थोड़ी-सी खाली जमीन का एक टुकड़ा है, जहां घास उगी हुई है. खेत के एक हिस्से में ईंट, बालू व मकान बनाने के दूसरे सामान रखें हुए हैं। इसी सामान से इस खाली जमीन पर सपनों का एक घर बनना था, कुछ सपने इसी जमीन की चाहरदीवारी के भीतर पलने वाले थे। मगर, राजा ऋषिदेव की मौत के साथ उन सारे अधबुने सपनों की भी मौत हो गई।

महादलित समुदाय से आने वाले अररिया जिले के रानीगंज प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत बौसी के रहने वाले राजा की सरकारी उम्र 14 साल ही थी, लेकिन उनके रिश्तेदार उसकी उम्र 18-19 साल बताते हैं। मगर उसकी समझदारी बताती है कि वह 18-19 का ही रहा होगा, तभी तो वह रोटी, कपड़ा और मकान की चिंता में घुलता रहता था। वह झोपड़ी में नहीं रहना चाहता था। वो एक ठोस मकान बनाना चाहता था, इसलिए अच्छी कमाई की चाहत उसे घर से 2000 किलोमीटर दूर कश्मीर ले गई थी। वहां 17 अक्टूबर को चरमपंथियों ने उसकी हत्या कर दी।

फोटो: राजा के ज़मीन पर पड़े पक्का मकान बनाने के सामान / शाह फैसल

राजा गाँव में अपनी बूढी दादी दुलारी देवी के साथ रहता था। उसके पिता मानसिक विछिप्त हैं। माँ बहुत पहले दूसरी शादी कर दुसरे पति के साथ जा चुकी है। एक बहन है, वो माँ के साथ ही रहती है। राजा के बड़े पिता बिद्यानंद ऋषिदेव ही उसके अभिभावक हैं। दुलारी देवी बताती हैं,

“राजा अपना घर बनाने के ख्वाब के साथ कश्मीर गया था, वापस आकर शादी भी करना चाहता था।”

राजा ने छठवीं तक ही पढ़ाई की थी। इससे आगे की पढ़ाई के लिए कोई सहारा नहीं था, लिहाज़ा वो कश्मीर चला गया।

“मैंने उससे छठी क्लास से आगे पढ़ाई करने को कहा था, लेकिन वो कहता था अगर कमाएंगे नहीं तो हम कहाँ रहेंगे?,”

दुलारी कहती हैं।

पिछले दिनों जब सीएम नीतीश कुमार से बिहारी मजदूरों के पलायन पर सवाल पूछा गया था, तो उन्होंने कहा था कि बेहतर आमदनी के लिए लोग बाहर जाते हैं लेकिन बिहार में काम की कमी नहीं है। लेकिन राजा के मामले में ये दावा खोखला ही लगता है।

राजा के साथ काम करने वाले मजदूरों का कहना है कि 12 से 15 हजार रुपये माहवार पर कश्मीर में काम करते थे। यानी कि बिहार में उन्हें इससे भी कम पैसा मिलता था।

कश्मीर जाने से पहले राजा गाँव में मज़दूरी किया करता था। बेहतर तनखाह की आस में 6-7 महीने पहले ही वह कश्मीर गया था। राजा का चचेरा भाई अरविंद भी साथ ही कश्मीर गया था। लेकिन, ठेकेदार वहाँ काम करवा कर पैसे नहीं देता था। इसलिए हमले से दस दिन पहले ही वो अपने कुछ साथियों के साथ भाग कर घर आ गया। अरविंद ने राजा को भी साथ जाने को कहा, लेकिन राजा ने मना कर दिया था। अगर उसने अरविंद का कहा मान लिया होता, तो शायद आज वो जिंदा होता।

छह साल के बच्चे ने पिता को दी मुखाग्नि

इसी ज़िले के अररिया प्रखंड प्रखंड अंतर्गत खेरूगंज निवासी योगेंद्र ऋषिदेव भी उसी दिन कश्मीर में आतंकवादियों की गोलियों का शिकार हो गये थे। उनके परिवार में तीन मासूम बेट और पत्नी उर्मिला देवी है। उर्मिला छः महीने की गर्भवती है।

सबसे बड़ा बेटा विनय महज छह साल का है। पिता की अंगुली पकड़ कर दुनिया देखने की उम्र में उसके हिस्से पिता के शव को मुखाग्नि देने का जिम्मा आ गया है। रिवाज के मुताबिक, विनय को सफेद धोती पहनाई गई है। वह सेब खा रहा है और कैमरे की तरफ देख रहा है। लेकिन, कैमरा देखकर उसमें वो कौतूहल नहीं है, जो बच्चों में अमूमन होता है। अलबत्ता, चेहरे पर परेशान करने वाली उदासी नजर आती है, जैसे कि उसके भीतर कुछ टूट रहा है।

विनय को नहीं मालूम कि उसने मुखाग्नि की जो रस्म निभाई है उसका क्या मतलब है। उसे ये भी नहीं मालूम कि उसकी अंगुली थामने वाले, उसके सभी बाल-सुलभ शौक पूरे करने वाले उसके पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं।

योगेंद्र पहले गाँव में ही मज़दूरी करते थे और महीने में मुश्किल से 10 हजार रुपए कमा पाते थे। उर्मिला बताती हैं,

“कश्मीर में 15,000 रुपए महीने की तनखाह की बात थी, उन्होंने सोचा था तीनों बेटों के लिए ज़मीन खरीद कर घर बनाएंगे।”

योगेंद्र की माँ बरनी देवी को ये फ़िक्र खाए जा रही है कि कश्मीर जाने के बाद बेटे से एक बार भी बात नहीं हो पाई थी, दशहरा के दिन भी नहीं।

बरनी देवी बताती हैं,

“दशकों पहले वो अपने पति के साथ दिल्ली में मज़दूरी करते थी। छः बच्चों की परवरिश के बाद कुछ पैसे बचे तो उसी से डेढ़ कट्ठा ज़मीन ख़रीदा था, उसी पर पूरा परिवार रहता है।”

योगेंद्र के तीन नन्हें बच्चों और पेट में पल रहे मासूम की जिम्मेदारी अब उर्मिला देवी के कंधों पर आ गई है। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे अब पहाड़ सी ज़िंदगी कैसे काटेंगी, उनके बच्चों का मुस्तकबिल क्या होगा।

भूखे प्यासे घर लौटे मजदूर

राजा और योगेंद्र की हत्या के बाद प्रवासी मज़दूर जैसे-जैसे वापस गाँव आ रहे हैं। उन्हें पहले कमाई की चिंता रहती थी, मगर प्रवासी मज़दूरों की हत्याओं के बाद उन्हें जिंदगी की चिंता सताने लगी और वे लोग बदहवास हैकर घर को भागे।

कश्मीर से लौटे एक ऐसे ही प्रवासी मजदूर राम कुमार बताते हैं,

“भूखे प्यासे चार दिन तक बस का सफर किया, ठेकेदार ने बस का पूरा किराया भी नहीं दिया, इसलिए बस वाले ने आगरा में ही छोड़ दिया।”

राम कुमार की तरह राहुल, चन्दन, सुरेश, मनीष, नीरज और रविश भी पिछले कुछ दिनों में कश्मीर से वापस आये हैं। इन सभी ने ठेकेदार और अपने ही गाँव के बरमा ऋषदेव पर आरोप लगाया कि उन्हें वहाँ ज़बरन रोक कर रखा गया था। वो आधार कार्ड, मोबाइल फ़ोन रख लेते और तन्खाह नहीं देते थे। जितना पैसा बोल कर कश्मीर ले जाया गया था, उतना कभी देते नहीं थे।

कश्मीर से लौटे इन सभी मज़दूरों ने पड़ोस के ही जिस बरमा ऋषिदेव पर ये आरोप लगाए हैं, वो हमले में घायल चुनचुन ऋषिदेव का भाई है। जब हम उसके घर पर गए उसकी माँ नुन्नू देवी ने हमारी बात बरमा से कराई। उसने हमें बताया,

“वो वहाँ पुलिस की देखरेख में अपने भाई के इलाज करवा रहा है। चुनचुन की हालत में सुधार है, लेकिन हमले की जांच को लेकर पुलिस उन्हें फिलहाल घर नहीं जाने दे रही है। ठेकेदार के साथ घर वापस लौटते ही वो सब का हिसाब कर देगा।”

वहीं उसकी माँ कहती है,

“इन बकाए पैसों को लेकर गाँव के कुछ लोग ने गुरुवार की शाम उसके परिवार की पिटाई भी की।”

उधर, राजा ऋषिदेव की बुआ सीता देवी ने नीतीश सरकार द्वारा दिए गए दो लाख के मुआवजे पर सवाल खड़ा किया है। वो कहती हैं, “मुआवजा कम से कम 19 लाख हो और साथ में बूढी दादी को पेंशन और घर मिले।”

कोई भी मुआवजा किसी की जान से बढ़ कर नहीं हो सकता। मुआवजा महज आर्थिक भरपाई कर सकता है, भावनात्मक जुड़ाव की भरपाई भला पैसे से कहां होती है। सरकार को चाहिए कि कम से इतना मुआवजा और सरकारी सहूलियतें मुहैया करवा दे कि पीड़ित परिवारों की जिंदगी थोड़ी सुकून से गुजर सके।