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मौत पर राहत इंदौरी के कहे 20 उम्दा शेर

राहत इंदौरी को उनके शेर कहने के तरीके और अपने फक्कड़पन के लिए खास तौर पर याद किये जाएंगे। उनकी शायरी का सबसे खास बात ये था कि वे उर्दू या हिंदी के नही बल्कि हिंदुस्तान के शायर थे। वह आसान जबान के मानीखेज़ शायर थे। जिस वजह से उनकी शायरी जेहन में लंबे वक्त तक तैरती रहती है।

Seemanchal Library Foundation founder Saquib Ahmed Reported By Saquib Ahmed |
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मुशायरों के बादशाह और अपने अनोखे अंदाज के लिए मशहूर राहत इंदौरी भले ही इस फानी ए दुनिया से रुख़सत हो चुके है लेकिन उनकी शायरी रहते दुनिया तक हमारे ज़हनों दिल को झकझोरती रहेगी।

राहत इंदौरी को उनके शेर कहने के तरीके और अपने फक्कड़पन के लिए खास तौर पर याद किये जाएंगे। उनकी शायरी का सबसे खास बात ये था कि वे उर्दू या हिंदी के नही बल्कि हिंदुस्तान के शायर थे। वह आसान जबान के मानीखेज़ शायर थे। जिस वजह से उनकी शायरी जेहन में लंबे वक्त तक तैरती रहती है।

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वैसे तो राहत इंदौरी ने लगभग हर एक मौजू पर एक से एक उम्दा शे’र कहे है। लेकिन हम आप के लिए उनके द्वारा मौत पर कहे गए चुनिंदा शे’र लेकर हाज़िर है।


जनाज़े पर मिरे लिख देना यारो
मोहब्बत करने वाला जा रहा है

मैं जब मर जाऊँ तो मेरी अलग पहचान लिख देना
लहू से मेरी पेशानी पे हिन्दुस्तान लिख देना

एक ही नद्दी के हैं ये दो किनारे दोस्तो
दोस्ताना ज़िंदगी से मौत से यारी रखो

ये हादसा तो किसी दिन गुजरने वाला था
मैं बच भी जाता तो एक रोज मरने वाला था

अब ना मैं हूँ ना बाक़ी हैं ज़माने मेरे,
फिर भी मशहूर हैं शहरों में फ़साने मेरे

घर से ये सोच के निकला हूँ कि मर जाना है
अब कोई राह दिखा दे कि किधर जाना है

जिस्म से साथ निभाने की मत उम्मीद रखो
इस मुसाफ़िर को तो रस्ते में ठहर जाना है

मौत लम्हे की सदा ज़िंदगी उम्रों की पुकार
मैं यही सोच के ज़िंदा हूँ कि मर जाना है

मिरे जज़्बे की बड़ी क़द्र है लोगों में मगर
मेरे जज़्बे को मिरे साथ ही मर जाना है

ये बूढ़ी क़ब्रें तुम्हें कुछ नहीं बताएँगी
मुझे तलाश करो दोस्तो यहीं हूँ मैं

मौत का ज़हर है फ़ज़ाओं में
अब कहाँ जा के साँस ली जाए

वो शाख़ों से जुदा होते हुए पत्तों पे हँसते थे
बड़े ज़िंदा-नज़र थे जिन को मर जाने की जल्दी थी

ज़िंदगी की हर कहानी बे-असर हो जाएगी
हम न होंगे तो ये दुनिया दर-ब-दर हो जाएगी

रोज़ वही इक कोशिश ज़िंदा रहने की
मरने की भी कुछ तय्यारी किया करो

मत सिखा लहजे को अपनी बर्छियों के पैंतरे
ज़िंदा रहना है तो लहजे को ज़रा मा’सूम कर

वबा फैली हुई है हर तरफ़
अभी माहौल मर जाने का नईं

सड़क पर अर्थियाँ ही अर्थियाँ हैं
अभी माहौल मर जाने का नईं

जनाज़े ही जनाज़े हैं सड़क पर
अभी माहौल मर जाने का नईं

सिर्फ़ इतना फ़ासला है ज़िंदगी से मौत का
शाख़ से तोड़े गए गुल-दान में रक्खे रहे

ज़िंदा रहना खेल नहीं है इस आबाद ख़राबे में
वो भी अक्सर टूट गया है हम भी अक्सर बिखरे हैं

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स्वभाव से घुमंतू और कला का समाज के प्रति प्रतिबद्धता पर यकीन। कुछ दिनों तक मैं मीडिया में काम। अभी वर्तमान में सीमांचल लाइब्रेरी फाउंडेशन के माध्यम से किताबों को गांव-गांव में सक्रिय भूमिका।

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