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बिहार: मुस्लिम नाबालिग को बालिग बताकर ढाई महीने जेल में रखा

पटना हाईकोर्ट के जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस रितेश कुमार ने अपने आदेश में पुलिस की कार्रवाई को नाबालिग की आज़ादी में कटौती करार देते हुए कहा कि पुलिस अधिकारियों ने उसके जीवन और आज़ादी के अधिकार का हनन किया है।

Reported By Umesh Kumar Ray |
Published On :
muslim minor declared an adult and kept in jail for two and a half months

एक नाबालिग मुस्लिम को बालिग़ बताकर ढाई महीने तक जेल में रखने पर पटना हाईकोर्ट ने नाराज़गी जताते हुए नाबालिग को मुआवज़े के तौर पर 5 लाख रुपये देने और दोषी पुलिस अधिकारियों से इस रक़म की उगाही करने का आदेश दिया, यही नहीं कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट में याचिका दायर करने और अन्य क़ानूनी प्रक्रिया में हुए खर्च भी राज्य सरकार से ही देने को कहा।


पटना हाईकोर्ट के जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस रितेश कुमार ने अपने आदेश में पुलिस की कार्रवाई को नाबालिग की आज़ादी में कटौती करार देते हुए कहा कि पुलिस अधिकारियों ने उसके जीवन और आज़ादी के अधिकार का हनन किया है।

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कोर्ट ने यह भी माना कि डीआईजी का आरोप को सच मानकर मामले की जांच करने का निर्देश देना आपराधिक कानून न्यायशास्त्र के मुख्य सिद्धांत के खिलाफ है।


क्या है मामला

मधेपुरा ज़िले के सपरदह गाँव की रहने वाली ख़ुशबू परवीन ने 11 जुलाई 2025 को पुरैनी थाने में एक एफआईआर दर्ज करायी थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि ज़मीन विवाद को लेकर गाँव में एक पंचायत बुलाई गई थी। पंचायत हो ही रही थी कि 14 लोगों ने ख़ुशबू परवीन पर हमला कर दिया और उनके गहने लेकर भाग गये। ख़ुशबू परवीन ने एफआईआर में सभी 14 लोगों को नामज़द किया।

एफआईआर के आधार पर मामले की जाँच करते हुए जाँच अधिकारी रिज़वान अहमद ने पाया कि नामज़द 14 में से 10 लोगों के ख़िलाफ़ कोई मामला नहीं बनता है। इसलिए 1 सितंबर 2025 को जब जाँच अधिकारी ने चार्जशीट दाखिल किया, तो उसमें 10 आरोपियों के नाम शामिल नहीं किये और उन्हें ट्रायल के लिए भी नहीं भेजा गया। वहीं, इस मामले के अन्य चार फ़रार आरोपियों के लिए केस को खुला रखा गया।

डीआईजी का रिव्यू नोट और नाबालिग की गिरफ़्तारी

इस मामले में नया मोड़ तब आया, जब कोसी रेंज के डीआईजी ने जाँच अधिकारी को एक रिव्यू नोट भेजा। इस रिव्यू नोट में डीआईजी ने जाँच अधिकारी से कहा कि वह ये मानकर मामले की छानबीन शुरू करे कि सभी 10 लोगों के ख़िलाफ़ लगाये गये आरोप सत्य हैं। वहीं, डीआईजी ने मधेपुरा एसपी को आदेश दिया कि वह सभी आरोपियों की गिरफ़्तारी और कार्रवाई सुनिश्चित करे।

जाँच अधिकारी ने आनन फ़ानन में 23 अक्टूबर 2025 को एक नाबालिग को गिरफ्तार कर लिया और उसकी उम्र 19 वर्ष बताकर मजिस्ट्रेट कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया। मगर वास्तव में उसकी उम्र 16 साल से भी कम थी। हैरानी की बात ये है कि न तो जाँच अधिकारी और न ही मजिस्ट्रेट ने ही आरोपी की असल उम्र जानने की ज़हमत उठाई, नतीजतन नाबालिग को ढाई महीने तक वयस्कों की जेल में वयस्कों के साथ बिताना पड़ा।

आरोपी के नाबालिग होने का खुलासा तब हुआ, जब उसके परिजनों ने पटना हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर हस्तक्षेप करने की अपील की।

पटना हाईकोर्ट ने जब केस डायरी देखी, तो पाया कि डीआईजी से लेकर एसपी और जाँच अधिकारी के स्तर पर लापरवाही बरती गई, जिसके चलते नाबालिग को ढाई महीने जेल में गुज़ारना पड़ा।

पटना हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि केस डायरी से पता चला कि 29 सितंबर 2025 को जाँच अधिकारी ने केस डायरी में डीआईजी के रिव्यू नोट को शामिल किया और उसी नोट के तहत कार्रवाई शुरू की। जाँच अधिकारी ने कार्रवाई से पहले जिला पुलिस अधीक्षक से कोई निर्देश नहीं लिया और एकतरफ़ा एक्शन लिया।

केस डायरी से ये भी पता चलता है कि जाँच अधिकारी को पूरी तरह पता था कि नाबालिग समेत 10 आरोपियों के नाम चार्जशीट में नहीं थे और उन्हें ट्रायल के लिए भी नहीं भेजा गया था, लेकिन इसके बाद भी उसने मजिस्ट्रेट कोर्ट में आवेदन देकर पुनः जाँच की इजाज़त नहीं माँगी। मजिस्ट्रेट की तरफ़ से भी इस मामले में कोताही बरती गई। नाबालिग के परिजनों के मुताबिक़, उन्होंने मजिस्ट्रेट कोर्ट के सामने कहा था कि गिरफ्तार व्यक्ति नाबालिग है, लेकिन कोर्ट ने उनकी बातें अनसुनी कर दीं।

‘जुवेनाइल जस्टिस एक्ट का उल्लंघन’

पुलिस की इस अनैतिक कार्रवाई के ख़िलाफ़ नाबालिग के परिजनों ने 24 नवम्बर 2025 को पटना हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि नाबालिग के बिहार स्कूल एग्जामिनेशन बोर्ड के सर्टिफिकेट के अनुसार उसका जन्म 1 जनवरी 2010 को हुआ है। पटना हाईकोर्ट ने कहा कि सही उम्र का पता लगाये बिना आरोपी को जेल भेज दिया जाना जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2015 के प्रावधानों का उल्लंघन है।

याचिका पर सुनवाई करते हुए पटना हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से काउंटर एफिडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया और साथ ही मजिस्ट्रेट से गिरफ्तार व्यक्ति पर जन्म प्रमाण पत्र के आधार पर फ़ैसला लेने को कहा। मजिस्ट्रेट ने 21 नवम्बर 2025 को मधेपुरा के जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को आरोपी की उम्र पता करने का आदेश दिया। 7 जनवरी 2026 को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि गिरफ़्तारी के वक़्त याचिकाकर्ता की उम्र 15 साल 6 माह और 8 दिन थी।

पटना हाईकोर्ट के जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस रितेश कुमार ने 8 जनवरी के अपने फ़ैसले में नाबालिग आरोपी को अविलम्ब छोड़ने का आदेश दिया और अवैध गिरफ़्तारी के लिए पटना हाईकोर्ट ने आदेश दिये जाने के एक महीने के भीतर याचिकाकर्ता को पाँच लाख रुपये मुआवज़ा देने को कहा। यही नहीं, कोर्ट ने मामले की जाँच कर दोषी अधिकारियों से इस खर्च की उगाही करने को कहा।

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Umesh Kumar Ray started journalism from Kolkata and later came to Patna via Delhi. He received a fellowship from National Foundation for India in 2019 to study the effects of climate change in the Sundarbans. He has bylines in Down To Earth, Newslaundry, The Wire, The Quint, Caravan, Newsclick, Outlook Magazine, Gaon Connection, Madhyamam, BOOMLive, India Spend, EPW etc.

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