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क्या जलवायु परिवर्तन के चलते बिहार में बढ़ रहीं सर्पदंश की घटनाएं?

सांप बाह्यतापी जीव है, इसलिए उसपर जलवायु परिवर्तन का सीधा असर पड़ रहा है। बाह्यतापी जीव वे होते हैं, जिनका शारीरिक तापमान सूर्य की रौशनी, पृथ्वी की गर्माहट जैसे बाहरी तत्वों पर निर्भर होता है। बाह्यतापी जीव के शरीर से गर्मी पैदा नहीं होती। यही बजह है कि ऐसे जीवों का रक्त ठंडा होता है।

shashwat Reported By Shashwat |
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are snakebite incidents increasing in bihar due to climate change

इसी साल जुलाई में कोसी तटबंध के भीतर बसे सुपौल जिले के जीवछपुर गांव की रहने वाली सीता देवी (50) लकड़ी लाने के लिए खेत में गई थीं, तभी जहरीले सांप ने उन्हें काट लिया। सर्पदंश का इलाज त्वरित हो, तो मरीजों की जिंदगी आसानी से बचाई जा सकती है, लेकिन, सीता देवी को बचाया नहीं जा सका, क्योंकि उन्हें इलाज के लिए छातापुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) ले जाते-जाते काफी देर हो चुकी थी।


सीता देवी के पति गोविंद शाह कहते हैं, “हमारे घर से छातापुर सीएचसी महज 34 किमी दूर है। गांव से बाहर निकलने के लिए नाव का ही सहारा है क्योंकि बीच में कोसी की एक धार है। लेकिन, नाव तक पहुंचने के लिए कोई सड़क नहीं है, तो बालू भरे खेतों से होकर कोसी की धार के किनारे तक जाना पड़ता है। नाव पार कर मोटरसाइकिल पर ले जाने में हम लोगों को तीन घंटे से ज्यादा वक्त लग गया। मेरी पत्नी की मौत रास्ते में ही हो गई थी। ढाई साल की बेटी और हम अब अकेले हो गए हैं।”

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बिहार में बीते कुछ सालों मे सर्पदंश की घटनाएं चिंताजनक रूप से बढ़ी हैं। बिहार सरकार के आंकड़े बताते हैं कि बीते साल यहां 608 लोगों की सांप काटने से मौत हुई। वहीं, बिहार हेल्थ मैनेजमेंट इनफ़ॉर्मेशन सिस्टम (एचएमआईएस) आंकड़े बताते हैं कि अप्रैल 2023 से मार्च 2024 के बीच राज्य में 934 मौतें सांपों के काटने की वजह से हुईं। साथ ही सरकारी अस्पतालों में तकरीबन 18 हजार लोग सर्पदंश के चलते इलाज के लिए आए। हालांकि बीते साल जुलाई में सारण लोकसभा क्षेत्र से सांसद राजीव प्रताप रूडी ने लोकसभा में जानकारी दी थी कि भारत में भी सबसे ज़्यादा मौतें बिहार में होती हैं, जहां हर साल 10,000 से अधिक लोग सांप के काटने से अपनी जान गंवा देते हैं।


जर्नल ऑफ एंटोमोलॉजी एंड जूलॉजी स्टडीज में छपे एक अध्ययन के मुताबिक, साल 2018 में सर्पदंश से बिहार में 4752 लोगों की मौत हुई थी, जो तीसरा बड़ा आंकड़ा था। वहीं, 12360 मौतों के साथ उत्तर प्रदेश पहले और 9238 मौतों के साथ आंध्रप्रदेश दूसरे स्थान पर था।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया भर में हर साल 81 हजार से 1.38 लाख लोगों की मौत सांप के काटने से हो जाती है। इसके अलावा लाखों लोग गंभीर रूप से जख्मी होते हैं और कई मामलों में आजीवन विकलांगता का शिकार हो जाते हैं।

भारत की बात करें, तो यहां हर साल औसतन 46 हजार से 58 हजार लोगों की मौत होती है। सांसद राजीव प्रताप रूडी की ओर से लोकसभा में दिये गये आंकड़ों की माने, तो भारत में सालाना 50,000 से 60,000 लोगों की मौत सर्पदंश से हो जाती है, जो विश्व में सर्वाधिक है।

हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज आंकड़े असल स्थिति से कम हैं। बड़ी संख्या में मौतें गांवों में ही हो जाती हैं, अस्पताल तक मामला पहुंचता ही नहीं, या फिर झाड़-फूंक और पारंपरिक इलाज के दौरान मौतें सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हो पातीं।

आंकड़ों में इस विषमता की वजह ये है कि ज्यादातर मरीज अस्पताल पहुंच ही नहीं पाते। केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, सर्पदंश के ज़्यादातर मामलों में अस्पतालों तक कम मरीज़ पहुंच पाते हैं, जिसके कारण सांपों के काटने से होने वाली मौतों का सही आंकड़ा रिपोर्ट नहीं हो पाता है।

जलवायु परिवर्तन का असर

सांप बाह्यतापी जीव है, इसलिए उसपर जलवायु परिवर्तन का सीधा असर पड़ रहा है। बाह्यतापी जीव वे होते हैं, जिनका शारीरिक तापमान सूर्य की रौशनी, पृथ्वी की गर्माहट जैसे बाहरी तत्वों पर निर्भर होता है। बाह्यतापी जीव के शरीर से गर्मी पैदा नहीं होती। यही बजह है कि ऐसे जीवों का रक्त ठंडा होता है। नेचर जर्नल में छपा एक अध्ययन कहता है, “बाह्यतापी जीव सबसे अधिक संवेदनशील समूहों में से हैं क्योंकि वे शारीरिक कार्यों को नियंत्रित करने के लिए पर्यावरणीय तापमान पर निर्भर करते हैं। बाह्यतापी जीवों में, सरीसृपों की सहनशीलता आमतौर पर कम होती है और उनकी फैलाव क्षमता सीमित होती है, जो उन्हें तीव्र जलवायु परिवर्तन और आवास के नुकसान के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील बनाती है।”

बिहार राज्य, जिसका कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 94.16 लाख हेक्टेयर है, का एक बड़ा हिस्सा हर साल मानसून के मौसम में विनाशकारी बाढ़ की चपेट में आ जाता है। बाकी बचे समय में बीते कुछ सालों से हीट वेव ने इसे और दयनीय बना दिया है। यह प्राकृतिक आपदा न केवल जन-जीवन और संपत्ति को प्रभावित करती है, बल्कि यह सर्पदंश की घटनाओं में वृद्धि का भी एक प्रमुख कारण बन जाती है।

मानसून की भारी बारिश और नदियों में उफान के कारण जब निचले इलाकों में पानी भर जाता है, तो सांपों के प्राकृतिक आवास, यानी उनके बिलों में पानी घुस जाता है। अपने बिलों से बाहर निकलने के लिए मजबूर होने के कारण, सांप सुरक्षित और सूखे स्थानों की तलाश में बस्तियों, घरों और ऊंचाई की तरफ आ जाते हैं। यह स्थिति मानव और सांप के बीच टकराव की संभावना को कई गुना बढ़ा देती है, जिसके परिणामस्वरूप सर्पदंश के मामले अचानक बढ़ जाते हैं।

अभिषेक घोसाल नेचर इन्वायरमेंट एंड वाइल्ड सोसाइटी प्रोजेक्ट मैनेजर हैं। वह बिहार और उत्तर प्रदेश के वन विभागों को सर्प बचाव (स्नेक रेस्क्यू) प्रशिक्षण देते हैं। अभिषेक कहते हैं, “सांप कोल्ड ब्लडेड जीव होते हैं। ऐसे में, धरती के बढ़े हुए तापमान के कारण वे अधिक आक्रामक हो रहे हैं। इसलिए बाढ़ से उनके प्राकृतिक आवास भी लगातार सिकुड़ते जा रहे हैं और हीट से उनके बिल में रहने के लिए अनूकुल तापमान नहीं मिल रहा है। क्लाइमेट चेंज के कारण, सांपों का इन्क्यूबेशन पीरियड जो पहले 45 से 60 दिन की होती थी, वह घटकर 45 से 50 दिन रह गया है।”

मॉनसून में ज्यादा घटनाएं

देशभर में होने वाली सर्पदंश की घटनाओं और मौतों का लगभग आधा हिस्सा मानसूनी सीजन में दर्ज़ किया जाता है। बिहार के बाढ़ प्रभावित इलाकों में जून से सितंबर की बारिश के दौरान नदियों का पानी उपजाऊ जमीन पर फैल जाता है, जिससे सांप अक्सर अपने अड्डों से बाहर आ जाते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि बाढ़ के पानी में सांपों का बिल पानी से भर जाता है और वो पानी में बहते हुए किनारे लग जाते है।

चूंकि बिहार के कुल भूभाग (लगभग 94 लाख हेक्टेयर) का 40% हिस्सा बाढ़ प्रवण है, इसलिए राज्य सर्पदंश का हॉटस्पॉट बन चुका है।

मुज़फ़्फ़रपुर के डॉ. विनय कुमार झा बताते हैं, “बाढ़ के सीजन में हमारे अस्पताल में रोज़ाना सांप काटने के 15-20 मामले आते हैं, जिनमें करीब 5 फीसदी घातक होते हैं। हाल में हमें इन मामलों में अचानक तेज़ी दिखी है।”

कोसी नवनिर्माण संगठन के संस्थापक महेंद्र यादव कोसी क्षेत्र का अनुभव साझा करते हुए कहते हैं, “बीते बीस साल में कोसी नदी अपना धार अक्सर बदल देती है। इसके चलते कई बार उन हिस्सों में भी बहती जाती हैं, जहां पहले खेत या घर थे। इससे सांप सहित दर्जनों जहरीले जीव रिहायशों में आते हैं। सांप चूंकि पानी में भी रह सकते हैं, इसलिए इतनी मौतें होती हैं।”

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मृतकों में बच्चे ज्यादा

बीते सितंबर में भागलपुर के नवगछिया में दस साल के सुमन की मौत सांप काटने से हो गई। सुमन तीन भाइयों में सबसे छोटा था। पिता शंकर मंडल बताते हैं, “सुमन भूसा घर में खेल रहा था। इस दौरान सांप ने उसके दाहिने हाथ के अंगूठे पर काट लिया। काटने के बाद हाथ से खून निकल रहा था। सुमन ने घर आकर किसी को कुछ नहीं बताया और आंगन में अचेत होकर गिर पड़ा।”

परिजनों ने उसे निजी नर्सिंग में भर्ती कराया जहां स्थानीय डॉक्टरों ने उसकी गंभीर हालत देखते हुए जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज, भागलपुर अस्पताल रेफर कर दिया, जहां इलाज में देरी के चलते उसकी मौत हो गयी।

नेशनल लेबोरेट्री ऑफ मेडिसिन ने उत्तर बिहार में सर्पदंश से हुई मौतों पर एक रिसर्च की है। अस्पतालों पर हुए इस रिसर्च में पाया गया कि 15 साल से कम उम्र के बच्चों में सांप काटने से मरने की ज्यादा घटनाएं हुईं। वयस्कों के मुकाबले बच्चों में मौत का आंकड़ा कई गुना ज्यादा था। अध्ययन के अनुसार, अस्पताल पहुँचने में देरी पर विपरीत नतीजे आने की आशंका बहुत बढ़ जाती है।

कोसी के बाढ़ प्रभावित इलाकों में दो दशक से काम कर रहे और कोसी नवनिर्माण संगठन के संस्थापक महेन्द्र यादव कहते हैं, “ग्रामीण इलाकों में सड़कें ही नहीं हैं, अस्पताल पहुंचने में देरी से अधिकतर मौतें हो जाती हैं। सांप कांटने जैसी इमरजेंसी में लोग मोटरसाइकिल से यात्रा कर लेते हैं, क्योंकि इससे अस्पताल तक पहुंचने का समय बहुत घट जाता है। बहुत सारा समय लोग झाड़-फूंक में खर्च कर देते हैं।”

नेशनल लेबोरेटरी ऑफ मेडिसिन ने रक्सौल के सरकारी अस्पताल से कुछ डेटा इकट्ठा किया। उनके आंकड़ें बताते हैं कि सांप काटने के बाद जिन मरीजों को मोटरसाइकिल से अस्पताल लाया गया उनकी बचने की संभावना सबसे ज्यादा थी।

लंबे समय तक ओपीडी और इमरजेंसी सेवा दे चुके सीनियर डॉक्टर और अपोलो अस्पताल में कार्यरत डॉ. गोपांबुज सिंह राठौर कहते हैं, “मरीज़ अगर काटे जाने के 1.5 घंटे के अंदर अस्पताल आ जाता है तो भयावह परिणाम होने की आशंका काफी कम हो जाती है। दिक्कत यह है कि गांव के लोग आमतौर पर पहले झाड़-फूंक या ओझा-वैद्य के चक्कर में पड़ जाते हैं। इन प्रथाओं में उलझने के बजाय तुरंत अस्पताल का सहारा लेने की जरूरत है।”

वहीं, अभिषेक घोसाल कहते हैं कि बिहार में अधिकतर डॉक्टर सर्पदंश के सही इलाज के लिए ट्रेन्ड नहीं हैं। उनका कहना है, “केवल एएसवी (एंटी स्नेक वेनम) की उपलब्धता पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि डॉक्टरों को सेकेंड लाइन ऑफ ट्रीटमेंट में भी प्रशिक्षित होना होगा।”

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शाश्वत दैनिक भास्कर में बीते चार साल से सीनियर रिपोर्टर हैं। बीएचयू से समाजशास्त्र में एमए करने के बाद उन्होंने तकरीबन एक साल इंडिया टूडे समूह के डीजिटल प्लेटफॉर्म लल्लनटॉप के साथ भी काम किया। फिलहाल फ्री लांस जर्नलिस्ट हैं और पर्यावरण, जलवायु जैसे मुद्दों पर लिखते रहते हैं।

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