शिक्षा अधिकार व गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा को लेकर काम करने वाले गैर-सरकार संगठन राइट यू एजुकेशन फोरम ने बिहार विधानसभा चुनाव के मद्देनजर राजनीतिक पार्टियों से मांग की है कि वे अपने घोषणापत्रों में सरकारी स्कूली शिक्षा को बेहतर करने के उपायों को शामिल करें।
आंकड़े बताते हैं साल 1961 की जनगणना में बिहार की साक्षरता दर 23.4 प्रतिशत थी और राष्ट्रीय औसत 28.3 प्रतिशत थी। यानी राष्ट्रीय औसत और बिहार के औसत में महज 5 प्रतिशत का फासला था, जो साल 2011 की जनगणना में बढ़कर 10 प्रतिशत हो गया। साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, बिहार की सारक्षता दर 63.8 प्रतिशत और राष्ट्रीय स्तर पर साक्षरता दर 74 प्रतिशत है।
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साल 2022-2023 में बिहार सरकार की ओर से किये गये जाति सर्वेक्षण के आंकड़े भी बिहार में शिक्षा की बदहाल स्थिति बयान करते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, बिहार में 5वीं तक की पढ़ाई कर पाने वाले बच्चों की संख्या कुल आबादी का महज 22.67 प्रतिशत है। वहीं, महज 14.71 प्रतिशत लोग ही 10वीं तक पढ़ पा रहे हैं। आबादी का 32 प्रतिशत हिस्सा तो कभी स्कूल ही नहीं जा पाया।
असर-2022 में बिहार की स्थिति
इसी तरह, पीरामल ग्रुप व प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन की तरफ से जारी एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (असर-2022) भी बिहार में बदहाल स्कूली शिक्षा की तरफ इशारा करती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2012 में सरकारी स्कूलों की कक्षा तीन के 25.1 प्रतिशत बच्चे घटाव या उससे अधिक हिसाब कर सकते थे, लेकिन साल 2022 में यह प्रतिशत 21.2 रहा। हालांकि, साल 2018 के आंकड़े के मुकाबले थोड़ा ज्यादा है। साल 2018 में यह आंकड़ा 18 प्रतिशत था।
इसी तरह, पांचवीं कक्षा के 30 प्रतिशत बच्चे भाग कर सकते हैं, जो साल 2018 के मुकाबले लगभग 6 प्रतिशत अधिक है। साल 2018 में पांचवी कक्षा के 24.1 प्रतिशत बच्चे ही भाग कर सकते थे। वहीं, आठवीं कक्षा के 58 प्रतिशत बच्चे भाग कर सकते हैं, जो साल 2018 की तुलना में 3 प्रतिशत अधिक है।
असर-2022 रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2018 में आठवीं कक्षा के 66 प्रतिशत बच्चे भाग कर सकते थे, जो साल 2022 में घटकर 66.1 प्रतिशत हो गया जबकि साल 2018 में आठवीं कक्षा की 49.8 प्रतिशत लड़कियां भाग कर सकती थीं, जो साल 2022 में करीब 7 प्रतिशत बढ़कर 57 प्रतिशत पर पहुंच गया।
वहीं, पांचवी कक्षा के छात्र छात्राओं की बात की जाए, तो साल 2018 में इस कक्षा के 34.7 प्रतिशत बच्चे भाग कर सकते थे। साल 2022 में इसमें सिर्फ 2.7 प्रतिशत का इजाफा हुआ जबकि लड़कियों के मामले में यह इजाफा 7.7 प्रतिशत का है।
पीरामल ग्रुप व प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन की ये रिपोर्ट बिहार के 1140 गांवों के 22796 घरों के 3 से 16 साल की उम्र के 52959 बच्चों में किये गये सर्वेक्षण पर आधारित थी।
उक्त रिपोर्ट में सीमांचल को लेकर दिये गये आंकड़े और भी बुरे थे। आंकड़ों के अनुसार, पूर्णिया डिविजन (जिसमें सीमांचल के चार जिले किशनगंज, अररिया, कटिहार व पूर्णिया आते हैं) में तीसरी से पांचवीं कक्षा में पढ़ रहे बच्चों में से 22.8 प्रतिशत बच्चे ही कक्षा दो के स्तर के पाठ पढ़ सकते हैं जबकि महज 27.4 प्रतिशत बच्चे ही घटाव के सवाल हल कर सकते हैं। राज्य स्तर पर ये आंकड़े क्रमशः 30.5 प्रतिशत और 41.4 प्रतिशत हैं।
सूबे में आरटीई का अनुपालन फिसड्डी
बिहार में शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम के अनुपालन में भी उदासीनता है। फोरम ने कहा कि साल 2021 में लोकसभा में दिये गये एक जवाब से पता चलता है कि बिहार में शिक्षा के अधिकार का महज 11.1 प्रतिशत अनुपालन हो सका है। वहीं, आरटीआई के एक जवाब से पता चलता है कि राज्य के 3213 स्कूलों के पास अपना भवन नहीं है और 183 विद्यालय खुले आसमान के नीचे चलते हैं। इसी तरह राज्य के कुल 1.14 लाख आंगनबाड़ी केंद्रों में से केवल 40 हजार केंद्रों के पास ही अपना भवन है।
फोरम के मुताबिक, स्कूलों में विषयवार शिक्षकों का घोर अभाव है और किसी भी मध्य विद्यालय में सफाईकर्मी या कार्यालय सहायक नहीं है।
फोरम ने राजनीतिक पार्टियों के सामने 25 सूत्री मांग रखी है, जिनमें स्कूलों में शत-प्रतिशत नामांकन सुनिश्चित करना, शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करना, विद्यालयों का समेकन या बंद करने की योजना पर अविलम्ब रोक, विषयवार शिक्षकों की नियुक्ति, दिव्यांग बच्चों के लिए आवश्यक व्यवस्था और शिक्षकों की उपलब्धता, सभी आंगनबाड़ी केंद्रों के पास पेयजल, शौचालय तथा अन्य निर्धारित सुविधाओं को पूरा करना और निजी विद्यालयों की व्यावसायिकता का प्रभावी नियंत्रण आदि शामिल है।
फोरम ने यह मांग भी रखी है कि राज्य सरकार को अपने बजट का 25 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा पर खर्च करना चाहिए।
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