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क्या बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिलना मुमकिन है?

बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग एक बार फिर शुरू हो गई है। सीएम नीतीश कुमार से लेकर जदयू के तमाम नेता दोबारा बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग करने लगे हैं। लेकिन, भाजपा इस मांग को तवज्जो नहीं देती है। हाल ही में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और सांसद संजय जायसवाल ने कहा है कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग बिल्कुल इम्प्रैक्टिकल है।

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bihar special status story

बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग एक बार फिर शुरू हो गई है। सीएम नीतीश कुमार से लेकर जदयू के तमाम नेता दोबारा बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग करने लगे हैं। लेकिन, भाजपा इस मांग को तवज्जो नहीं देती है। हाल ही में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और सांसद संजय जायसवाल ने कहा है कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग बिल्कुल इम्प्रैक्टिकल है।


दिलचस्प बात है कि ये मांग तब ही जोर पकड़ कर लेती है जब किसी रिपोर्ट में ये बताया जाता है कि बिहार विकास के मामले में पिछड़ा हुआ है।

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हाल ही में नीति आयोग की रिपोर्ट आई जिसमें बताया गया है कि बिहार की 50 प्रतिशत से ज्यादा आबादी गरीब है। इसके बाद एक अन्य रिपोर्ट ने स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में बिहार की पोल खोल दी। इसके बाद ही विशेष राज्य का शोर शुरू हो गया।


लेकिन सवाल ये है कि बिहार में ऐसा क्या है कि इसे विशेष राज्य का दर्जा मिलना चाहिए और लम्बे समय से केंद्र सरकार की अनदेखी के बावजूद सीएम नीतीश कुमार क्यों बार बार ये मांग दोहराते हैं।

आइए सबसे पहले हम ये समझते हैं कि विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए शर्त क्या है और बिहार उन शर्तों में कहां ठहरता है।

किसी भी सूबे को विशेष राज्य का दर्जा नेशनल डेवलपमेंट काउंसिल देता है। अगस्त 1952 में वजूद में आये इस काउंसिल का अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं। किसी भी राज्य को विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए उस राज्य को पांच में कोई भी एक शर्त पूरी करनी होती है। वे शर्तें हैं

  1. राज्य पर्वतीय व कठिन भौगोलिक क्षेत्र में बसा हो
  2. उस राज्य की आबादी कम हो और आदिवासियों की आबादी ज्यादा हो
  3. राज्य पड़ोसी देशों की सीमा से सटा हो
  4. राज्य आर्थिक और बुनियादी ढांचे के तौर पर अविकसित हो
  5. राज्य फंड जुटाने में बिल्कुल असमर्थ हो

इन शर्तों के आधार पर पूर्व में देश के 11 सूबों को विशेष राज्य का दर्जा मिल चुका है। इनमें अरुणाचल प्रदेश, असम, हिमाचल प्रदेश, जम्मू- कश्मीर, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम, त्रिपुरा और उत्तराखंड शामिल हैं। फरवरी 2014 में आंध्रप्रदेश को भी विशेष राज्य का दर्जा दिया गया था, क्योंकि उस वक्त आंध्रप्रदेश का विभाजन हुआ था। हालांकि बाद में ये दर्जा वापस ले लिया गया।

अब सवाल है कि बिहार इनमें से कोई शर्त पूरा करता है कि नहीं। अगर मोटे तौर पर देखा जाए, तो बिहार इनमें से दो शर्तें पूरी करता है। अव्वल तो बिहार पड़ोसी देश नेपाल की सीमा से सटा हुआ है और दूसरा बिहार में हर साल आने वाली भीषण बाढ़ यहां के बुनियादी ढांचे खासकर सड़कों और फसलों को बर्बाद कर देती है जिससे सरकार को हर साल करोड़ों रुपए का नुकसान हो जाता है। साल 2010 से 2019 तक बाढ़ से बिहार में 2025 करोड़ रुपए की फसल बर्बाद हो चुकी है और 430.59 करोड़ रुपए की सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचा है।

bihar special status

जानकारों का कहना है कि बिहार को बाढ़ से आर्थिक नुकसान होता है और साथ ही ये नेपाल के साथ सीमा भी साझा करता है, इसलिए बिहार को विशेष सुविधा तो मिलनी ही चाहिए।

अर्थशास्त्री डीएम दिवाकर कहते हैं, “दो शर्तें तो बिहार पूरे कर रहा है। लेकिन रघुराम राजन के नेतृत्व में बनी एक कमेटी ने ये भी कहा था कि किसी सूबे को विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए जो शर्तें हैं, उनमें बदलाव होना चाहिए।”

वे आगे बताते हैं, “मैं मानता हूं कि बिहार और बिहार जैसे गरीब राज्यों को विशेष सुविधाएं मिलनी चाहिए। विशेष सुविधाओं के बिना गरीब राज्यों का विकास संभव नहीं है।”

वे मानते हैं कि बिहार में बुनियादी ढांचा, रोजगार और उद्योगों के लिए केंद्र सरकार से मदद मिलनी चाहिए।

हम डीएम दिवाकर की बातों को सही मानें, तो सवाल ये भी उठता है कि फिर केंद्र सरकार इस मांग पर विचार क्यों नहीं कर रही है? जबकि अभी तो केंद्र और राज्य दोनों जगह एनडीए की सरकार है।

माना जा रहा है कि बिहार को अगर विशेष राज्य का दर्जा मिल जाता है, तो दूसरे राज्य भी इसकी मांग करने लगेंगे और तब केंद्र सरकार को अन्य राज्यों की मांग पर भी विचार करना होगा। संभवतः इसी वजह से केंद्र सरकार इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया करती है।

ऐसे में सवाल ये भी उठता है कि जब केंद्र सरकार बिहार सरकार की मांग खारिज कर देती है, तब भी नीतीश कुमार बार-बार ये मांग क्यों दोहराते हैं?

राजनीतिक पंडितों का कहना है कि नीतीश कुमार को अच्छे से मालूम है कि विशेष राज्य का दर्जा देने की उनकी मांग पूरी नहीं होगी, लेकिन फिर भी वो बार बार ये मांग उठाकर असल में अपनी नाकामी को ढकना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग उठाकर वे लोगों को ये बताना चाहते हैं कि बिहार के विकास के लिए उन्होंने पर्याप्त काम कर दिया है और अब इससे ज्यादा काम सूबे को विशेष राज्य का दर्जा दिये बिना मुमकिन नहीं है।

केंद्र सरकार के अपने तर्क हैं और नीतीश कुमार की अपनी मांग है। दोनों अपनी जगह कायम है। दूसरी तरफ बिहार की जनता है, जो सुशासन का इंतजार कर रही है, अच्छे दिनों का इंतजार कर रही है।

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