बेहबुलडांगी, बिहार के किशनगंज जिले का वह गांव जहां आज़ादी से पहले एक भव्य एस्टेट हुआ करता था। ठाकुरगंज प्रखंड की कनकपुर पंचायत का यह गांव कभी जमींदारी प्रथा और एस्टेट की शान-ओ-शौकत से लबरेज़ था। बेहबुलडांगी में पुरानी ज़मींदारी की कुछ निशानियां आज भी मौजूद हैं।
ठाकुरगंज मुख्यालय से करीब 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बेहबुलडांगी गांव में डेढ़ सौ वर्ष पुरानी इमारतें आज भी मौजूद हैं। बेहबुलडांगी एस्टेट अपने समय शिक्षा के मैदान में भागीदारी के लिए भी काफी मशहूर था। एस्टेट का इतिहास जानने हम पहुंचे बेहबुलडांगी, जहां हमारी मुलाकात बेहबुलडांगी एस्टेट के जमींदारों के वंशज मोहम्मद मंज़ूरुल हक़ से हुई।
Also Read Story
मंज़ूरुल हक़ ने बताया कि बेहबुलडांगी एस्टेट की शुरुआत भींकू मियां नामक एक जमींदार ने की थी। वह कहां से आये थे इसकी अधिक जानकारी नहीं है। भींकू मियां के छह बेटे थे और उन्होंने ही बेहबुलडांगी में जमींदारी की शुरुआत की। एस्टेट की जागीरदारी पूर्णिया के राजा पीसी लाल के अधीन थी।
पुरानी इमारतें देती हैं इतिहास की गवाही
बेहबुलडांगी एस्टेट की निशानी के तौर पर कुछ पुरानी इमारतें आज भी इस छोटे से गांव में मौजूद हैं। स्थानीय लोगों ने बताया कि एस्टेट की पहली इमारत 19वीं सदी की आखिरी दहाइयों में बनाई गई थी। जर्जर हो चुकी इस इमारत को इंडो-ईरानी वास्तुकला की निशानी के तौर पर देखा जा सकता है। पतली ईंटें, सुर्खी-चूने की मोटी दीवारें और मुख्य द्वार के ऊपर गुंबदनुमा छोटी मीनारें किशनगंज की खगड़ा नवाब कोठी या पनासी एस्टेट की कोठी से काफी मिलती जुलती हैं।
इस जर्जर हो चुकी इमारत के पास दो और पुराने मकान हैं, जो 1910 के आसपास बनाये गए थे। इन घरों में जमींदार बहादुर हुसैन और बशीरुद्दीन का परिवार रहता था। इससे चंद गज़ के फासले पर लाल ईंट से बनी एक और पुरानी इमारत है, जो पश्चिम सरकार के नाम से मशहूर थी। आज यहां एस्टेट संस्थापक भींकू मियां के वंशजों में से एक बहबूद हुसैन का परिवार रहता है।
सबसे पहले बनने वाली इमारत अब पूरी तरह से जर्जर हो चुकी है। वहां सालों से कोई नहीं रहता, जबकि बाकी तीनों इमारतों में आज भी एस्टेट के जमींदारों के वंशज जिंदगी बसर कर रहे हैं।
पुरानी यादों के तौर पर हमें पास में ही लकड़ी का एक ढांचा दिखा जो धीरे धीरे जमीन में धंस रहा है। लकड़ी से बना यह दो मंज़िला मकान करीब एक सदी पूर्व एस्टेट के मेहमानों के लिए बनाया गया था। इस मकान के लिए शीशे और नक्काशी किये हुए दरवाज़े बाहर से मंगवाए गए थे और इसे मेहमानख़ाना या बैठक कहा जाता था जिसे ज़मींदार बहादुर हुसैन ने 1933 में बनवाया था।
“यह बैठक हुआ करता था। यहां जनता की बात सुनी जाती थी और एस्टेट में पढ़ाने वाले शिक्षक भी इसी में रहते थे। जमींदारी से जुड़े हिसाब किताब का काम भी इस बैठक में होता था। एस्टेट के जमाने में बहुत शान-ओ-शौकत थी, काफी नौकर-चाकर हुआ करते थे। पूर्णिया के राजा पीसी लाल, चुरली एस्टेट और पनासी एस्टेट वाले भी सब आते थे यहां,” ज़मींदार बहादुर हुसैन के परपोते शाहरूख़ अल्तमश ने हमें बताया।
बेहबुलडांगी में एक पुरानी जामा मस्जिद हुआ करती थी जो समय के साथ जर्जर हो गई। 2014 में एस्टेट की उसी जगह एक नई मस्जिद का निर्माण कराया गया। पुरानी मस्जिद डेढ़ सौ वर्ष पुरानी थी जिसका नक्शा मुग़ल शासन में बनी अधिकतर मस्जिदों जैसा था। पुरानी जामा मस्जिद आकार में छोटी थी, गांव में बढ़ती आबादी के कारण जगह की कमी होने लगी थी इसीलिए बड़े आकार की नई मस्जिद बनाई गई।

शाहरूख़ अलतमश ने बताया कि नई मस्जिद के निर्माण के समय लोगों को एक ईंट मिली, जिसमें संभवतः कैथी लिपि में मस्जिद की स्थापना तारीख लिखी थी। जानकारों से पता करने पर मालूम हुआ कि मस्जिद 1880 में बनाई गई थी। मस्जिद की चारों तरफ एस्टेट के लोगों की कब्रें मौजूद हैं।
मस्जिद के पास एक पुराना कुआं है जहां नमाज़ से पहले लोग वज़ू किया करते थे। ज़मींदारों ने इसके अलावा और भी कई कुएं खुदवाए थे जो घर वालों के साथ साथ आमलोगों के काम में आते थे।
बेहबुलडांगी एस्टेट का इतिहास
69 वर्षीय मंज़ूरुल हक़ बेहबुलडांगी एस्टेट के संस्थापक भींकू मियां की पांचवीं पीढ़ी हैं। भींकू मियां ने अंग्रजी शासनकाल में बेहबुलडांगी एस्टेट की शुरुआत की। उनके छह बेटों में उमर अली, यक़ीन अली, ईमान अली और ख़ुर्दम अली के नाम प्रचलित है। ख़ुर्दम अली के तीन बेटे एमाज़ुद्दीन, बहादुर हुसैन और बशीरुद्दीन हुए। उनके दौर में बेहबुलडांगी एस्टेट का विस्तार हुआ और एस्टेट अपने उत्थान तक पहुंचा। इनमें से बहादुर हुसैन और बशीरुद्दीन ने ज़मींदारी के विस्तार में बड़ा किरदार निभाया।
“मेरे दादा बहादुर हुसैन की शख्सियत इलाके में काफी मशहूर थी। दूरदराज़ के लोग भी उनका काफी सम्मान करते थे। अंग्रेजी शासन में एक प्रखंड में एक यूनियन बोर्ड अध्यक्ष और एक डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के अध्यक्ष होते थे। मेरे दादा बहादुर हुसैन डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के चेयरमैन थे और उनके छोटे भाई बशीरुद्दीन यूनियन बोर्ड के चेयरमैन थे,” मंज़ूरुल हक़ बोले।
वह आगे कहते हैं, “डिस्ट्रिक्ट बोर्ड अध्यक्ष का काम होता था सड़क, कुआं और बाकी विकास कार्य करना। यूनियन बोर्ड के अध्यक्ष के माध्यम से अंग्रेजी शासन के अधिकारियों, शिक्षकों और बाकी कर्मचारियों का वेतन भुगतान किया जाता था। हम बचपन में वो सब कागज़ देखे हैं। बैठक में बहुत सारे ऐसे कागज़ात रखे हुए थे।”
बेहबुलडांगी एस्टेट के बारे में मशहूर है कि वहां चार हाथी और एक शेर थे। एस्टेट के ज़मींदार इन जानवरों को पालते। इन जानवरों को एस्टेट के प्रभुत्व की निशानी के तौर देखा जाता रहा।

शिक्षा के क्षेत्र में एस्टेट की भूमिका
बेहबुलडांगी एस्टेट ने शिक्षा के मैदान में अहम योगदान दिया। एस्टेट ने स्कूल, कॉलेज और मदरसे के लिए जमीनें दान कीं। सन् 1932 में बेहबुलडांगी मध्य विद्यालय की स्थापना की गई, जिसके लिए एस्टेट ने ज़मीन दी। यह जिले के सबसे पुराने स्कूलों में से एक है। एस्टेट की दान की हुई जमीन पर आज मध्य विद्यालय के साथ साथ और उच्चतर माध्यमिक विद्यालय भी मौजूद है।
बेहबुलडांगी एस्टेट वालों ने एमएच आज़ाद नेशनल इंटर कॉलेज और एमएच आज़ाद नेशनल डिग्री कॉलेज के लिए भी जमीन दान की थी। इस बारे में शाहरूख़ अल्तमश कहते हैं, “बेहबुलडांगी स्कूल के लिए एस्टेट ने ज़मीन दी। यहां की बैठक में स्कूल और एमएच आज़ाद कॉलेज के शिक्षक भी रहते थे। उस ज़माने में मोहम्मद हुसैन आज़ाद साहब विधायक और मंत्री थे। उन्होंने कोशिश की तो उनके नाम से कॉलेज की बुनियाद रखी गई। जहां कॉलेज है उसे बशीरनगर कहते हैं, वो मेरे परदादा बशीरुद्दीन के नाम पर है। बशीरुद्दीन साहब आज़ाद साहब के खालू थे।”
इस पर शाहरूख के पिता मंज़ूरुल हक़ कहते हैं, “आज़ाद साहब यहां परवरिश पाए, यहां रहे और यहीं से विधायक भी बने। वह जब भी चुनाव लड़े, यहीं उनका कैंप रहता था और सारा काम बेहबुलडांगी से ही होता था।”

बता दें कि मोहम्मद हुसैन आज़ाद 1962 में पहली बार किशनगंज से विधानसभा चुनाव जीते। इसके बाद पांच बार ठाकुरगंज से विधायक चुने गए। साल 1967,1969 और 1972 में वह लगातार विधायक रहे। 1977 में उनकी हार हुई जबकि 1980 और 1985 में वह फिर से लगातार दो बार विधायक बने। कई बार कैबिनेट मंत्री रहे मोहम्मद हुसैन आज़ाद ने 1990 में आखिरी बार ठाकुरगंज से चुनाव लड़ा, जिनमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा। बाद में उनके बेटे डॉ. मोहम्मद जावेद ठाकुरगंज, फिर किशनगंज विधानसभा क्षेत्रों के विधायक बने। फिलहाल वो किशनगंज से सांसद हैं।
पेशे से शिक्षक शाहरूख अल्तमश ने कहा कि बेहबुलडांगी एस्टेट के परिवारों के अलावा बाहर के लोग भी एस्टेट में रहकर पढ़ते थे। बेहबुलडांगी में पढ़ाई का अच्छा माहौल था। एस्टेट में बनी बैठक में कॉलेज के शिक्षक रहा करते थे, जहां किताबें रखी थीं। गाहे-ब-गाहे कई विद्यार्थी वहां अध्ययन करने आते थे।
“एस्टेट के कई लोग वकील, प्रोफेसर, डॉक्टर, इंजीनियर बने। पूरे ठाकुरगंज में इस गांव को शिक्षा के मामले में आदर्श माना जाता है। यहां एमए, एमएससी मिलेंगे। स्नातक तो यहां आम है। किसी गांव में इतना मेट्रिक पास नहीं मिलेगा जितना यहां स्नातक हैं। यहां के बच्चे देश के बड़े बड़े शिक्षा संस्थानों से पढ़े हैं और पढ़ रहे हैं,” शाहरूख़ ने कहा।
कैसे याद रखा जाएगा बेहबुलडांगी एस्टेट
बेहबुलडांगी एस्टेट को इतिहास के पन्नों में जगह नहीं मिल सकी। एस्टेट के ज़मींदारों ने शिक्षा संस्थान, हाट, कब्रिस्तान और ईदगाहों के लिए ज़मीनें दान कीं। कहा जाता है कि बेहबुलडांगी एस्टेट की ज़मींदारी बंगाल की सीमा तक फैली थी।
“हमारी ज़मीनें बहुत दूर-दूर तक फैली थीं। बंगाल बॉर्डर से लेकर चुरली तक, वहां डीमहाट एक जगह है, वहां आज भी हमारी ज़मीन है। ठाकुरगंज बाज़ार में आधी से अधिक जमीनें बेहबुलडांगी एस्टेट की थीं। एस्टेट वालों ने कई गांव बसाये। लोगों को ज़मीन दान की, खासकर एस्टेट के खादिमों को दान की,” ज़मींदार बहादुर हुसैन के पोते मंज़ूरुल हक़ बोले।
बेहबुलडांगी एस्टेट आज़ादी के बाद ज़मींदारी प्रथा ख़त्म होने पर अपना रसूख़ खो बैठा। पुरानी इमारतों में आज भी ज़मींदारों के कुछ वंशज रहते हैं और कई लोग सालों पहले दूसरे शहरों में जाकर बस गए। जो गांव में रहे, उनमें से अधिकतर नौकरी के पेशे में आये और अपनी ज़मीनों को खेती के लिए लीज़ पर दे दिया। आज बेहबुलडांगी में सबसे अधिक अनानास की खेती होती है।
एस्टेट के संस्थापक भींकू मियां की छठी पीढ़ी शाहरूख़ अल्तमश को बेहबुलडांगी एस्टेट से जुड़े कागज़ात और दूसरी चीज़ें जमा करने का शौक है। वह एस्टेट के इतिहास पर एक पुस्तक पर काम भी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि बेहबुलडांगी के इतिहास के बारे में बहुत कुछ नहीं लिखा जा सका है जिसके कारण उन्हें अनुसंधान में दिक्कतें भी आती हैं। शाहरूख़ ने हमें 1952 में उनके दादा कमरूज़्ज़मां और पनासी एस्टेट की शहर बानो से हुई शादी का कार्ड भी दिखाया।
शाहरूख चाहते हैं कि अगली पीढ़ी एस्टेट के इतिहास के बारे में जाने। हालांकि वह बेहबुलडांगी एस्टेट के नाम को ‘ढोना’ नहीं चाहते। “अब एस्टेट का नाम नहीं रहा। आज़ादी के बाद जब जमींदारी प्रथा ख़त्म हो गई तो इस नाम को ढोने की ज़रूरत नहीं है। ज़रूरत इस बात की है कि हम कैसे आगे बढ़ें। हमलोगों की ज़िम्मेदारी है कि हम दूसरों के लिए कुछ करें। जैसे हमने पहले स्कूल-कॉलेज के लिए जमीनें दान की थीं आगे भी हमारी कोशिश है कि हमलोग कुछ करें,” उन्होंने कहा।
सीमांचल की ज़मीनी ख़बरें सामने लाने में सहभागी बनें। ‘मैं मीडिया’ की सदस्यता लेने के लिए Support Us बटन पर क्लिक करें।



















