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बदलते मौसम और सड़ते मुनाफे के बीच पिसते भागलपुर के केला किसान

कभी अत्यधिक उत्पादन तो कभी जलवायु परिवर्तन के चलते उत्पादन पर भारी असर ने केला किसानों को दोराहे पर खड़ा कर दिया।

uddeshya thakur Reported By Uddeshya Thakur |
Published On :
bhagalpur's banana farmers struggle amid changing weather and declining profits
भागलपुर के नवगछिया में मीलों तक फैली केले की फसल, जो सरकारी उपेक्षा के बीच अपनी पहचान तलाश रही है

बिहार: भागलपुर के नवगछिया में जब आप खरीक या परवत्ता के मुख्य मार्गों से गुजरते हैं, तो सड़क की दोनों ओर मीलों तक फैले केले के बागान एक समृद्ध कृषि बेल्ट का अहसास कराते हैं। लेकिन अगर आप थोड़ा करीब जाकर रुकें, तो आपको वह सड़न भी महससू होगी जो खेतों के किनारे फेंके गए उन केलों से उठ रही है जिन्हें खरीदार नहीं मिले। यह सड़न सिर्फ फल की नहीं है, बल्कि उन वादों की भी है जो हर साल चुनावी रैलियों में ‘केलांचल’ को औद्योगिक हब बनाने के लिए किए जाते हैं।


कभी अत्यधिक उत्पादन तो कभी जलवायु परिवर्तन के चलते उत्पादन पर भारी असर ने केला किसानों को दोराहे पर खड़ा कर दिया।

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भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और राष्ट्रीय केला अनुसंधान केंद्र की विभिन्न रिपोर्ट्स बताती हैं कि बढ़ता तापमान केले की फसल के लिए ‘साइलेंट किलर’ है। नवगछिया में पिछले कुछ सालों में मार्च-अप्रैल में चलने वाली ‘लू’ और अनियमित बारिश ने ‘पनामा विल्ट’ (फुसैरियम विल्ट) जैसी बीमारियों को केले के लिए घातक बना दिया है।


भागलपुर के कृषि विज्ञान केंद्र की वैज्ञानिक डॉ. ममता कुमारी बताती हैं, “मिट्टी के बढ़ते तापमान और नमी में असंतुलन के कारण फंगल इन्फेक्शन तेजी से फैल रहा है। किसान फसल बचाने के लिए अब पहले के मुकाबले 40% ज़्यादा कीटनाशक और फर्टिलाइजर का प्रयोग कर रहे हैं। इससे न केवल खेती की लागत बढ़ गई है, बल्कि जमीन की उपजाऊ शक्ति और फल की ‘शेल्फ-लाइफ’ (ताजगी) भी कम हो रही है।”

55 वर्षीय केला किसान सुबोध मंडल कहते हैं, “हम लोग पिछले 4-5 सालों से अपने खेत में मौसम की बेरुखी भुगत रहे हैं। पहले मार्च के महीने में इतनी गर्मी नहीं होती थी, लेकिन अब मार्च से ही ऐसी ‘लू’ चलती है कि केले के पत्ते जलने लगते हैं। ऊपर से बेमौसम बारिश ने पनामा विल्ट को इतना बढ़ा दिया है। जहाँ पहले एक बार दवाई छिड़कने से काम चल जाता था, अब तीन-तीन बार छिड़कना पड़ता है। लागत दोगुनी हो गई है लेकिन गर्मी की वजह से केले का साइज छोटा रह जाता है, जिससे मंडी में हमें सही दाम नहीं मिलता।”

sometimes excessive production and sometimes the huge impact on production due to climate change has put banana farmers at a crossroads

बम्पर पैदावार: वरदान या अभिशाप?

केला किसानों के सामने दिक्कत केवल मौसम की नहीं है। अगर मौसम साथ देता है तो केले का उत्पादन बम्पर होता है, लेकिन बम्पर उत्पादन भी उनके लिए समस्या बन जाती है।

गौरतलब हो कि बिहार सरकार राज्य में केला उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कई तरह की स्कीमें चला रही है। केला उत्पादन को बढ़ाने के लिए बिहार सरकार ने टिश्यू कल्चर तकनीक पर भी ज़ोर दिया और कई नए प्रभेद तैयार किये जो उच्च उत्पादकता देते हैं। इसका असर ज़मीन पर दिख भी रहा है।

आंकड़े बताते हैं कि साल 2004-2005 में राज्य में केला उत्पादन महज 5.45 लाख मीट्रिक टन था, जो साल 2022-2023 में बढ़कर 19.68 लाख मीट्रिक टन हो गया, जो लगभग चार गुना अधिक है।

आंकड़ों से ये भी पता चलता है कि साल 2004-2005 में महज 27200 हेक्टेयर खेत में केले की खेती की जाती थी, जो साल 2022-2023 में बढ़कर 42900 हेक्टेयर हो गई। प्रति हेक्टेयर उत्पादकता में भी इजाफा हुआ है। पहले एक हेक्टेयर में 20 मीट्रिक टन केले का उत्पादन होता था, जो अब बढ़कर 45 मीट्रिक टन हो गया है।

वहीं, नवगछिया की बात करें, तो यहां सालाना करीब 4 लाख मीट्रिक टन केले का उत्पादन होता है। यहां की मिट्टी ‘जी-9’ और ‘कैवेंडिश’ जैसी केला किस्मों के लिए वरदान है, लेकिन यहां के किसान आज भी बिचौलियों के रहम-ओ-करम पर हैं। चूंकि केला एक जल्द खराब होने वाला फल है, इसलिए इसे तुरंत बाजार की जरूरत होती है। लेकिन इलाके में आधुनिक कोल्ड स्टोरेज न होने के कारण बिचौलिए सिंडिकेट बनाकर दाम गिरा देते हैं। यही वजह है कि 70 वर्षीय बुजुर्ग किसान अशोक भगत की आंखों में मायूसी झलकती है। वह कहते हैं, “हम सत्तर साल से इसी मिट्टी में केला रोप रहे हैं। पहले बाढ़ से डर लगता था, अब बम्पर पैदावार से डर लगता है। जब खेत में केला ज्यादा होता है, तो मंडी में दाम गिर जाता है। पिछली बार तो इतना कम भाव मिला कि फसल काटकर मंडी तक ले जाने का भाड़ा भी जेब से भरना पड़ा। तब लगा कि इसे सड़कों पर ही फेंक देना बेहतर है।”

ashok bhagat, a 60 year old farmer, depends on middlemen for a fair price for his produce
60 वर्षीय किसान अशोक भगत अपनी फसल के वाजिब दाम के लिए बिचौलियों पर निर्भर हैं

एक अनुमान के मुताबिक, पनामा विल्ट और लू के कारण 15-20% फसल का नुकसान होता है जबकि प्रोसेसिंग यूनिट नहीं होने के कारण कुल उपज का 20% से 25% हिस्सा खराब हो जाता है।

स्थानीय किसानों का कहना है कि नवगछिया की तरह ही महाराष्ट्र का जलगांव भी केला उत्पादन में अग्रणी है, लेकिन जलगांव की तरह यहां के किसानों को सरकारी सहूलियत नहीं मिलती है। जलगांव में किसानों के पास न केवल बेहतर कोल्ड स्टोरेज चेन है, बल्कि वहां बड़ी तादाद में ‘फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स’ और ‘बनाना पल्प’ फैक्ट्रियां भी हैं। वहां के किसान अपनी फसल का मूल्य संवर्धन कर उसे अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचा रहे हैं। इसके उलट, नवगछिया में इस तरह के बुनियादी ढांचे का अभाव है।

सरकारी अधिकारी कोल्ड स्टोरेज जैसी सुविधाओं की कमी को स्वीकार करते हैं।

नवगछिया के अनुमंडल कृषि पदाधिकारी वरुण कुमार ने कहा, “कोल्ड चेन और बड़े स्तर पर प्रोसेसिंग हब की कमी एक बड़ी चुनौती है। कोल्ड स्टोरेज और बड़ी यूनिट्स के लिए निजी निवेशकों को आमंत्रित किया जा रहा है।”

“सरकार सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना के तहत केले के मूल्य संवर्धन पर जोर दे रही है। इसके तहत उद्यमियों को 35% तक की क्रेडिट-लिंक्ड सब्सिडी (अधिकतम 10 लाख रुपये तक) का लाभ देने की प्रक्रिया शुरू की गई है,” उन्होंने कहा।

कचरा प्रबंधन: एक अधूरा सपना

कृषि विशषेज्ञों का मानना है कि ‘वेस्ट टू वेल्थ’ का मॉडल नवगछिया का भाग्य बदल सकता है क्योंकि इससे वैकल्पिक आय का रास्ता खुलेगा। केले का तना ‘बनाना फाइबर’ का बेहतरीन स्त्रोत है। 30 वर्षीय युवा स्नातक प्रियांशु कुमार बताते हैं, “मैंने पढ़ा है कि केले के तने से रेशा निकाल कर लाखों कमाए जा सकते हैं। हमारे यहां रॉ-मटेरियल की कोई कमी नहीं है। बस कमी है तो एक छोटी सी मशीन और ट्रेनिंग की। अगर सरकार हमें मदद दे, तो नवगछिया का युवा दिल्ली-मुंबई जाकर मजदूरी करने के बजाय यहीं फैक्ट्रियां लगा सकता है।”

banana stems discarded in fields hold immense potential for making 'banana fibre'
खेतों में बेकार फेंके गए केले के तने, जिनसे ‘बनाना फाइबर’ बनाने की अपार संभावनाएं मौजूद हैं

कृषि विज्ञान केंद्र (भागलपुर) की वैज्ञानिक डॉ. ममता कुमारी बताती हैं, “केले के तने से रेशा निकालने के अलावा, हम किसानों को केले के फूल से अचार और कच्चे केले से आटा बनाने की ट्रेनिंग दे रहे हैं। यदि यहां क्लस्टर स्तर पर ‘स्माल स्केल प्रोसेसिंग यूनिट’ लगे, तो फसल कटाई के बाद होने वाले 25% नुकसान को शून्य पर लाया जा सकता है और किसानों की आय में 40% तक की वृद्धि हो सकती है।”

(This story was produced with support from the Earth Journalism Network.)

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उद्देश्य ठाकुर एक उभरते हुए स्वतंत्र पत्रकार हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) से स्नातक और भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) से पीजी डिप्लोमा करने वाले उद्देश्य, बिहार के सुदूर इलाकों से 'हाशिए की कहानियों' को मुख्यधारा की चर्चा में लाने का प्रयास कर रहे हैं। वर्तमान में वे ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर और क्लाइमेट चेंज के किसानों पर प्रभाव को कवर कर रहे हैं।

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