बिहार के किशनगंज जिले के किसान मोहम्मद नइमुद्दीन ने तीन एकड़ जमीन में मक्का की खेती की थी, जिस पर करीब तीन लाख रुपये का खर्च आया। यह रकम उन्होंने किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) के जरिए कर्ज लेकर लगाई थी। फसल कटाई के लिए तैयार थी, लेकिन एक रात आई आंधी और बारिश ने सब कुछ बर्बाद कर दिया। अब उनके खेत में गिरी हुई फसल है और सिर पर कर्ज का बोझ है। नइमुद्दीन कहते हैं कि उन्हें समझ नहीं आ रहा कि अब घर का खर्च कैसे चलेगा।
किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) योजना के तहत किसानों को बीज, उर्वरक और कीटनाशक जैसी कृषि आवश्यकताओं के लिए कम ब्याज दर (आमतौर पर 4% से 7%) पर आसान ऋण उपलब्ध कराया जाता है। इस योजना के अंतर्गत किसान 3 लाख रुपये तक का अल्पकालिक ऋण प्राप्त कर सकते हैं।
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पूर्णिया ज़िला मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर दूर सदभेली पंचायत की महिला किसान अंजुम आरा के परिवार ने सात बीघा खेत में मकई की खेती की थी, जिसे ओलावृष्टि ने पूरी तरह तबाह कर दिया।
“करीब 1.5 लाख रुपये का लोन लेकर खेती की थी। सात लोगों का मेरा परिवार इसी पर निर्भर था। अब हम ऊपर वाले के भरोसे हैं,” अंजुम कहती हैं।
बिहार में प्री-मानसून की पहली दस्तक ने जहां मौसम का मिजाज बदला, वहीं किसानों के लिए यह आफत बनकर आई है। राज्य के कई हिस्सों में आई तेज आंधी, बारिश और ओलावृष्टि ने तैयार मक्का, गेहूं और आलू की फसलों के साथ-साथ लीची और आम के मंजर (फूल) व ड्रैगन फ्रूट के तनों को भारी नुकसान पहुंचाया है, जिससे किसान आर्थिक संकट में घिर गए हैं।
![mohammad naimuddin, a farmer from kishanganj district]](https://i0.wp.com/mainmedia.in/wp-content/uploads/2026/04/mohammad-naimuddin-a-farmer-from-kishanganj-district.jpeg?resize=640%2C360&ssl=1)
जलवायु परिवर्तन से बढ़ रहीं चरम मौसमी घटनाएं
दरअसल, 20 मार्च को प्री-मानसून गतिविधियों की शुरुआत के साथ ही बिहार में मौसम ने अचानक करवट ली। मौसम विज्ञान केंद्र के अनुसार, इस समय तीन अलग-अलग मौसम प्रणाली एक साथ सक्रिय हैं। पश्चिमी विक्षोभ, निम्न दबाव और जेट स्ट्रीम के संयुक्त प्रभाव से यह स्थिति बनी है, जिससे तेज आंधी और भारी बारिश देखने को मिली।
मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक, इस बार का पश्चिमी विक्षोभ असामान्य रूप से प्रभावशाली है। इसके साथ ही निम्न दबाव का एक क्षेत्र सीधी दिशा में आगे बढ़ रहा है, जिसने उत्तर भारत के बड़े हिस्से को प्रभावित किया है। इस वजह से बादल बनने, बारिश होने और तेज हवाएं चलने जैसी स्थितियां बनीं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के अचानक और तीव्र मौसम बदलाव सामान्य नहीं हैं और ये व्यापक जलवायु असंतुलन की ओर इशारा करते हैं। दिन में जहां लोग गर्मी और उमस से जूझ रहे थे, वहीं शाम होते-होते मौसम का ठंडा हो जाना इस बढ़ती अनिश्चितता को दर्शाता है।
फिलहाल, सबसे बड़ी चिंता उन किसानों की है, जिनकी तैयार फसलें बर्बाद हो गई हैं और जिनके सामने अब कर्ज चुकाने और परिवार का पालन-पोषण करने की चुनौती खड़ी हो गई है।
अपने बर्बाद हो चुके फसल को निहारते हुए किशनगंज अंतर्गत फाला पंचायत के किसान हरिनारायण कहते हैं, “दस बीघा जमीन में मक्का बोया था। इसके लिए करीब दो लाख रुपये का कर्ज लेना पड़ा। परिवार के साथ मिलकर की गई महीनों की मेहनत आंधी और ओलावृष्टि में बर्बाद हो गई।”
“पूरी फसल गिर गई है। अब आमदनी का कोई जरिया नहीं बचा। कर्ज चुकाना मुश्किल हो गया है,” वे आगे बताते हैं।
डॉ. कलाम कृषि महाविद्यालय, किशनगंज के सहायक प्राध्यापक डॉ. एम. शमीम के अनुसार, वैज्ञानिक दृष्टि से वैश्विक तापवृद्धि के कारण पृथ्वी के वायुमंडल का तापमान बढ़ रहा है। इससे वाष्पीकरण की दर तेज होती है और वायुमंडल में आर्द्रता की मात्रा बढ़ जाती है। जब यह अधिक नमी युक्त वायु शीतल वायु के संपर्क में आती है, तो तीव्र संवहनीय गतिविधियाँ उत्पन्न होती हैं। इसके परिणामस्वरूप बादलों में बर्फ के ठोस कण (ओले) बनते हैं, जो भारी होकर धरातल पर गिरते हैं। इस प्रकार, जलवायु परिवर्तन ओलावृष्टि की घटनाओं को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
उन्होंने आगे बताया कि किशनगंज का भौगोलिक क्षेत्र उच्च आर्द्रता और अधिक वर्षा वाला है। ऐसे में तापमान में अचानक बदलाव और वायुमंडलीय अस्थिरता के कारण यहाँ ओलावृष्टि की संभावना अधिक बनी रहती है।
मक्के की फसल पर ओलावृष्टि का प्रभाव अत्यधिक हानिकारक होता है। ओलों के गिरने से पत्तियाँ फट जाती हैं, तने टूट जाते हैं और पौधे जमीन पर गिर जाते हैं। यदि यह घटना दाने बनने की अवस्था में होती है, तो भुट्टे पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पाते, जिससे उत्पादन में भारी कमी आती है।
ड्रैगन फ्रूट की फसल मांसल और कोमल तनों पर आधारित होती है। ओलों के प्रहार से तनों पर घाव हो जाते हैं, जिससे जीवाणु और कवक जनित रोगों का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, फलों पर दाग पड़ जाते हैं, जिससे उनका बाजार मूल्य घटता है और निर्यात गुणवत्ता प्रभावित होती है।
लीची की फसल विशेष रूप से पुष्पन और फलन अवस्था में बेहद संवेदनशील होती है। ओलावृष्टि से फूल झड़ जाते हैं और छोटे फल टूटकर गिर जाते हैं। इससे फल सेटिंग प्रभावित होती है और कुल उत्पादन में उल्लेखनीय गिरावट आती है।
आम की फसल पर ओलावृष्टि का प्रभाव भी अत्यंत विनाशकारी होता है। बौर आने की अवस्था में ओले गिरने से पुष्प पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं। वहीं, फल बनने की अवस्था में ओलों के कारण फल गिर जाते हैं या उनमें दाग और घाव हो जाते हैं, जिससे उनकी गुणवत्ता और बाजार मूल्य दोनों घट जाते हैं।
ओलावृष्टि के अलावा, जलवायु परिवर्तन के कारण तेज आंधी, असमय वर्षा, पाला और ताप लहर जैसी घटनाएँ भी बढ़ रही हैं, जो फसलों को अप्रत्यक्ष रूप से नुकसान पहुंचाती हैं। साथ ही, मिट्टी की उर्वरता में कमी और कीट व रोगों का बढ़ता प्रकोप भी कृषि उत्पादन को प्रभावित कर रहा है।

वर्ष 2023-24 में बिहार में कुल अनाज उत्पादन का 99.9 प्रतिशत हिस्सा धान, गेहूं और मक्का से आया। वर्ष 2024-25 में कुल अनाज उत्पादन में धान की हिस्सेदारी 40.7 प्रतिशत, गेहूं की 32.1 प्रतिशत और मक्का की 27.1 प्रतिशत रही।
वर्ष 2023-24 से 2024-25 के बीच धान उत्पादन में 4.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि गेहूं उत्पादन 7.1 प्रतिशत और मक्का उत्पादन 12.6 प्रतिशत बढ़ा।
बिहार आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, वर्ष 2024-25 में मक्का की खेती में जिलों के बीच उपज में काफी भिन्नता देखी गई, जिसका सह-परिवर्तन गुणांक 0.41 रहा। मक्का उत्पादन में पूर्णिया, अररिया, कटिहार, बेगूसराय और समस्तीपुर जैसे पांच जिलों का महत्वपूर्ण योगदान रहा, जहां कुल मक्का क्षेत्र का 50.6 प्रतिशत हिस्सा केंद्रित था और राज्य के कुल मक्का उत्पादन में इनकी हिस्सेदारी 58.1 प्रतिशत रही।
खरीफ मक्का उत्पादन वर्ष 2020-21 में 225.1 मीट्रिक टन से बढ़कर 2023-24 में 586.2 मीट्रिक टन हो गया, हालांकि 2024-25 में इसमें हल्की गिरावट दर्ज करते हुए यह 571.0 मीट्रिक टन रह गया। वहीं रबी मक्का उत्पादन में लगातार वृद्धि देखी गई, जो 2020-21 में 2323.9 मीट्रिक टन से बढ़कर 2024-25 में 5205.1 मीट्रिक टन तक पहुंच गया।
मौसम से नुकसान पर मुआवजे का प्रावधान
प्राकृतिक आपदाओं के दौरान, बिहार राज्य फसल सहायता योजना के तहत फसल क्षति की सूचना देने वाले किसानों को आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। यह योजना रैयत (स्वयं भूमि पर खेती करने वाले), गैर-रैयत (पट्टे की जमीन पर खेती करने वाले) तथा स्वामित्व एवं पट्टे दोनों प्रकार की भूमि पर खेती करने वाले किसानों को कवर करती है। मुआवजे की गणना क्षतिपूर्ति (इंडेम्निटी) और थ्रेशोल्ड यील्ड के आधार पर की जाती है, जिसमें सात वर्षों की औसत उपज को 70 प्रतिशत इंडेम्निटी स्तर पर लिया जाता है। सहायता राशि फसल नुकसान की सीमा के अनुसार निर्धारित होती है।
इस योजना के तहत प्रमुख खरीफ फसलें जैसे धान, मक्का, सोयाबीन, आलू, बैंगन, टमाटर और पत्तागोभी शामिल हैं, जबकि रबी की महत्वपूर्ण फसलों में गेहूं, मक्का, चना, सरसों, अरहर, गन्ना, प्याज, आलू, बैंगन, टमाटर, पत्तागोभी और मिर्च शामिल हैं।
बिहार आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, वर्ष 2024-25 में खरीफ मौसम के लिए 9.5 लाख किसानों और रबी मौसम के लिए 8.5 लाख किसानों ने पंजीकरण कराया। हालांकि इस अवधि में फसल उत्पादन को प्रभावित करने वाली कोई बड़ी प्राकृतिक आपदा नहीं आई, इसलिए न तो कोई मुआवजा दावा किया गया और न ही कोई वित्तीय सहायता वितरित की गई।
2020-21 में खरीफ मौसम के लिए 39,29,108 किसानों ने पंजीकरण कराया था, जिनमें 5,08,684 लाभुक को 259.2 करोड़ रूपये का मुआवजा मिला था, लेकिन 2023-24 में आधा से भी कम सिर्फ 15,96,950 किसानों ने खरीफ मौसम के लिए पंजीकरण कराया, जिनमें 1,28,201 किसानों को 122.52 करोड़ रुपये का मुआवजा वितरित किया गया। वहीं रबी फसलों के लिए 2020-21 में 13,33,100 किसानों ने पंजीकरण कराया, जिनमें से 1,89,514 को 74.4 करोड़ मिले, लेकिन 2023-24 में 7,75,391 पंजीकरण हुए, जिमें 54,790 को 38.76 करोड़ रुपये बतौर मुआवजा मिले।
उधर, फसल नुकसान के मुद्दे को बिहार के आधा दर्जन सांसदों ने संसद सत्र के दौरान उठाया और किसानों के लिए मुआवजे की मांग की। अररिया से भाजपा सांसद प्रदीप सिंह ने सदन में कहा, “20 मार्च को इतना तेज आंधी-तूफान आया कि पूरे सीमांचल-कोसी इलाके के किसानों की मक्का फसल बर्बाद हो गई। अभी डेढ़ से दो महीने में फसल कटकर घर आने वाली थी। सरकार इसके लिए विशेष पैकेज दे, ताकि किसानों की कमर न टूटे। वे कर्ज के बोझ तले दबे हैं और भुखमरी के कगार पर हैं।”
किशनगंज के पोठिया प्रखंड कृषि पदाधिकारी अभिषेक राज ने कहा कि प्रखंड में आई आंधी, बारिश और ओलावृष्टि से मक्का, गेहूं और आलू सहित अन्य फसलें प्रभावित हुई हैं। प्रारंभिक निरीक्षण में कई क्षेत्रों में भारी क्षति की आशंका जताई गई है।

उन्होंने बताया कि सरकार के प्रावधान के अनुसार 33 प्रतिशत या उससे अधिक फसल क्षति होने पर किसानों को मुआवजा दिया जाता है। मक्का, गेहूं और आलू सहित अन्य फसलों के लिए 17 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर की दर से सहायता राशि दी जाएगी।
उन्होंने आगे कहा, “विभाग की टीमें लगातार सर्वे कर रही हैं। हमारी कोशिश है कि हर प्रभावित किसान का सही आकलन हो और उसे समय पर सहायता मिल सके। किसानों से अपील है कि वे सर्वे में सहयोग करें और सही जानकारी दें, ताकि कोई भी वंचित न रह जाए।”
(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)
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