भोजपुर से होकर बहने वाली सोन नदी आज अपने ऐतिहासिक स्वरूप और अस्तित्व के सबसे बड़े संकट का सामना कर रही है। अनियंत्रित मानवजनित गतिविधियों तथा विश्वव्यापी जलवायु परिवर्तन के चलते नदी की चौड़ाई घट गई है, जैव विविधता चरमरा गई है और भोजपुर क्षेत्र की कृषि अर्थव्यवस्था तथा मछली पकड़ने पर निर्भर आजीविका पूरी तरह से खतरे में पड़ गई हैं।
सोन नदी का इतिहास भारतीय उपमहाद्वीप में मानव सभ्यता जितना ही पुराना है। यह नदी धार्मिक और ऐतिहासिक ग्रंथों में सोनभद्र शिला और हिरण्यवाह के रूप में प्रतिष्ठित है, जिसका नामकरण संभवतः इसके तट पर पाई जाने वाली चमकीली, पीली (स्वर्ण) रेत के कारण हुआ।
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यह नदी मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में अमरकंटक पहाड़ी के पास सोनकुंड से निकलती है, जो नर्मदा नदी के उद्गम स्थल के पूर्व में स्थित है। सोन नदी छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखंड और बिहार राज्यों से होकर बहती है, और पटना के समीप गंगा नदी में समाहित हो जाती है। भूवैज्ञानिक रूप से, इसकी निचली घाटी को नर्मदा-सोन भ्रंश घाटी का एक महत्वपूर्ण विस्तार माना जाता है।
सिंचाई पर असर, मछलियां भी घटीं
सोन नदी किनारे बसे स्थानीय निवासियों के अनुभव इस बात की पुष्टि करते हैं कि अतीत में सोन नदी अपने विशाल आकार और जल की प्रचुरता के लिए प्रसिद्ध थी। बिहार के भोजपुर जिले के बड़हरा प्रखंड स्थित सोन नदी के किनारे स्थित फूंहा गाँव के 50 वर्षीय निवासी रामबली सिंह बताते हैं कि पहले सोन नदी की चौड़ाई 5 किलोमीटर तक फैली होती थी और यह एक समृद्ध जलीय आवास थी, जहाँ डॉल्फिन जैसे महत्वपूर्ण और सोनबचवा जैसी स्थानीय मछलियों की प्रजातियाँ बहुतायत में पाई जाती थीं। लेकिन आज, सोन नदी के जल विज्ञान और स्वरूप में विनाशकारी बदलाव आए हैं जिसके लिए मुख्य रुप से मानवजनित गतिविधियाँ जिम्मेदार हैं।
स्थानीय किसानों और विशेषज्ञों का मानना है कि अवैध बालू खनन इस क्षेत्र के पर्यावरणीय पतन में एक प्रमुख भूमिका निभा रहा है। सोन में पाये जाने वाली पीली रेत के खनन के कारण नदी तल का अत्यधिक गहरा होना तटवर्ती क्षेत्रों में भूजल स्तर को अप्रत्याशित रूप से नीचे खींच रहा है।
भोजपुर खनन विभाग की ताजा रिपोर्ट बताती है कि नदी सप्त बेतहाशा रेत खनन हो रहा है। पिछले एक साल में 77,361 क्यूबिक फीट बालू की जब्ती हुई है।
फूंहा निवासी 45 वर्षीय किसान मुन्ना सिंह के बयान इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। वह कहते हैं, “जहाँ पहले फसलों की सिंचाई के लिए पानी 2 से 5 फीट की उथली गहराई पर मिलता था, वहीं अब स्थिति यह है कि 40 से 50 फीट की गहराई पर भी पानी मिलना दुर्लभ हो गया है।” इस गंभीर जलस्तर गिरावट की बात के बीच स्थानीय किसान रामबली सिंह कहते हैं कि पहले सोन नदी किनारे गेहूँ, गन्ना, परवल, और भिंडी जैसी प्रमुख सब्जियों की खेती बड़े जोर-शोर से होती थी, लेकिन हाल के दिनों में ये लगभग असंभव सा हो गया है और स्थानीय किसान इन फसलों की खेती अब नहीं कर पा रहे हैं।
एक अन्य किसान 30 वर्षीय अमित सिंह बताते हैं कि भूजल स्रोतों (बोरिंग) के निष्क्रिय होने के कारण उन्हें नदी से मोटर और लंबे पाइपों के माध्यम से पानी लाकर सिंचाई करनी पड़ रही है, जो अत्यधिक खर्चीली प्रक्रिया है और खेती की लागत को बढ़ा देती है।
वर्षों से सोन नदी में मछली मारकर अपनी आजीविका चलाने वाले स्थानीय मछुआरा झाबड़ बिंद बताते हैं कि पहले सोन में रोहू, फरहा, नैनी, टेंगड़ा, बरारी और सोनबचवा जैसी मछलियां आसानी से मिल जाती थीं लेकिन आज हालत ये है कि इनमें से अधिकतर मछलियां पूरी तरह विलुप्त हो चुकी हैं।
स्थानीय मछुआरा 60 वर्षीय भगवत बिंद कहते हैं, सोन नदी में कभी – कभार सोन बचवा मछली मिलती भी है तो काफी कम मात्रा में, जिससे अब उन्हें और स्थानीय मछुआरों को अपनी आजीविका चलाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
शोध ने भी की प्रदूषण की पुष्टि
सोन नदी के स्वरूप में हो रहे परिवर्तन और नदी की जैव विविधता पर रिसर्च कर चुकी आऱा के महाराजा कॉलेज की प्रोफेसर सुनीता कुमारी ने अपने अध्ययन में पाया कि खनन से उत्पन्न अवसादन सोन नदी के पानी की पारदर्शिता को कम कर रहा है, प्रकाश संश्लेषण को बाधित कर रहा है और नदी के तल पर रहने वाले जलीय जीवों (ऑस्ट्राकोड और बेंथिक कोपेपॉड) के प्राकृतिक आवास को भौतिक रूप से नष्ट कर रहा है।
प्रोफेसर सुनीता कुमारी ने साल 2019 में सोन नदी का ज़ूप्लैंकटन (सूक्ष्म जलीय जीव) अध्ययन किया है। जूप्लैंकटन जैव-संकेतक के रूप में कार्य करते हैं और नदी के जल की गुणवत्ता और पोषण स्थिति को दर्शाते हैं। अध्ययन में सोन नदी के ज़ूप्लैंकटन समुदाय में चार प्रमुख समूहों की लगभग 21 प्रजातियाँ पाई गईं। रिसर्च के दौरान उन्होंने पाया कि सोन नदी के जल में मिले जूप्लैंकटन के इन समूहों की वजह से नदी की जैवविविधता बर्बाद हो रही है। इन समूहों में रोटिफ़र की 11 प्रजातियाँ, क्लैडोसेरन की 7 प्रजातियाँ, कोपेपॉड की 5 प्रजातियाँ और ऑस्ट्राकोड की 3 प्रजातियाँ मिलीं जिनके विश्लेषण से पता चला कि नदी में मध्यम पोषक तत्व हैं।
रिसर्च के दौरान मिले सूचकांकों से पता चलता है कि नदी में प्रजातियों की समृद्ध विविधता है (उच्च डोमिनेंस इंडेक्स 0.95 तक), हालांकि यह विविधता अब खतरे में है। शोध का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह था कि सभी नमूना स्थलों पर रोटिफ़र प्रजातियों की प्रधानता थी। रिसर्च के बाद प्रोफेसर सुनीता कुमारी ने निष्कर्ष निकाला कि रोटिफ़र का यह प्रभुत्व नदी के स्वास्थ्य की अर्ध-प्रदूषित स्थिति का सीधा प्रमाण है, जो सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट से उत्पन्न उच्च कार्बनिक प्रदूषण के कारण है।
प्रदूषण-सहिष्णु रोटिफ़र की वृद्धि के विपरीत, क्लैडोसेरन और अन्य संवेदनशील ज़ूप्लैंकटन तथा उच्च पोषण स्तर की मछलियाँ (रोहू, फरहा, टेंगड़ा) विलुप्त हो रही हैं। यह असंतुलन पूरी खाद्य श्रृंखला को अस्थिर कर रहा है, जैसा कि मछुआरों के बयान से स्पष्ट है। नदी में प्रदूषण की ये स्थिति जलवायु परिवर्तन के कारण और अधिक गंभीर होती जा रही है।
प्रोफेसर सुनीता कुमारी ने स्पष्ट किया कि जलवायु परिवर्तन एक उत्प्रेरक के रूप में कार्य कर रहा है, जो मानवजनित प्रदूषण के प्रभावों को कई गुना बढ़ा रहा है। वह बताती हैं कि भीषण गर्मी (उच्च तापमान) नदी के पानी को गर्म करती है, जिससे पानी में घुली हुई ऑक्सीजन की धारण क्षमता कम हो जाती है। ऑक्सीजन की कमी सीधे तौर पर मछलियों और अन्य संवेदनशील जलीय जीवों की मृत्यु दर बढ़ाती है जिससे धीरे-धीरे विभिन्न मछलियां और अन्य जलीय जीव सोन से विलुप्त होते जा रहे हैं। वहीं अनियमित वर्षा और बढ़ते तापमान के कारण कम जल प्रवाह होता है। कम प्रवाह के कारण, नदी में आने वाले प्रदूषक पतले नहीं हो पाते, जिससे उनकी सांद्रता खतरनाक स्तर तक बढ़ जाती है। लगातार बढते तापमान और प्रवाह के चक्रों में बदलाव मछलियों और जलीय कीटों के प्रजनन समय को बाधित करता है, जिससे उनकी अगली पीढ़ियों की संख्या घट जाती है।
क्या कहते हैं अधिकारी
इस संबंध में जब भोजपुर जिला वन प्रमंडल पदाधिकारी सह जलवायु परिवर्तन के नोडल (नोडल ऑफिसर), प्रद्युमन गौरव से संपर्क किया गया, तो उन्होंने भी नदी के बिगड़ते स्वास्थ्य पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने स्वीकार किया कि इस समस्या की व्यापकता के बावजूद, विभाग द्वारा सोन नदी का कोई वैज्ञानिक सर्वे अब तक नहीं कराया गया है।
नोडल पदाधिकारी ने इस गंभीर चूक को स्वीकार करते हुए तत्काल कार्रवाई का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा, “हम जल्द ही इस पूरे मामले को लेकर विभाग को अवगत कराएंगे और आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने की दिशा में कदम बढ़ाएँगे।”
(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)
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