पश्चिम बंगाल के हासिमारा में 30 मई से 1 जून 2025 तक नौवीं दक्षिण एशियाई आत्या पात्या चैंपियनशिप का आयोजन हुआ। 8 देशों के इस टूर्नामेंट में भारतीय टीम ने महिला और परुष दोनों श्रेणी में स्वर्ण पदक जीता। देश के लिए गोल्ड लाने वाले खिलाड़ियों में बिहार के संजीव कुमार और अंशु कुमारी भी शामिल थे। ख़ास बात ये रही कि ये दोनों खिलाड़ी पहली बार भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।
खेल से जुड़ी कुछ वेबसाइट और सोशल मीडिया पेज ने इस सफलता पर संजीव और अंशु को बधाई दी लेकिन बिहार के न्यूज़ चैनल और अखबार ने इस उपलब्धि पर कुछ ख़ास ध्यान नहीं दिया और न ही किसी बड़े नेता का इस पर ट्वीट आया। इससे संजीव और इस खेल से जुड़े बाकी लोगों को ख़ासा निराशा हुई।
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“मैंने राज्य के लिए एक बड़ी उपलब्धि हासिल की लेकिन किसी ने कोई प्रशंसा नहीं की,” ‘मैं मीडिया’ से बातचीत के दौरान गोल्ड मेडलिस्ट संजीव कुमार बोले।
24 वर्षीय संजीव पटना के रहने वाले हैं जो पिछले 10 साल से आत्या पात्या खेल रहे हैं। संजीव महाराष्ट्र के नागपुर जिले की अमरावती यूनिवर्सिटी से फ़िज़िकल एजुकेशन में स्नातक की पढ़ाई कर रहे हैं हालांकि वह स्थायी तौर पर बिहार में ही रहते हैं। कंकड़बाग में पिता की चाय की छोटी सी दुकान है जिसमें वह मदद करते हैं और इसके साथ साथ वह फोटोग्राफी कर अपना पॉकेट खर्च निकालते हैं।
सीएम को लिखा पत्र
उन्होंने 22 जुलाई को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दफ्तर में ईमेल के माध्यम से एक पत्र भेजा। इसमें उन्होंने लिखा कि बिहार में आत्या पात्या खेल के लिए ज़रूरी सुविधा और मदद दी जाए। इसके अलावा उन्होंने अपनी निजी उपलब्धि के सम्मान में सरकारी नौकरी की मांग की।
इसके जवाब में, 29 जुलाई 2025 को संयुक्त सचिव निरंजन कुमार ने यह मामला बिहार राज्य खेल प्राधिकरण, पटना के निदेशक को भेजकर उन्हें ज़रूरी कदम उठाने और खेल विभाग को इसकी जानकारी देने के आदेश दिए। हालांकि संजीव को अब तक कोई जवाब नहीं मिला है।
कुछ दिनों पहले संजीव बिहार स्टेट स्पोर्ट्स एसोसिएशन के दफ्तर जाकर महानिदेशक रवींद्रन शंकरन से मिले लेकिन उन्हें निराशा ही हाथ लगी। संजीव की मानें तो बीएसएसए के महानिदेशक ने उन्हें इस खेल के लिए कुछ भी कर पाने में खुद को असमर्थ बताया और संजीव के फोटो मांगने पर उनके साथ फोटो खिंचवाने से भी मना कर दिया।
“इससे ज़्यादा मैं बिहार सरकार से क्या उम्मीद रख सकता हूँ। उनके एक अधिकारी फोटो भी नहीं ले सकते हमारे खिलाड़ियों के साथ,” संजीव के कोच तरुण कुमार ने कहा।
इस घटना के बारे में संजीव आगे बताते हैं, “मैंने डायरेक्टर जनरल सर से कहा कि आप कुछ चयनित खेलों को सपोर्ट कर रहे हैं लेकिन आत्या पात्या को नहीं कर रहे हैं.” संजीव बोले, “आप आईपीएस हैं, इस गेम को प्रमोट कर दीजिये तो उन्होंने कहा- न तो यह गेम ओलिंपिक में है न कॉमनवेल्थ में, न ही एशियाई खेलों में। हम इसमें कुछ नहीं कर सकते।”
संजीव आगे बताते हैं, “कल तक नहीं बोल रहा था क्योंकि मेरे पास अचीवमेंट नहीं था। आज अचीवमेंट है इसलिए बोल रहा हूँ लेकिन कुछ मिल नहीं रहा है। ”
बिहार में नहीं मिलती नौकरी
संजीव का कहना है कि केंद्र सरकार के पोस्टल डिपार्टमेंट, इनकम टैक्स, डीआरडीओ जैसी संस्थाओं में अत्या पत्या के खिलाड़ियों को नौकरी दी जाती है। भारत सरकार के केंद्रीय जीएसटी आयुक्तालय, गुवाहाटी ने बीते 23 अगस्त को ही स्पोर्ट्स कोटा के तहत टैक्स असिस्टेंट और हवलदार की भर्ती की घोषणा की। इस भर्ती के लिए 65 खेलों की सूची जारी की गई है। इनमें प्राचीन भारतीय खेल आत्या पात्या भी शामिल है, जो सूची में तीसरे नंबर पर है।
बिहार में इस खेल को मान्यता नहीं दी गई है हालांकि कुछ सालों पहले ऐसा नहीं था। बिहार आत्या पात्या फेडरेशन के जॉइंट सेक्रेटरी तरुण कुमार आज़ाद ने हमें बताया कि पहले यह खेल बिहार की खेल सूची में था लेकिन 1993 के बाद कुछ अधिकारियों ने इसे हटा दिया। अब बिहार सरकार की सूची में जो 20 खेल शामिल हैं उनमें आत्या पात्या का नाम नहीं है।
“बिहार सरकार ने नियम बना दिया कि जो खेल ओलम्पिक, कॉमनवेल्थ और एशियाई गेम में होगा उसे ही बढ़ावा मिलेगा तो फिर देश से निकले हुए ये खेल कैसे आगे बढ़ेंगे। विदेशी खेल को अहमियत दे रहे हैं भारतीय खेल को नहीं दे रहे,” तरुण कुमार ने कहा।
आगे वह कहते हैं, “2014 में 65 खेलों के लिए वैकेंसी आई थी। लेकिन बिहार में इन लोगों ने कुछ खेल को लिया, कुछ को छोड़ दिया। उन्होंने नियमावली को तोड़ दिया। आज भी केस चल रहा है, आज हाईकोर्ट में तारीख भी थी।”
“इंडियन खेल को यहां अगर ध्यान नहीं दिया जाएगा तो ओलम्पिक में कैसे जुड़ सकेगा। यह कोई बाहरी खेल नहीं है कि इसको पहचान मिल जाए आसानी से,” भारतीय खिलाड़ी संजीव बोले।

क्या है आत्या पात्या
आत्या पात्या को खोखो और कबड्डी का मिश्रण कहा जा सकता है। इस प्राचीन भारतीय खेल को आट्यापाट्या या अत्या पाट्या भी कहा जाता है। भारत में महाराष्ट्र, तमिलनाडु, पुडुचेरी और केरल समेत कई राज्यों में इस खेल का प्रचलन है। विश्व की बात की जाए तो भारत के अलावा भूटान, श्रीलंका, नेपाल, पाकिस्तान जैसे देशों में यह खेल खेला जाता है। हालांकि, यह खेल ओलंपिक या ऐशियाई खेलों में शामिल नहीं है।
आत्या पात्या का मैदान खास तरीके से बनाया जाता है। पुरुषों के लिए मैदान की लंबाई 109 फीट और चौड़ाई 23 फीट होती है। बीच की सरपाटी की लंबाई 89 फीट रखी जाती है और एक पाटी से दूसरी पाटी की दूरी 11 फीट होती है। मैदान के दोनों सिरों पर 10 फीट का बॉक्स बनाया जाता है।
महिलाओं और जूनियर खिलाड़ियों के लिए मैदान थोड़ा छोटा होता है। इसमें लंबाई 101 फीट, चौड़ाई 21 फीट, सरपाटी 81 फीट और पाटी की दूरी 10 फीट रखी जाती है। बॉक्स का आकार यहाँ भी 10 फीट का ही होता है।
खेल के नियम भी उतने ही रोचक हैं। हर बॉक्स में डिफेंस खड़े होते हैं और अटैकर का काम होता है कि वह उन्हें बिना छुए हुए पार करे। अगर डिफेंस उसे टच कर लेता है तो वह आउट हो जाता है, लेकिन अगर बिना छुए हुए पार कर जाता है तो एक अंक मिलता है। पांच मिनट के भीतर जितनी बार खिलाड़ी सारे बॉक्स पार कर लेते हैं, उतने अंक उनकी टीम को मिलते हैं। खेल के अंत में जो टीम सबसे ज़्यादा अंक जुटाती है, वही विजेता बनती है।
संजीव कुमार ने बताया कि अत्या पत्या का मतलब होता है “आर-पार” यानी डिफेंस को पार करना। पूर्वी भारत में इसे चिक्का कहा जाता है, ग्रामीण क्षेत्रों में ये काफी प्रचलित खेल हुआ करता था।
आत्या पात्या फेडरेशन, बिहार के संयुक्त सचिव और कोच तरुण कुमार आज़ाद की मानें तो इस खेल का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है। उन्होंने कहा, “अभिमन्यु जब मां के पेट में थे तब कृष्ण भगवान ने चक्र्व्यू तोड़ने के लिए बताया था। आत्या पात्या में उसी तरह से चारों तरफ से चक्रव्यूह जैसा बना होता है, उसी से निकल कर खिलाड़ियों को जाना है।”
फेडरेशन के पास मैदान नहीं
तरुण कुमार आज़ाद अपनी पत्नी कविता कुमारी के साथ मिलकर बच्चों की कोचिंग क्लास चलाते हैं। इसके लिए वे बच्चों से रेजिस्ट्रेशन शुल्क के अलावा किसी तरह की मासिक फीस नहीं लेते। फेडरेशन की तरफ से चलने वाले इस कोचिंग क्लास के लिए सबसे बड़ी परेशानी मैदान का न होना है। पहले वे पटना के कंकड़बाग स्थित डिफेंस कॉलोनी के मैदान में बच्चों को सिखाया करते थे लेकिन पिछले दिनों बीएसएसए ने उन्हें वहां से हटने को कह दिया। उस जगह को अब क्रिकेट ग्राउंड में तब्दील किया जा रहा है।
मैदान न होने से कई दिनों तक प्रशिक्षण क्लास बंद रखना पड़ा। कई जगह भटकने के बाद उन्हें एमआईजी पार्क में थोड़ी सी जगह मिल सकी। “पहले गार्ड मना कर रहा था, पार्क पर मौजूद फिर कुछ बुज़ुर्ग ने इस खेल को पहचान लिया और कहा कि गांव में हम यह खेल खेलते थे, इसे चिक्का कहते हैं,” गोल्ड मेडलिस्ट संजीव कुमार ने कहा।
तरुण कुमार आज़ाद और संजीव कुमार अभी करीब 100 लड़के, लड़कियों को प्रशिक्षण देते हैं। इनमें सब-जूनियर, जूनियर और सीनियर स्तर के खिलाड़ी खेलते हैं। सार्वजनिक जगह पर कोचिंग क्लास होने से कई प्रकार की परेशानी भी आती है।
तरुण कुमार कहते हैं, “लड़कियों को कौन परेशान कर रहा है, ध्यान देना पड़ता है। आज ही की बात है, हमारी बच्चियां कसरत कर रही थीं तो कुछ लड़के हूटिंग कर रहे थे। मैंने मना किया तो मुझसे उलझने को तैयार हो गए। आये दिन ये सब झेलना पड़ता है।”
तरुण की पत्नी कविता कुमारी आज़ाद बच्चों का एक स्कूल चलाती हैं। वह फेडरेशन की लड़कियों को राष्ट्रीय प्रतियोगिता खिलाने ले जाती हैं। कविता को उम्मीद है कि बिहार सरकार और खेलों की तरह इस खेल पर भी ध्यान देगी।
वह कहती हैं, “सरकार इतनी निर्दयी नहीं है। सब खेलों को अपना रही है। मेरे खेल को भी अपनाएगी, मुझे पूरी आशा है। हमें पैसे, मोरल सपोर्ट और मैदान की ज़रूरत है। स्पोर्ट्स कोटा के तहत हमें टिकट में कंसेशन मिल जाए।”
उन्होंने आगे बताया कि लड़कियों के माता पिता के लिए बहुत मुश्किल होती है ऐसे खेल के लिए अनुमति देना जो राज्य में लोकप्रिय नहीं है। कई बार अभिभावक सुरक्षा या आर्थिक कारणों से लड़कियों को राष्ट्रीय प्रतियोगिता में भेजने से मना कर देते हैं।
“सरकार से काफ़ी निराशा है”
“आने जाने का, रहने का सब अपनी जेब से करना पड़ता है। यह मेरा पहला नेशनल है तो घर वाले खर्च दे रहे हैं लेकिन कुछ खिलाड़ी के परिवार बार बार इतना मोटा खर्च उठाने को तैयार नहीं हैं। सरकार से काफी निराशा है। सरकार समर्थन करे। घर वाले इतना खर्च नहीं उठा पाएंगे,* बिहार सीनियर दल के लिए खेल रही खुशबु कुमारी ने कहा।
खुशबु ने आगे कहा कि कई बार ऐसा होता है कि टीम के कुछ सबसे अच्छे खिलाड़ी पैसों की तंगी के कारण टूर्नामेंट खेलने नहीं जा पाते। परिणामस्वरूप फेडरेशन को कई बार अपेक्षाकृत कमज़ोर टीम भेजनी पड़ती है।
वहीं एक और राष्ट्रीय खिलाड़ी श्रुति बताती हैं कि घर वाले अक्सर इसलिए उतना समर्थन नहीं करते क्योंकि बिहार में इस खेल को लेकर ज़्यादा संभावनाएं नहीं हैं। श्रुति के पिता लाॕन्ड्री का एक छोटा सा व्यवसाय चलाते थे। पिता के निधन के बाद श्रुति की मां पर सारी ज़िम्मेदारी है। श्रुति बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर पैसे जमा करती हैं और उन पैसों को अपने खेल में खर्च करती हैं।
श्रुति कहती हैं, “एक बार नेशनल खेलने में 6-7 हज़ार रुपए का खर्च लगता है। उसके लिए पैसा जमा करके रखना पड़ता है। परिवार थोड़ा बहुत सपोर्ट तो करता है लेकिन उतना नहीं हो पाता है।”
श्रुति की छोटी बहन ने दो बार राष्ट्रीय प्रतियोगिता में भाग लिया है। परिवार के दबाव में अब उसने खेल छोड़ दिया है और केवल पढ़ाई कर रही है। “मम्मी हमसे बोली ‘तुम तो खेल में बर्बाद हो गई हो उसको क्यों इसमें डाल रही हो। हाथ पैर टूट जाएगा तो शादी कौन करेगा,” श्रुति बोली।
श्रुति की बहन जैसी करीब दर्जन भर महिला खिलाड़ियों ने आत्या पात्या खेलना छोड़ दिया है। इस पर श्रुति कहती है, “मेरी एक दोस्त का हाथ चोटिल हो गया। उसके घर वाले कह रहे हैं कि लड़की हो तुम्हें शादी विवाह करना है। गेम में ही फोकस करोगी तो भविष्य में शादी में दिक्कत होगी।”
बिहार की इन होनहार लड़कियों ने खेल को ही जीवन बनाने की ठान ली है। ये दूसरे राज्य में नौकरियों के लिए फॉर्म भर्ती रहती हैं ताकि घर वाले उन्हें खेलने दें। इन सब कठिनाइयों के बीच कुछ खिलाड़ियों को घर वालों की तरफ से समर्थन भी मिल रहा है।
“जब हम आत्या पात्या खेलना शुरू किये तो मेरे पापा बोले ठीक है, खेलो, कोशिश करो। अगर इसमें अच्छे से खेलती हो तो हम सपोर्ट करेंगे, तुम बस खेलो,” शालिनी कुमारी ने कहा।
आत्या पात्या शारीरिक रूप से काफी तीव्र खेल है। इसमें शारीरिक शक्ति के साथ साथ मानसिक बल का भी प्रयोग करना होता है। कई खिलाड़ियों ने कहा कि खेल शारीरिक तौर पर मुश्किल तो है लेकिन इससे उनके जीवन में काफी साकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है।
“यह खेलने से अब तबीयत उतनी खराब नहीं होती है। शारीरिक तौर पर अब हम काफी फिट रहते हैं,” सब-जूनियर खिलाड़ी आरुषि बोली।
“इस गेम से हम काफी फिट रहते हैं। मम्मी लोग भी खेलते देखती हैं तो उन लोग को अच्छा लगता है। इसमें बहुत आगे तक जाना है और इंडिया का नाम रोशन करना है,” आठवीं के छात्र शुभम राज ने कहा।
एक अन्य सब जूनियर खिलाड़ी विवान कहते हैं, “पहले हम फिजिकली फिट नहीं थे। डेढ़ महीने से आत्या पात्या खेलना शुरू किये हैं, तब से फिट रहते हैं। पहले मेरे पैर में दर्द रहता था लेकिन अब नहीं है। मेरा सपना है कि मेरे भैय्या (संजीव) इंटरनेशनल खेले हैं तो हम भी इंटरनेशनल खेलें और साथ साथ पढ़ाई को भी लेकर चलें।”

स्कूलों तक पहुँचाने का प्रयास
18 वर्षीय आरुष कुमार आज़ाद ने कई बार बिहार का प्रतिनिधित्व किया है। वह बिहार जूनियर दल की कप्तानी कर चुके हैं। बिहार सरकार की उदासीनता से निराश आरुष कहते हैं. “हमने यह सोचकर खेलना शुरू किया था कि यह भारतीय खेल ह, हमें सबसे पहले वैल्यू दी जायेगी, आगे बढ़ाया जाएगा। लेकिन, हमारे साथ पूरा उल्टा हुआ।”
आरुष, पटना के स्कूलों में जाकर स्कूल प्रशासन से मिलकर आत्या पात्या खेल को अपनाने के लिए लगातार कोशिश कर रहे हैं। अधिकतर उन्हें निराशा हाथ लगती है लेकिन कुछ स्कूलों ने उन्हें यह खेल सिखाने की अनुमति दे दी जिसके बाद कई बच्चे स्कूल से निकल कर सब-जूनियर टीम का हिस्सा बने और बिहार के लिए खेल रहे हैं।
बिहार आत्या पात्या फेडरेशन के पास मैदान के साथ साथ पैसों की भारी कमी है। बिहार की टीम लगातार देश में टॉप 8 टीमों में शामिल है लेकिन फेडरेशन के पास ट्रेन के किराए के लिए भी पैसे नहीं हैं।
तरुण कुमार ने बताया कि कोरोना काल से पहले स्पोर्ट्स कोटा के तहत ट्रेन टिकट पर 65 खेलों में खिलाड़ियों को रियायत मिलती थी। कोरोना के बाद सभी खेलों में यह बंद कर दिया गया। अब पूरा टिकट का किराया देना पड़ता है जबकि पहले केवल 25% किराया लगता था। यह सुविधा अभी तक शुरू नहीं की गई है
राष्ट्रीय प्रतियोगिता खेलने वाले बच्चों को सारा खर्च ख़ुद उठाना पड़ता है। वहीं, अंतराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भी स्पाॕन्सर न होने के कारण पंजीकरण फ़ीस भी ख़ुद से देनी पड़ती है ।
“हमें बस तीन चीज़ चाहिए खेलने के लिए – ग्राउंड, ट्रेन टिकट और बच्चों का यूनिफाॕर्म। अगर जॉब नहीं देंगे तो हमारे बच्चों में क़ाबिलियत है कि जॉब केंद्र सरकार से ले लेंगे,” संयुक्त सचिव व कोच तरुण कुमार बोले ।
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