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अररिया: 50 लाख से बना शवदाह गृह खंडहर में तब्दील

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अररिया जिले में सरकारी फंड से एक शवदाह गृह बनाया गया था। यह जिले का एकमात्र शवदाह गृह था, लेकिन सरकारी लापरवाही और उदासीनता के कारण यह खंडहर में तब्दील हो गया है। दरअसल, इस मुक्तिधाम शवदाह गृह के बनाने का उद्देश्य था कि मृत्यु के बाद हिन्दू रीति रिवाजों के अनुसार अंतिम समय में मृत शरीर को नश्वर दुनिया से मुक्ति मिलने में आसानी हो और शवदाह गृह में कम जलावन से शवों का अंतिम संस्कार हो जाये।

muktidham araria

शवगृह में शवों का अंतिम संस्कार होने से सरकार के पास रिकॉर्ड भी रहता है कि कितने शव जले और उनकी मौत कैसे हुई थी। साल 2020 और 2021 में कोरोना से हुई मौतों के सही आंकड़े शवदाह गृह से ही सामने आये थे। बिहार में तो शवदाह गृह के आंकड़े और सरकारी आंकड़ों में इतना अंतर था कि पटना हाई कोर्ट को इसमें हस्तक्षेप कर आंकड़ा दुरुस्त करने का आदेश दिया गया था। बाद में सरकार ने नया आंकड़ा पेश किया, जो पहले की संख्या से अधिक था।

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लेकिन, लाखों रुपये की लागत से बने इस शवदाह गृह का असल उद्देश्य पूरा न हो सका और एक शव नहीं जला।


परमान नदी किनारे बना मुक्तिधाम

बता दें कि अररिया शहर के करीब से बहने वाली परमान नदी के त्रिसुलिया घाट किनारे इस मुक्तिधाम शवदाह गृह का निर्माण 2009 में पीएचईडी ने करवाया था। उद्देश्य था कि लोगों को शव के अंतिम संस्कार में किसी प्रकार की असुविधा न हो और पर्यावरण भी सुरक्षित रहे। लेकिन इतने वर्ष बीत जाने के बावजूद आज तक यह आम लोगों के लिए शुरू नहीं हो पाया है। इसलिए लोग शवों को खुले में जलाने को मजबूर हैं।

साल 2009 में बना था मुक्तिधाम

परमान नदी के किनारे 2009 में तकरीबन 50 लाख रुपये की लागत से मुक्तिधाम शवदाह गृह बनाया गया था। दरअसल, सरकार ने साल 2009 में बिहार के 31 जिलों को चिन्हित कर मुक्तिधाम बनवाने का निर्णय लिया था। इस ओर जोर-शोर से निर्माण कार्य भी शुरू हुआ। लेकिन, बन जाने के बावजूद उसकी देखरेख नहीं हो पाई। इस शवदाह गृह में शवों के अंतिम क्रिया की सभी तरह की सुविधा का बंदोबस्त किया गया था और नगर परिषद को हैंड ओवर कर दिया गया था।

araria shavdah grih

सभी सुविधा थी मौजूद

इस मुक्तिधाम शवदाह गृह में एक साथ छह शवों के अंतिम संस्कार करने की व्यवस्था थी। साथ ही लोगों के बैठने के लिए सेड के साथ शौचालय का भी निर्माण किया गया था। रौशनी के लिए सोलर लाइट लगाए गए, सोलर से चलने वाले वाटर पम्प भी लगाए गए थे। लेकिन ये सब देख रेख के अभाव में खंडहर बन गये हैं। उसपर इसे प्राकृतिक आपदा ने भी बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। ओलावृष्टि से पूरा शेड बरबाद हो गया है। बचे खुचे सामान पर चोरों ने अपना हाथ साफ कर दिया। यहां से सारे सोलर लाइट, वाटर पंप मोटर और चूल्हे के लोहे चुरा लिये गये।

खुले में अंतिम संस्कार करना मजबूरी

शवदाह करने आये महेंद्र मालिक और उनके साथ मौजूद लोगों ने बताया कि ये अब शोभा की वस्तु भी नहीं रह गया है। इस जगह अब सिर्फ चोर उचक्कों का जमावड़ा रहता है। इसके शुरू नहीं होने के कारण लोग शवों को खुले में जलाने को मजबूर हैं। उन्होंने बताया कि शवदाहगृह तक जाने के लिए कोई सड़क भी नहीं है। नगर परिषद को चाहिये कि पहुंच पथ का निर्माण करने के साथ ही शवदाह गृह का जल्द जीर्णोद्धार कराए।

बिजली संचालित शवदाह गृह बनेगा

नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी दीनानाथ सिंह ने बताया कि यह मुक्तिधाम शवदाह गृह अब किसी काम का नहीं है। उन्होंने बताया कि 2014 में यह शवदाह गृह जीर्ण शीर्ण अवस्था में नगर परिषद को मिला था। उन्होंने बताया कि अब यहां जल्द ही बिजली संचालित शवदाह गृह बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।

araria mukridham

वार्ड नंबर 23 में बना मुक्तिधाम

परमान नदी किनारे वार्ड नंबर 23 में बने इस मुक्तिधाम शवदाह गृह के बारे में वार्ड पार्षद सुमित कुमार सुमन ने बताया कि बिहार सरकार ने एक अच्छी योजना लायी थी कि अंतिम समय में शवों का दाह संस्कार अच्छे से हो और पर्यावरण दूषित भी ना हो।

इसी को लेकर वार्ड नंबर 23 में एक मुक्तिधाम शवदाह गृह परमान नदी के त्रिसुलिया घाट पर बनाया गया। स्थानीय लोगों में यह खुशी थी कि अब शवों का अंतिम संस्कार बेहतर तरीके से हो पाएगा और लोग नदी के बाढ़ के समय भी सुरक्षित रहकर दाह संस्कार में शामिल हो पाएंगे। उन्होंने बताया कि नगर परिषद के 29 वार्डों की लगभग एक लाख आबादी को यह सुविधा मिलती। सुमित ने बताया कि 2014 में नगर परिषद को जीर्ण शीर्ण अवस्था में शवदाह गृह को हैंड ओवर कराया गया था।

मुक्तिधाम शवदाहगृह तक ना तो जाने के लिए सड़क थी और ना ही रोशनी की वहां कोई व्यवस्था थी। नगर परिषद ने कई बार जीर्णोद्धार के लिए निविदा भी निकाली। इसमें संवेदकों ने भाग भी लिया। लेकिन नगर परिषद की उदासीनता के कारण उस निविदा को भी रद्द कर दिया गया। उन्होंने बताया कि हम लोगों ने प्रयास कर वहां तक पहुंच पथ बनाने की भी कोशिश की, फिर उसका एग्रीमेंट भी किया गया, लेकिन किन कारणों से इसे रद्द कर दिया गया पता नहीं चल पाया।

abndoned araria shavdah grih

यही वजह है कि आज तक वहां तक जाने के लिए ना कोई रास्ता है और न ही सुरक्षा के इंतजाम। बुनियादी जरूरत अनुसार वहां रोशनी की व्यवस्था नहीं हो पाई। इसलिए अब कह सकते हैं कि यह मुक्तिधाम शवदाह गृह किसी काम का नहीं रहा।

बाढ़ के दिनों में होती है काफी मुश्किल

नगर परिषद क्षेत्र के स्थानीय निवासी और समाजसेवी पारस चंद भारती अब तक हजारों शवों का अंतिम संस्कार अपने हाथों करा चुके हैं। वह लावारिस शवों का भी अंतिम संस्कार करते हैं।

उन्होंने बताया कि बाढ़ के दिनों में काफी दिक्कत हो जाती है शवों के अंतिम संस्कार में, क्योंकि चारों ओर परमान नदी का पानी भरा होता है। कहीं भी सुखी जमीन नहीं रहती है। ऐसे में अगर यह मुक्तिधाम शवदाह गृह चालू अवस्था में रहता तो लोगों को अंतिम संस्कार करने में काफी सुविधा होती। लेकिन, किन परिस्थितियों में इसे यूं ही छोड़ दिया गया, इसकी जानकारी तो नहीं है। लेकिन आज यह जगह खंडहर में तब्दील हो गया है और वहां असामाजिक तत्वों का जमावड़ा लगा रहता है।

समाजसेवियों में है नाराजगी

नगर परिषद के पूर्व उपाध्यक्ष गौतम कुमार साह, एनी दास गुप्ता, वार्ड प्रतिनिधि विजय जैन, संजय अकेला, शशि भूषण झा, शीतल मंडल, बबलू मंडल आदि ने बताया कि जब इस मुक्तिधाम के बनने की घोषणा हुई थी, तो हम लोगों में अपार खुशी थी कि शवों का अंतिम संस्कार सुरक्षित जगह पर हो पाएगा। लेकिन विभागीय उदासीनता के कारण इतना बड़ा शवदाह गृह अब खंडहर में तब्दील हो गया है।

इन सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बताया कि हम लोग प्राय ही अंतिम संस्कार में शामिल होते हैं और त्रिसुलिया घाट पर शवों को ले जाकर अंतिम संस्कार भी करते हैं। लेकिन बाढ़ के दिनों में भारी मुसीबत हो जाती है। उन्होंने बताया कि अब नदी का जलस्तर बढ़ना शुरू हुआ है, ऐसे में शवों का अंतिम संस्कार करना कठिनाइयों से भरा होगा। क्योंकि कहीं भी सूखी जमीन नहीं मिलती है।

abandoned muktidham in araria

उन्होंने बताया कि जानकारी मिली है कि सरकार इस योजना को बंद कर अब यहां पर एक बिजली से संचालित शवदाह गृह बनाएगी। अगर यह बन जाता है, तो जिले के लिए काफी उपयोगी और महत्वपूर्ण साबित होगा।


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