हजरत शेख़ पश्चिम बंगाल जेल पुलिस में ड्राइवर हैं और उनकी पत्नी मनवारा खातून मुर्शिदाबाद के जंगीपुर में पुलिस सुपरिंटेंडेंट कार्यालय में काम करती हैं। दोनों ही पिछले क़रीब तीन दशकों से सरकारी मुलाज़िम हैं। मगर, चुनाव आयोग की नज़र में वे पश्चिम बंगाल के मतदाता होने की योग्यता नहीं रखते हैं। नतीजतन राज्य की नई मतदाता सूची से उनके नाम हटा दिये गये हैं। उनके इकलौते बेटे अलकमा शेख़ अपने माता-पिता की नागरिकता और पहचान से जुड़े सभी दस्तावेज़ों एक मोटी फाइल निकाल कर सामने रख देते हैं। फिर सारे दस्तावेज एक एक कर निकालते हैं, दिखाते हैं और सवाल पूछते हैं कि क्या उनके माता पिता 30 साल सरकार में नौकरी कर यही डिजर्व करते हैं कि ट्राइबुनल में लाइन लगाकर अपनी नागरिकता साबित करें?
वोटर लिस्ट से अलकमा शेख़ का नाम भी काट दिया गया है क्योंकि साल 2002 के वोटर लिस्ट में उनके माता-पिता का नाम नहीं था। निर्वाचन आयोग ने 2002 की मतदाता सूची को आधार माना है क्योंकि निर्वाचन आयोग के मुताबिक़, आख़िरी बार स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न यानी SIR, 2002 में ही हुआ था।
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अलकमा और उनके पिता इकलौते वोटर नहीं हैं, जिनके नाम मतदाता सूची से हटाये गये हैं। बिहार के बाद पश्चिम बंगाल में पिछले साल नवम्बर से शुरू हुए SIR में कुल 27.16 लाख वोटरों को अयोग्य बताकर उनके नाम वोटर लिस्ट से हटा दिये गये हैं। SIR प्रक्रिया के बाद जारी किये गये आँकड़ों के मुताबिक़, पश्चिम बंगाल में कुल वोटरों की संख्या 6.77 करोड़ है। SIR में सबसे ज़्यादा नाम मुस्लिम बहुल जिला मुर्शिदाबाद में कटे हैं।
ऐसा नहीं है कि इस SIR प्रक्रिया में सिर्फ़ आम लोगों के नाम कटे हैं। सभी इसकी जद में आये हैं। मसलन कि बंगाल के नवाब रहे मीर जाफ़र के वंशज सैयद रजा अली मिर्ज़ा और उनके वृहद् परिवार के दर्जनों सदस्यों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिये गये हैं। मिर्ज़ा को स्थानीय लोग ‘छोटे नवाब’ कहते हैं। मुर्शिदाबाद के लाल बाग़ में हज़ार दुहरी से कुछेक सौ मीटर दूर एक छोटे से पुराने मकान में रह रहे सैयद रजा अली मिर्ज़ा का कहना है कि उनके ख़ानदान में क़रीब पाँच हज़ार वोटर हैं, जिनमें से लगभग 200 लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिये गये है। नाम हटने से वह निराश हैं और कहते हैं कि उनके ख़ानदान ने यहाँ हुकूमत की, इलाक़े को आबाद किया। कम से कम उनके साथ ऐसा नहीं होना चाहिए था।
हैरानी की बात ये है कि जिनके नाम कटे हैं, उनके पास कई तरह के वैध दस्तावेज हैं, जो उनकी नागरिकता साबित करते हैं। मगर इसके बावजूद उनके नाम हटा दिये गये। ट्राइबुनल में भी वे गये लेकिन निराशा ही हाथ लगी।
SIR में आम वोटरों की मदद करने वाले रिटायर्ड शिक्षक मुमताज़ अहमद इस्लाम इस पूरी प्रक्रिया को राजनीति से प्रेरित और मुस्लिमों को हाशिये पर धकेलने की कोशिश मानते हैं।
कई मामले ऐसे भी हैं कि नाम में अक्षरों के मामूली हेरफेर के चलते वोटरों का मताधिकार छीन लिया गया है। इसी मोहल्ले की रहने वाली बुजुर्ग महिला मल्लिका परवीन का नाम सिर्फ़ इसलिए वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है कि साल 2002 के वोटर लिस्ट में उनका नाम मल्लिका शेख़ लिख दिया गया था। हालांकि, ऐसा कैसे हुआ, उन्हें नहीं पता।
उन्होंने भी ज़मीन टैक्स की रसीद, ज़मीन की दलील, अपने चार भाई बहनों का वोटर कार्ड, वंशावली आदि भी दिये, लेकिन उनका नाम वोटर लिस्ट में शामिल नहीं हो सका। वह बताती हैं कि उनके मोहल्ले में 83 लोगों के नाम वोटर लिस्ट से काटे दिये गये हैं। उनके परिवार में कुल छह वोटर हैं, जिनमें से सिर्फ़ उनका नाम ही कटा है।
अपना नाम कटने से मल्लिका थोड़ी परेशान ज़रूर हैं, लेकिन इसके ख़िलाफ़ वह लड़ाई लड़ने को तैयार हैं। वह इस मामले को अदालत तक ले जाने की बात कहती हैं।
चुनाव में जहां एक वोट किसी उम्मीदवार की क़िस्मत पलट सकता है, 27.16 लाख वोटरों का नाम कटना बहुत बड़ा आँकड़ा है और ये चुनाव परिणाम में बड़ा फेरबदल कर सकता है। देखने वाली बात ये होगी कि इसका चुनावी फ़ायदा किसे होता है।
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