुविधा मिलती है सरकार की तरफ से। काग़ज़ों में भले सरकार कह दे कि बहुत काम किया जाता है, लेकिन जमीन पर गर्भवती महिलाओं के लिए कोई विशेष सुविधा नहीं होती है।”
महेंद्र यादव आगे बताते हैं कि साल 2025 में बाढ़ त्रासदी चरम पर आने पर बाढ़ग्रस्त क्षेत्र में राहत दिए जाने की घोषणा के बाद भी आदेश के तहत बाढ़ पीड़ितों के लिए मेडिकल कैंप नहीं लगाये गये।

खोकनाहा में बच्चों की शिक्षक प्रियंका कुमारी कहती हैं, “लगता है कि बाकी जगहों की तरह हमारा कोई मानवाधिकार नहीं है। हम भूत की तरह जी रहे हैं। बच्चों को समय पर टीका नहीं लग पाना, नाव में ही गर्भवती महिलाओं का दम तोड़ देना – ये हम महिलाओं के जीवन की रोज़ की हकीकत है।”
“आशा कभी गांव आ भी जाए तो उसके पास ज़रूरी दवाइयां नहीं रहती हैं। आप समझिये कि एक ज़रूरी दवा लेने के लिए आपातकालीन समय में हमें दो नाव बदल कर दो गाँव पार करना पड़ता है। प्रति यात्री अगर आप पचास रुपये भाड़ा के हिसाब से अंदाज़ लगाएं तो एक दवा खरीदने में 200 रुपए आने जाने का खर्च पड़ जाता। अगर कभी रात में दवा खरीदने की मजबूरी आ गयी और पैसेंजर नाव उपलब्ध नहीं हो, तो 2000 रुपये खर्च कर प्राइवेट नाव ही मिलेगी,” गांववासी अरुलिया देवी ने कहा।
एकलव्य प्रसाद कहते हैं, “ बाढ़ की घटनाओं का सबसे ज़्यादा बोझ हमारे समाज में महिलाओं को ही ढोना पड़ता है। घर चलाने का सारा कार्यभार और घर के बच्चे-बूढ़ों का ख्याल रखने की सीधी ज़िम्मेदारी यहां महिलाओं के कन्धों पे होती है।”
सुपौल के बाढ़प्रवण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर ‘मैं मीडिया’ ने पिछले साल अगस्त में सुपौल के डीएम सावन कुमार और सुपौल के सिविल सर्जन लालन कुमार ठाकुर को फोन किया, लेकिन उन्होंने फोन कॉल्स का कोई जवाब नहीं दिया।
(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)
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