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बिहार के नवादा में अतहर की मॉब लिंचिंग के डेढ़ महीने बाद भी न मुआवज़ा मिला, न सबूत जुटे

बिहार के नवादा में हुई बर्बर मॉब लिंचिंग को डेढ़ महीना बीत गया, लेकिन पीड़ित परिवार के हिस्से आज भी सिर्फ़ इंतज़ार है। पुलिस अब तक अतहर हुसैन की साइकिल और फेरी का सामान बरामद नहीं कर सकी है। मंत्री ने 3 लाख रुपये मुआवज़ा और एक सरकारी नौकरी का भरोसा दिया था, लेकिन हकीकत में अब तक कुछ भी नहीं बदला।

Reported By Umesh Kumar Ray and Tanzil Asif |
Published On :
a month and a half after athar's lynching in nawada, bihar, neither compensation nor evidence has been gathered

बिहार के नवादा में बर्बर मॉब लिंचिंग की घटना के करीब डेढ़ महीने बाद भी प्रशासन न तो साक्ष्य जुटा पाने में सफल है, न ही मंत्री के वादे के बावजूद पीड़ित परिवार को कोई मुआवजा मिला है. ये घटना कितनी भयावह थी, दम तोड़ने से पहले खुद पीड़ित अतहर हुसैन ने अपने बयान में बताया था.


नालंदा ज़िले के बिहार शरीफ शहर स्थित गगन दीवान मोहल्ले के रहने वाले अतहर हुसैन साइकिल पर कपड़ों की फेरी करते थे. 5 दिसम्बर की सुबह क़रीब 5 बजे वह साइकिल से फेरी करने नवादा के लिए निकले थे. उन्हें मोबाइल चलाना नहीं आता है, इसलिए मोबाइल नहीं रखते. नवादा में उनकी ससुराल भी है, तो वह अक्सर हफ़्ता-दस दिन वहाँ रुक जाते थे.

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उस रोज़ नवादा पहुँच कर उन्होंने किसी व्यक्ति के मोबाइल के ज़रिए घर पर फ़ोन किया था कि वह पहुँच गये हैं और फेरी कर एक हफ़्ते के बाद लौटेंगे. लेकिन, वह नहीं लौटे. चूँकि उन्होंने बता दिया था कि एक हफ़्ते बाद ही लौटेंगे, तो उनका परिवार निश्चिंत था.


अतहर हुसैन अपने चार भाई और छह बहनों में सबसे बड़े थे.

पैंट खोलकर पहचान

लेकिन, 6 दिसम्बर की सुबह मो. चाँद के परिचित एक युवक के वाट्सऐप पर एक व्यक्ति की रक्तरंजित तस्वीर आई, जिसने पुलिस को अपना ठिकाना गगन दीवान बताया था. वाट्सएप पर यह सूचना भी थी कि व्यक्ति नवादा सदर अस्पताल में भर्ती है. तस्वीर देखकर मो. चाँद का जैसे खून ही सूख गया. वह तस्वीर अतहर हुसैन की थी. बदहवास मो. चाँद तुरंत अस्पताल रवाना हो गये.

अस्पताल में अतहर हुसैन संगीन हालत में बेड पर थे. उनका दाहिना कान कटा हुआ था, सिर फटा हुआ था, बाएँ पैर की अंगुलियाँ कटी हुई थीं, दायां हाथ टूटा हुआ था, बाएं हाथ और दाहिने जाँघ जले हुए थे.

अतहर हुसैन की नवादा ज़िले के भट्टा गाँव में लिंचिंग की गई थी.

इस घटना ने शबनम परवीन की दुनिया ही उजाड़ दी है। वह और उनके बच्चे अब हर वक़्त गमगीन रहते हैं। शबनम को अब एक ही ग़म सताये जा रहा है कि उनके जवान होते तीन बच्चों का गुजर-बशर कैसे होगा, उन्हें पिता का स्नेह कौन देगा।

लिंचिंग के मामले में रोह थाने की पुलिस ने शबनम परवीन की तरफ़ से दिये गये आवेदन के आधार पर एक दर्जन लोगों को गिरफ्तार किया है. गिरफ्तार सभी आरोपी यादव समाज से हैं.

पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की है. इनमें धारा 117(4) भी शामिल है, जो हेट क्राइम की धारा है. परिवार का भी कहना है कि मुसलमान होने के चलते उनकी लिंचिंग की गई और बचने के लिए उन पर चोरी का झूठा इलज़ाम लगा दिया.

पूरे मामले में हैरान करना वाला पहलू ये है कि घटना के एक माह गुजर जाने के बाद भी पुलिस अब तक अतहर हुसैन की साइकिल और फेरी का सामान बरामद नहीं कर सकी है और अगर पुलिस ये बरामद करने में नाकाम रहती है, तो आरोपियों का आरोप मज़बूत हो सकता है कि अतहर सच में चोरी करने के इरादे से गाँव में गये थे.

रोह थाने के एक पुलिस अधिकारी ने कहा – पूरा गाँव ढूँढ लिये, साइकिल और फेरी का सामान अभी तक नहीं मिला है. तलाश जारी है आगे देखते हैं.

मैं मीडिया ने भट्टा गाँव का दौरा किया, जहां अतहर हुसैन की लिंचिंग हुई थी. गाँव में यादव समेत कई जातियाँ रहती हैं. इस गांव क़रीब 80 घर मुस्लिमों के भी हैं.

गाँव में लगभग सन्नाटा था. ज़्यादातर लोग इस पर बात करने से क़तरा रहे थे, लेकिन मुख्य आरोपियों चंदन यादव, सत्येंद्र यादव, छत्तीस और मोती यादव के परिवार की इंदू देवी ने हमसे बात की, लेकिन कैमरे के सामने बोलने को तैयार नहीं हुईं।

उन्होंने कहा – “मृतक मेरे घर में उस वक़्त चोरी कर रहा था, जब घर में ताले लगे हुए थे क्योंकि उसी शाम मेरी मंझली सास की मृत्यु हो गई थी, तो सभी लोग अस्पताल गये हुए थे. लेकिन, सिकंदर घर लौटे, तो उन्होंने चोरी करते हुए देखा और शोर मचाया. शोर सुनकर पूरा गाँव दौड़ा। 10-20 लोग जमा हो गये और मारपीट की.”

घटनास्थल से ही किसी ने 112 इमरजेंसी नंबर पर पुलिस को फ़ोन कर घटना की सूचना दी. सूचना पर पुलिस पहुँची और अतहर हुसैन को बरामद कर स्थानीय अस्पताल ले गई, जहां से नवादा सदर अस्पताल स्थानांतरित कर दिया गया. पुलिस मौक़े से ही सिकंदर यादव और उसके भाई सत्यनारायण यादव को भी ले गई.

मुख्य आरोपियों में शामिल सिकंदर यादव ने रोह थाने में भी आवेदन देकर यही आरोप लगाया है.

इंदू देवी ने मुस्लिम होने के चलते मारपीट के आरोप से इनकार किया, लेकिन ये ज़रूर कहा कि उनकी धार्मिक पहचान जानने के लिए पैंट खोली गई। उन्होंने कहा – मारपीट करने में उनके धर्म के लोग भी थे. जाति जानने के लिए पैंट खोला और जब देखा कि उनकी जाति का यानी मुसलमान है तो मुस्लिम साइड हो गये. वह अपनी पहचान नहीं बता रहा था, अगर वो बताता कि कहां से आया है और कौन जाति है, तो मारपीट नहीं होती.

मंत्री का वादा हवा में

इस पूरी घटनाक्रम में मृतक के परिवार का कहना है कि अतहर की जान बच सकती थी अगर उन्हें निजी अस्पताल में भर्ती कराया जाता, लेकिन पुलिस की ज़िद के चलते वे बहुत कोशिशों के बाद भी अतहर को निजी अस्पताल नहीं ले जा सके.

11 दिसम्बर को जब तबीयत ज़्यादा बिगड़ने लगी, तो पुलिस जबरन अतहर को पावापुरी अस्पताल ले गई, लेकिन वहाँ तबीयत और भी ख़राब होने लगी. सुबह जब मो. चाँद पावापुरी अस्पताल पहुँचे, तो देखा कि उन्हें साँस लेने में तकलीफ़ हो रही है. उन्होंने अतहर को पावापुरी अस्पताल से निजी अस्पताल में रेफर करने का काग़ज़ बनवाया और एम्बुलेंस से बिहारशरीफ के निजी अस्पताल ले जा रहे थे. एम्बुलेंस गगन दीवान के पास रुकी. मो. चाँद घर से पैसा लेने के लिए एम्बुलेंस से उतरे ही थे कि अतहर की साँस सदा के लिए टूट गई.

हालाँकि, मैं मीडिया के साथ बातचीत में पुलिस ने कहा कि उन्होंने कोई हस्तक्षेप नहीं किया और ये मामला अस्पताल और मरीज़ के बीच का है, पुलिस की कोई भूमिका नहीं.

रोह थाने की पुलिस का कोट – इलाज में पुलिस का पावर ज़ीरो है. अगर डॉक्टर लिख देगा रेफर का तो मरीज़ चला जाएगा. हमको तो सिर्फ़ लेकर जाना था. डॉक्टर ही लिखेंगे न रेफर को लेकर, हम लोग थोड़ी कुछ कर सकते हैं. ये डॉक्टर और पेशेंट के बीच का मामला है, पुलिस इसमें कहीं नहीं आती है.

घटना के बाद बिहार सरकार में मंत्री जमा खां पीड़ित परिवार से मिलने पहुँचे थे और शबनम परवीन को तीन लाख रुपये मुआवज़ा तथा एक सरकारी नौकरी का आश्वासन दिया था. उस वादे को महीना बीतने को है, लेकिन इस दिशा में अब तक कुछ भी नहीं हुआ है.

सरकारी उदासीनता का आलम ये है कि पावापुरी अस्पताल से पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के बावजूद स्थानीय निकाय से उन्हें मृत्यु प्रमाण पत्र नहीं मिल पा रहा है. जिससे परिवार निराश है.

इन सबके बीच पिता का साया खो चुके शबनम परवीन के बच्चों के मुस्तकबिल पर अनिश्चितता के गहरे बादल मंडरा रहे हैं.

उनका सबसे बड़ा बेटा, जो 19 साल का है, पिता की मृत्यु के बाद मुंबई चला गया है अपने मामा के पास.

15 साल की बेटी सबा परवीन 9वीं कक्षा में पढ़ती है और भविष्य में टीचर बनना चाहती है. वह पिता के साथ अस्पताल में ही रहा करती थी. वह कहती है कि उसके अब्बू ने उसे कहा था कि वह उन लोगों को सज़ा दिलवाये, जिन्होंने उन्हें बिना क़सूर मारा है.

12 साल का बेटा इश्तेखार छठवीं में पढ़ता है और वह इंजीनियर बनना चाहता है. पिता के साथ अस्पताल में आख़िरी बार हुई बातचीत को याद करते हुए कहता है पिता ने उसे पढ़ लिखकर नाम रौशन करने को कहा था.

लेकिन, पढ़े कैसे, पिता के नहीं रहने से पढ़ने में उसका मन नहीं लगता.

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Umesh Kumar Ray started journalism from Kolkata and later came to Patna via Delhi. He received a fellowship from National Foundation for India in 2019 to study the effects of climate change in the Sundarbans. He has bylines in Down To Earth, Newslaundry, The Wire, The Quint, Caravan, Newsclick, Outlook Magazine, Gaon Connection, Madhyamam, BOOMLive, India Spend, EPW etc.

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