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बिहार चुनाव 2025: दिव्या गौतम बन पाएंगी भाकपा (माले) की पहली महिला विधायक?

साल 2015 के विधानसभा चुनाव में भी सात महिलाओं को टिकट दिया था, लेकिन साल 2020 के विधानसभा चुनाव में महज एक महिला को टिकट मिला था। लेकिन कोई भी महिला जीत नहीं सकी।

Reported By Umesh Kumar Ray |
Published On :
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करीब 12 साल पहले पटना विश्वविद्यालय की कुछ छात्राओं ने भीषण आंदोलन किया था। उनकी मांग थी कि पटना विश्वविद्यालय में विमेन सेल बनाया जाए, जिसके जरिए लैंगिक समानता को लेकर व्यापक प्रचार कार्यक्रम हो।


दरअसल, साल 2012 में दिल्ली गैंगरेप केस के बाद विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने सभी विश्वविद्यालयों को सर्कुलर जारी कर जेंडर सेंसिटाइजेशन सेल बनाने को कहा था। मगर, विश्वविद्यालय की तरफ से इसको लेकर कोई सक्रियता नहीं दिख रही थी, जिसके बाद कुछ छात्र नेताओं ने आंदोलन चलाया और अंततः विश्वविद्यालय ने 14 सदस्यीय सेल का गठन किया। इस सेल में तीन महिला छात्र नेताओं को भी जगह मिली। इनमें से एक दिव्या गौतम थीं।

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छात्र जीवन में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन यानी भाकपा (माले) की छात्र इकाई ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) के बैनर तले छात्रा राजनीति में सक्रिय रहीं 33 वर्षीया दिव्या गौतम को भाकपा (माले) ने पटना की दीघा विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया है।


दिव्या गौतम का दूसरा परिचय ये भी है कि वह दिवंगत बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की ममेरी बहन हैं। सुशांत सिंह राजपूत के भाई नीरज बबलू भाजपा नेता व विधायक हैं।

दिव्या गौतम साल 2021 से पटना विमेंस कॉलेज के डिपार्टमेंट ऑफ कम्युनिकेशन में असिस्टेंट प्रोफेसर व पटना यूनिवर्सिटी में गेस्ट फैकल्टी हैं। वह पीएचडी रिसर्च स्कॉलर भी हैं। वहीं, साल 2018-2020 में संस्कृति मंत्रालय ने उन्हें लोकनृत्य के सामाजिक और सांस्कृति अध्ययन के लिए जूनियर रिसर्च फेलोशिप दिया।

2012 में लड़ा छात्र संघ का चुनाव

दिव्या गौतम ने पटना डीपीएस से 12वीं तक की पढ़ाई की और इसके बाद पटना कॉलेज से मास कम्युनिकेशन में स्नातक किया और कॉलेज टॉपर रहीं।

पटना विश्वविद्यालय में छात्र संघ का चुनाव एक दौर में काफी लंबित चल रहा था। लेकिन भारी दबाव के चलते करीब ढाई दशक बाद यूनिवर्सिटी ने छात्र संघ का चुनाव कराने का फैसला लिया। साल 2012 में आखिरकार चुनाव हुआ, तो दिव्या गौतम में AISA की तरफ से अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा और काफी वोटों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से हार गईं। आइसा से जुड़े छात्र नेता दिव्यम कुमार कहते हैं, “उस चुनाव में एबीवीपी की तरफ से काफी धांधली की गई थी। बिजली काट दी गई थी और तमाम तरह के प्रपंच रचे गये थे, लेकिन दिव्या गौतम ने तगड़ी फाइट दी थी।”

लेकिन, छात्र जीवन से बाहर निकलने के बाद भाकपा (माले) के कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी काफी कम हो गई। फिर उन्होंने कॉलेज में पढ़ाना शुरू किया, तो राजनीतिक परिदृश्य लगभग नदारद हो गईं। छात्र राजनीति करते हुए उन्होंने नाटकों में हिस्सा लेना शुरू किया और कई नाटकों में महत्वपूर्ण किरदार निभाये तथा अब भी वह सांस्कृतिक संगठन जसम और हिरावल से जुड़ी हुई हैं। लेकिन, भाकपा (माले) के धरना प्रदर्शनों व रैलियों में उनकी मौजूदगी नहीं होती है। पार्टी के अन्य कार्यकर्ता, जो रोजाना सड़कों पर लड़ते-जूझते रहते हैं और जिनकी पकड़ जमीन पर होती है, वैसी पकड़ दिव्या गौतम की नहीं है क्योंकि वे पूर्णकालिक प्रोफेसर हैं। उनके फेसबुक पेज पर भी पार्टी की राजनीतिक गतिविधियों से संबंधित कोई पोस्ट नहीं दिखा।

भाकपा (माले) से जुड़े एक नेता ने कहा, “पार्टी की दैनिक गतिविधियों में उनकी सक्रियता नहीं रही है, लेकिन वह पार्टी के संपर्क में रही हैं। सांस्कृतिक मोर्चों पर रही हैं।”

ऐसे में जब उन्हें दीघा से टिकट दिया गया, तो ये सवाल भी उठने लगे हैं कि क्या पार्टी के पास कोई जमीनी कार्यकर्ता नहीं है कि एक ऐसे व्यक्ति को टिकट दिया जा रहा है, जिसे दीघा विधानसभा में कोई जानता ही नहीं है। इस सवाल पर पार्टी से जुड़े एक नेता ने कहा, “दीघा सीट पर हमलोग महिला उम्मीदवार देते रहे हैं, इसलिए दिव्या गौतम को वहां से टिकट दिया गया है। महिला होने के साथ वह बुद्धिजीवी भी हैं और युवा चेहरा भी।”

दिव्या गौतम की छवि साफसुथरी है। उनके खिलाफ महज सड़कों पर धरना देने, सरकारी आदेशों के उल्लंघन जैसे मामलों में इक्का-दुक्का एफआईआर दर्ज हैं।

15 अक्टूबर को नामांकन पत्र के साथ जमा किये गये एफिडेविट के मुताबिक, विभिन्न बैंक खातों में उनके 15.26 लाख रुपये जमा हैं और वाहन के नाम पर उनके पास एक अदद स्कूटी है, जिसे उन्होंने वर्ष 2012 में ही खरीदी थी। इसके अलावा उनके पास 55 हजार रुपये मूल्य की सोने की एक अंगूठी है।

दीघा सीट

दीघा विधानसभा सीट के अंतर्गत नकटा दियारा ग्राम पंचायत के चार वार्ड, पाटलीपुत्रा हाउसिंग कॉलोनी के वार्ड नंबर 38, दीघा-मनीपुरा (वार्ड नंबर 39), बादलपुरा (वार्ड नंबर 40), सबजपुरा (वार्ड नंबर 41), खलीलपुरा (वार्ड नंबर 42), पटना नगर निगम के कुछ हिस्से भी आते हैं। ये सीट 2008 के परिसीमन में अस्तित्व में आई। यहां लगभग 4.60 लाख वोटर हैं। परिसीमन के बाद इस सीट पर पहला चुनाव साल 2010 में हुआ जिसमें जनता दल यूनाइटेड की पुनम देवी ने जीत हासिल की जबकि दूसरे नंबर पर लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के उम्मीदवार सत्यानंद शर्मा रहे।

साल 2015 के विधानसभा चुनाव में जदयू और राजद ने साथ चुनाव लड़ा व ये सीट जदयू के खाते में गई, लेकिन उक्त चुनाव में जदयू के राजीव रंजन प्रसाद को भाजपा उम्मीदवार संजीव चौरसिया से करारी हार मिली। साल 2020 का विधानसभा चुनाव जदयू ने भाजपा के साथ मिलकर लड़ा, लेकिन इस चुनाव में दीघा सीट भाजपा के खाते में गई। भाजपा उम्मीदवार संजीव चौरसिया ने दूसरी बार यहां से जीत दर्ज की। महागठबंधन में यह सीट भाकपा (माले) को मिली, तो पार्टी ने जुझारू नेता शशि यादव चुनाव लड़ाया। वह इस चुनाव में दूसरे स्थान पर रहीं। शशि यादव फिलहाल विधान पार्षद हैं, इसलिए उनकी जगह भाकपा (माले) ने किसी महिला को उतारने का फैसला लिया और इस तरह दिव्या गौतम चुनावी परिदृश्य में आ गईं।

दीघा विधानसभा क्षेत्र में कुर्मियों की ठीकठाक आबादी है, ऐसे में इस समाज से किसी नेता को टिकट देना भाकपा (माले) के लिए फायदेमंद हो सकता था। लेकिन, पार्टी ने दिव्या गौतम को टिकट दिया है, जो जाति से राजपूत हैं, जो आबादी के लिहाज से काफी कम मगर बेहद प्रभावशाली है।

इधर, जनसुराज पार्टी ने भी राजपूत जाति से आने वाले समाजसेवी बिट्टू सिंह को मैदान में उतारा है, जिस वजह से अपर कास्ट वोटों में बिखराव का अनुमान है। इसका सीधा फायदा भाजपा को होगा। चूंकि दीघा विधानसभा क्षेत्र में राष्ट्रीय जनता दल (राजद), कांग्रेस जैसे महागठबंधन के घटक दलों ने कभी कैडर बनाने की कोशिश नहीं की, तो भाकपा (माले) को यहां अकेले लड़ना है, इसलिए भी दिव्या गौतम के लिए जीत की राह बेहद मुश्किल होगी।

वहीं, भाजपा इस बार भी संजीव चौरसिया को ही टिकट देने जा रही है, जो लगातार दो बार जीत चुके हैं। दीघा विधानसभा क्षेत्र भाजपा का मजबूत किला है, यही वजह है कि राजद के जमीनी प्रयास के बावजूद साल 2020 के चुनाव में भाकपा (माले) की जुझारू नेता शशि यादव को कुल 51,084 वोट ही मिले थे। भाजपा ने उन्हें लगभग 46 हजार वोटों के बड़े अंतर से हराया था। अब देखना ये है कि भाकपा (माले) का नया चेहरा इस सीट पर भाजपा को कितनी चुनौती देता है।

भाकपा (माले) और महिला प्रत्याशी

विधानसभा चुनावों में भाकपा (माले), महिलाओं को टिकट देता रहा है, लेकिन कभी भी कोई महिला नेता जीत नहीं पायी है। साल 2005 के विधानसभा चुनाव में भाकपा (माले) ने सात महिलाओं को टिकट दिया था। वहीं, साल 2010 के विधानसभा चुनाव में कम से कम पांच सीटों पर महिला उम्मीदवारों को उतारा था। इसी तरह साल 2015 के विधानसभा चुनाव में भी सात महिलाओं को टिकट दिया था, लेकिन साल 2020 के विधानसभा चुनाव में महज एक महिला को टिकट मिला था। लेकिन कोई भी महिला जीत नहीं सकी। पार्टी झारखंड में भी चुनाव लड़ती है, लेकिन झारखंड में भी कोई महिला उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत सकी है।

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Umesh Kumar Ray started journalism from Kolkata and later came to Patna via Delhi. He received a fellowship from National Foundation for India in 2019 to study the effects of climate change in the Sundarbans. He has bylines in Down To Earth, Newslaundry, The Wire, The Quint, Caravan, Newsclick, Outlook Magazine, Gaon Connection, Madhyamam, BOOMLive, India Spend, EPW etc.

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